जब भी बाजारों में किसी लोकप्रिय सब्जी की आवक में कमी दर्ज की जाती है, तब मेहनतकश किसानों के लिए वह समय बंपर कमाई का बेहतरीन जरिया बन जाता है। उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के रहने वाले किसान विजय पाल पिछले दो वर्षों से लगातार कावेरी वैरायटी की फूलगोभी की खेती बेहद सफलतापूर्वक कर रहे हैं। वर्तमान सीजन में भी बाजार की नब्ज पहचानते हुए और गोभी की बढ़ती मांग को भांपते हुए उन्होंने समय पर अपनी फसल तैयार कर ली। विजय पाल ने अपने लगभग 3 बीघा खेत में कावेरी गोभी की यह विशेष फसल उगाई है। उनका साफ तौर पर यह अनुभव रहा है कि बाजार में इस समय गोभी की कुल आवक कम चल रही है, जिसके चलते उन्हें अपनी तैयार उपज के काफी ऊंचे और मुनाफे वाले दाम आसानी से मिल रहे हैं।
फसल तैयार होने की अवधि और कावेरी गोभी की विशेषताएं
विजय पाल के अनुसार कावेरी वैरायटी की खेती का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट यह होता है कि यदि किसान इसे बिल्कुल सही समय पर बाजार में उतारने में कामयाब हो जाए, तो वह कम आवक वाले दौर के फायदों का पूरा लाभ उठा सकता है। उनके खेतों में वर्तमान में एक फूलगोभी का औसत वजन लगभग 500 ग्राम के आसपास आ रहा है, हालांकि ठंड और सर्दियों के मुख्य मौसम में इसी विशेष वैरायटी के फूल का वजन बढ़कर सीधा 1 से 2 किलोग्राम तक पहुंच जाता है। यानी कि मौसम के बदलाव और फसल कटाई के समय के हिसाब से इसके आकार और कुल वजन में काफी बड़ा अंतर देखने को मिलता है। इस किस्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि कावेरी गोभी की पूरी फसल महज 90 दिन के भीतर पूरी तरह से पककर तैयार हो जाती है। सबसे पहले उन्होंने अपने खेत में इसकी मजबूत नर्सरी तैयार की और जब पौधे पूरी तरह से रोपाई के लायक हो गए, तब उन्हें खेत में सुरक्षित रूप से रोप दिया। फूलगोभी की सफल खेती में नर्सरी के स्तर पर ही स्वस्थ और रोगमुक्त पौधे तैयार करना सबसे अहम चरण होता है, क्योंकि अगर पौधे कमजोर रह जाएं तो आगे चलकर पूरी फसल की बढ़वार बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। वैसे तो फूलगोभी की विभिन्न किस्मों की समयावधि पूरी तरह से मौसम और वैरायटी पर निर्भर करती है।
उत्पादन का अनुमान और प्रति बीघा शुद्ध मुनाफा
किसान विजय पाल का यह स्पष्ट कहना है कि कावेरी गोभी की इस उन्नत खेती से प्रति बीघा लगभग 10 से 15 क्विंटल तक का बंपर उत्पादन आसानी से मिल जाता है। अगर कोई भी किसान कुल 3 बीघा खेत में इसी अनुपात में उत्पादन हासिल करता है, तो कुल पैदावार आसानी से लगभग 30 से 45 क्विंटल तक बैठ सकती है। यही एक मुख्य वजह है कि विजय पाल केवल ज्यादा पैदावार लेने पर ही जोर नहीं दे रहे हैं, बल्कि बाजार में फसल की सही बिक्री के समय पर भी उनकी पैनी नजर रहती है। उनका यह भी कहना है कि मौजूदा समय में बाजार में गोभी की आवक कम होने का सीधा फायदा उन्हें ऊंचे थोक रेट के रूप में मिल रहा है, जहां फिलहाल मंडी में उन्हें लगभग 45 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम तक का शानदार भाव मिल रहा है। उनके अनुमान के मुताबिक इस समय चल रहे बेहतरीन बाजार भावों में से खेती की लागत और तमाम खर्च निकालने के बाद उन्हें लगभग 50 हजार रुपये प्रति बीघा तक की सीधी बचत हाथ लग रही है, जिससे कुल मिलाकर 3 बीघा से डेढ़ लाख रुपये की शुद्ध कमाई हो जाती है।
कौवों से फसल की रक्षा का देसी और अनूठा तरीका
जब खेत में नर्सरी से तैयार छोटे पौधों की रोपाई कर दी जाती है, तब अक्सर कौवे और अन्य पक्षी उन नन्हे पौधों को अपनी चोंच से उखाड़कर खेत से ले जाते हैं। इस समस्या के कारण खेत में पौधों की संख्या तेजी से घटने लगती है और किसान को बार-बार दोबारा रोपाई करने का भारी झंझट झेलना पड़ता है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए किसान ने खेत के अंदर ही धागा बांधने का एक बेहद असरदार और देसी जुगाड़ तरीका अपनाया। उन्होंने पूरे खेत में अलग-अलग जगहों पर सूती धागे इस प्रकार बांधे कि एक ऐसा सुरक्षा अवरोध पैदा हो गया जिससे कौवों को पौधों के बीच आसानी से उतरने और उन्हें नुकसान पहुंचाने में भारी परेशानी होने लगी। इस प्रकार के छोटे और नाज़ुक पौधों की सुरक्षा शुरुआती दिनों में विशेष रूप से बहुत जरूरी होती है। जरूरत पड़ने पर किसान भाई चमकती हुई रिबन पट्टियों या फिर हल्की बर्ड नेटिंग जैसी आधुनिक बचाव तकनीकों का इस्तेमाल करके भी अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।



















