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पश्चिम चम्पारण के परशुराम ने मेंथा की खेती से बदली अपनी तकदीर, सालाना कमाई पहुंच गई पंद्रह लाख रुपयेव्यापार
10 अग॰ 2026, 6:39 pm (33 दिन पहले)· 1

पश्चिम चम्पारण के परशुराम ने मेंथा की खेती से बदली अपनी तकदीर, सालाना कमाई पहुंच गई पंद्रह लाख रुपये

पश्चिम चम्पारण के किसान परशुराम ने धान-गेहूं की पारंपरिक खेती को छोड़कर मेंथा की खेती अपनाई और आज वे सालाना पंद्रह लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।

पश्चिम चम्पारण ज़िले के किसानों के लिए पुदीने की खेती किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है। इस बात की मिसाल पेश की है मझौलिया प्रखंड के रुलही गांव के रहने वाले परशुराम ने, जो पिछले 17 वर्षों से मेंथा की खेती और उससे तेल निकालने के कारोबार से जुड़े हुए हैं। एक समय था जब वे केवल धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की उपज पर ही निर्भर हुआ करते थे, जिससे होने वाली आय से बमुश्किल ही घर का गुजारा चल पाता था। लेकिन जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जब उन्होंने लीक से हटकर कुछ अलग करने का फैसला किया और मेंथा फार्मिंग की तरफ कदम बढ़ा दिए, जिसने उनकी पूरी आर्थिक स्थिति को ही बदलकर रख दिया।

साल 2009 से शुरू हुआ कामयाबी का सफर

परशुराम ने साल 2009 में पुदीने की खेती की शुरुआत की थी। शुरुआती दौर में उन्होंने सिर्फ एक एकड़ जमीन पर इसकी फसल लगाई थी। उनकी यह मेहनत रंग लाई और महज तीन से चार महीने के भीतर ही करीब 40 क्विंटल तक मेंथा की बंपर पैदावार हासिल हुई। मेंथा के पौधे अपने औषधीय गुणों के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं, जिसके चलते देश और दुनिया की तमाम बड़ी फार्मास्यूटिकल और कॉस्मेटिक कंपनियां इसके तेल की लगातार तलाश में रहती हैं। बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहने के कारण किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती है।

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खुद की प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर बढ़ाया कारोबार

बाजार में लगातार बनी रहने वाली भारी मांग और उचित दाम को देखते हुए परशुराम ने अपनी खेती के दायरे को काफी बड़ा किया और देखते ही देखते 1000 हेक्टेयर में इसकी खेती शुरू कर दी। जब उनका मुनाफा बढ़ने लगा और आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, तो उन्होंने फसल बेचने के बजाय खुद की मेंथा ऑयल निकालने की एक यूनिट ही स्थापित कर ली। इस प्रोसेसिंग यूनिट के जरिए वे पत्तियों से सीधे तेल तैयार करके व्यापार करने लगे। आज वे एक सफल उद्यमी के रूप में जाने जाते हैं। उनकी इस यूनिट में हर साल करीब 1000 लीटर मेंथा ऑयल की प्रोसेसिंग की जाती है, जिसे बाद में संघ के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 1200 से 1500 रुपए प्रति लीटर के भाव पर बेचा जाता है।

खेती करने का सही तरीका और खाद प्रबंधन

मेंथा की फसल मुख्य रूप से तीन से चार महीने की अवधि वाली होती है। आमतौर पर इसकी बुवाई जनवरी से मार्च के महीनों में की जाती है, लेकिन इसके अलावा बरसात के मौसम में भी किसान इसकी खेती की शुरुआत कर सकते हैं। फसल से बेहतरीन पैदावार हासिल करने के लिए कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में मिट्टी में उचित मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी होता है। इसके तहत प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम सल्फर का उपयोग किया जाना चाहिए। थोड़ी सी देखभाल के बल पर ही किसान प्रति एकड़ 40 से 50 क्विंटल तक मेंथा की पैदावार आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

विविध क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर होता है इस्तेमाल

मेंथा की तासीर ठंडी और औषधीय गुणों से भरपूर होती है, यही कारण है कि इसका उपयोग बहुत व्यापक स्तर पर किया जाता है। कॉस्मेटिक उत्पादों से लेकर दवा बनाने वाली फार्मा कंपनियां और विभिन्न खाद्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों में मेंथॉल का प्रमुखता से इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि इसके तेल और पत्तियों की मांग बाजार में कभी कम नहीं होती है और यह किसानों के लिए एक अत्यधिक लाभकारी सौदा साबित होता है।

सवाल-जवाब

परशुराम ने मेंथा की खेती की शुरुआत कब की थी?
परशुराम ने साल 2009 में एक एकड़ जमीन से पुदीने की खेती की शुरुआत की थी।
मेंथा की खेती से परशुराम की सालाना कमाई कितनी है?
वे मेंथा की खेती और तेल के कारोबार से सालाना करीब 15 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।
मेंथा ऑयल का अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्या भाव बिकता है?
मेंथा ऑयल को संघ के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 1200 से 1500 रुपए प्रति लीटर की दर से बेचा जाता है।
मेंथा की फसल कितने समय की होती है और इसकी बुवाई कब की जाती है?
यह तीन से चार महीने की फसल होती है जिसे मुख्य रूप से जनवरी से मार्च के बीच लगाया जाता है, हालांकि बरसात में भी इसकी शुरुआत की जा सकती है।
मेंथा की खेती में किन उर्वरकों का इस्तेमाल जरूरी है?
अच्छी पैदावार के लिए प्रति हेक्टेयर 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम सल्फर का उपयोग किया जाना चाहिए।
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