टाटा ग्रुप के शीर्ष प्रबंधन और टाटा संस के भविष्य को लेकर अंदरूनी मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं. परोपकारी संस्था टाटा ट्रस्ट्स के प्रमुख ट्रस्टी और जाने माने सीनियर एडवोकेट डेरियस खंबाटा ने अपना कार्यकाल आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है. उन्होंने 2 नवंबर 2026 को टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सिद्धार्थ शर्मा को एक आधिकारिक चिट्ठी भेजी. इस पत्र में उन्होंने न केवल पद छोड़ने के अपने निर्णय की जानकारी दी, बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ टाटा संस की चल रही बातचीत की दिशा पर भी कड़े सवाल उठाए. उनके अनुसार, केंद्रीय बैंक के साथ हुए संवाद से यह बुनियादी बात साफ नहीं हो सकी कि शेयर बाजार में औपचारिक रूप से सूचिबद्ध हुए बिना टाटा संस लिस्टेड कंपनियों जैसी कठोर पारदर्शिता और वित्तीय रिपोर्टिंग व्यवस्था कैसे कायम रख सकती है.
कार्यकाल विस्तार और स्वतंत्र फैसले पर अड़े डेरियस खंबाटा
डेरियस खंबाटा सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट, दोनों ही महत्वपूर्ण निकायों में ट्रस्टी के तौर पर कार्यरत रहे हैं. इन दोनों ट्रस्टों में उनका मौजूदा कार्यकाल 9 नवंबर 2026 को आधिकारिक रूप से समाप्त हो रहा है. अपने त्याग पत्र में खंबाटा ने स्पष्ट किया कि चेयरमैन नोएल टाटा और CEO सिद्धार्थ शर्मा चाहते थे कि वह अपने पद पर बने रहें. हालांकि, नियमों के अनुसार दोबारा नियुक्ति के लिए अन्य ट्रस्टियों की औपचारिक सहमति अनिवार्य थी. खंबाटा ने साफ कर दिया कि वह अपनी पेशेवर और नैतिक स्वायत्तता से किसी भी तरह का समझौता नहीं कर सकते. अन्य ट्रस्टियों से सेवा विस्तार की मंजूरी मांगना उन्हें स्वीकार्य नहीं था, इसलिए उन्होंने पद से हटना ही बेहतर समझा.
खंबाटा ने अपने पत्र में यह भी रेखांकित किया कि एक ट्रस्टी के रूप में उनका प्राथमिक दायित्व हमेशा अपने विवेक, निष्पक्षता और परोपकारी संस्था के व्यापक हितों की रक्षा करना रहा है. उन्होंने याद दिलाया कि वह दिवंगत रतन टाटा के व्यक्तिगत अनुरोध पर इन ट्रस्टों से जुड़े थे. उनके पूरे कार्यकाल में रतन टाटा द्वारा स्थापित मूल्य और सिद्धांत ही उनके निर्णयों का मार्गदर्शन करते रहे हैं.
रिजर्व बैंक के साथ बातचीत और पारदर्शिता का पेच
अपने पत्र में डेरियस खंबाटा ने टाटा संस और बैंकिंग नियामक के बीच हुए संवाद के नतीजों पर गहरा असंतोष व्यक्त किया. उन्होंने लिखा कि पूरी प्रक्रिया के दौरान यह ढांचा स्पष्ट करने में असफलता मिली कि यदि टाटा संस कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) का दर्जा छोड़ देती है या अपने संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन करती है, तब भी वह एक लिस्टेड कंपनी के समान जवाबदेही और सूचनाएं सार्वजनिक करने की प्रणाली को कैसे अपना सकती है. उनका मूल सवाल यही बना हुआ है कि क्या कोई व्यावहारिक और कानूनी रास्ता मौजूद है, जिससे टाटा संस शेयर बाजार में सार्वजनिक हुए बिना भी उन सभी अनिवार्य पारदर्शिता मानकों को पूरा कर सके जिनकी मांग नियामक करता है.
टाटा संस समूचे टाटा ग्रुप की प्रमुख प्रमोटर और होल्डिंग कंपनी की भूमिका निभाती है. ग्रुप की सभी दिग्गज औद्योगिक, तकनीकी और उपभोक्ता कंपनियों में टाटा संस की बड़ी हिस्सेदारी है. यदि टाटा संस स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होती है, तो खुदरा और संस्थागत आम निवेशकों के लिए इसके शेयर खरीदने का रास्ता खुल जाएगा. इसके साथ ही कंपनी को अपनी बैलेंस शीट, आंतरिक निर्णय और सभी अहम वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक डोमेन में रखने होंगे. खंबाटा का मानना रहा है कि इस कदम से टाटा समूह के दशकों पुराने मालिकाना ढांचे की बुनियाद हिल सकती है. वह पहले भी कई मंचों पर कह चुके हैं कि टाटा संस की संभावित लिस्टिंग असल में टाटा ट्रस्ट्स के मूलभूत अस्तित्व और स्वायत्तता से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है.
अपर लेयर एनबीएफसी के नियम और लिस्टिंग की बाध्यता
इस पूरे घटनाक्रम और विवाद के तार भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के लिए तय किए गए नए नियमों से जुड़े हैं. अक्टूबर 2021 में रिजर्व बैंक ने गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता सुनिश्चित करने के मकसद से स्केल बेस्ड रेगुलेशन फ्रेमवर्क लागू किया था. इस नियामक व्यवस्था के अंतर्गत आकार, प्रणालीगत महत्व और जोखिम के आधार पर बड़ी गैर बैंकिंग संस्थाओं को अपर लेयर श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है. इस विशिष्ट श्रेणी में शामिल होने वाली वित्तीय संस्थाओं के लिए तय समयसीमा के भीतर शेयर बाजार में अनिवार्य रूप से लिस्ट होना आवश्यक बनाया गया है.
सितंबर 2022 में रिजर्व बैंक ने टाटा संस को अपर लेयर एनबीएफसी की सूची में डाला था. इस आदेश के तहत कंपनी के लिए सितंबर 2025 तक शेयर बाजार में अपनी लिस्टिंग पूरी करने की अंतिम समयसीमा मुकर्रर की गई थी. हालांकि, टाटा संस शेयर बाजार में जाने के पक्ष में नहीं थी और लिस्टिंग की अनिवार्यता से बचना चाहती थी. इस कानूनी अनिवार्यता से बाहर निकलने के लिए होल्डिंग कंपनी ने अपने कर्ज चुकाने शुरू किए और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर अपना पंजीकरण नियामक को सरेंडर करने की प्रक्रिया अपनाई. इसके बावजूद, अगस्त 2026 में रिजर्व बैंक ने टाटा संस को दोबारा अपर लेयर एनबीएफसी के रूप में ही चिन्हित किया. केंद्रीय बैंक ने साथ में यह भी कहा कि पंजीकरण रद्द करने से जुड़ी कंपनी की अर्जी अभी विचाराधीन है. इस अनिश्चितता ने लिस्टिंग के पूरे मसले को दोबारा गरमा दिया.
टाटा ट्रस्ट्स के भीतर रणनीतिक खींचतान और दो धड़े
टाटा संस की कुल इक्विटी में टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी लगभग 66 प्रतिशत है. इतनी बड़ी शेयरधारिता के कारण ट्रस्ट के सदस्यों का रुख टाटा संस के भविष्य की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है. ट्रस्ट के भीतर इस समय लिस्टिंग को लेकर दो अलग अलग विचार मौजूद हैं. नोएल टाटा और डेरियस खंबाटा जैसे वरिष्ठ सदस्यों का मानना है कि टाटा संस को एक अनलिस्टेड और निजी कंपनी के रूप में ही काम करते रहना चाहिए. उनके दृष्टिकोण के अनुसार, वर्तमान नियंत्रण ढांचा टाटा ग्रुप के सामाजिक उत्तरदायित्व और परोपकारी मॉडल को बाजार के उतार चढ़ाव और बाहरी दबावों से सुरक्षित रखता है.
इसके विपरीत, ट्रस्ट्स के कुछ अन्य प्रभावशाली सदस्य, जिनमें वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह का नाम शामिल है, शेयर बाजार में लिस्टिंग के पक्ष में राय रख चुके हैं. उनका तर्क रहा है कि बाजार में जाने से संस्था में बेहतर कॉर्पोरेट गवर्नेंस, उच्चतम पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित होगी. डेरियस खंबाटा ने अपने पत्र में 28 जुलाई 2025 को पारित किए गए एक प्रस्ताव का भी उल्लेख किया. उन्होंने ध्यान दिलाया कि उस प्रस्ताव में टाटा संस को अनलिस्टेड रखने के रुख को सर्वसम्मति से दोहराया गया था, और कंपनी के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को रिजर्व बैंक से बातचीत आगे बढ़ाने के लिए अधिकृत किया गया था. खंबाटा के हटने के बाद अब यह देखना अहम होगा कि ट्रस्ट और होल्डिंग कंपनी नियामक के साथ अपने अगले कदम किस तरह तय करते हैं.

















