सहारनपुर में खेती के साथ मुर्गी पालन का कारोबार शुरू करने की इच्छा रखने वालों के लिए अंडा उत्पादन कमाई का एक बेहतरीन जरिया साबित हो सकता है। बाजार में अंडों की मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए सही नस्ल का चयन करके इस व्यवसाय को काफी मुनाफे वाला बनाया जा सकता है। लेकिन इस काम को हाथ में लेने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि कौन-सी नस्ल सबसे ज्यादा अंडे देती है। अंडा उत्पादन के लिए मुर्गियों की पांच नस्लें सबसे उत्तम मानी जाती हैं, जिनमें से दो को हाल ही के वर्षों में विशेष रूप से तैयार किया गया है और उनके नाम सोनाली और वनराज हैं, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ अंडा देने के लिए ही विकसित किया गया है।
प्रमुख अंडा उत्पादक नस्लें और उनकी खासियत
सबसे ज्यादा अंडा देने वाली लोकप्रिय नस्लों में व्हाइट लेगहॉर्न का नाम सबसे ऊपर आता है। इसकी व्यावसायिक किस्में बेहतरीन अंडा उत्पादन क्षमता के लिए पहचानी जाती हैं। इसके अलावा रोड आइलैंड रेड नस्ल भी भारी मात्रा में और महंगे अंडे देती है, जो मूल रूप से एक अमेरिकी नस्ल है। सूची में चौथे स्थान पर असील आती है जो 100 से 120 तक अंडे देती है, जबकि पांचवें स्थान पर कड़कनाथ नस्ल भी 100 से 120 अंडे तक का उत्पादन करती है। भले ही असील और कड़कनाथ कम अंडे देती हों, लेकिन इनके अंडों की बाजार में कीमत अन्य मुर्गियों की तुलना में काफी अधिक होती है, जिससे कम उत्पादन होने पर भी अच्छा मुनाफा मिल जाता है।
विशेषज्ञ की राय और नस्लों का वर्गीकरण
उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ सुबोध गोयल ने बातचीत के दौरान बताया कि मुर्गियों को चाहे अंडे के लिए रखा जाए, चूजे पैदा करने के लिए पाला जाए या फिर मांस के लिए तैयार किया जाए, इन सबकी किस्में और नस्लें बिल्कुल अलग होती हैं। इन्हें इस प्रकार से वैज्ञानिक रूप से विकसित किया जाता है कि कम समय में अधिक मांस का उत्पादन हो सके। देश में प्रसिद्ध देसी नस्लों की बात करें तो एक असील है और दूसरी कड़कनाथ है जिसका मांस काला होता है। असील एक गेमबर्ड है जो करीब 100 अंडे देती है और कड़कनाथ का अंडा उत्पादन भी लगभग 100 के आसपास रहता है। इसके बाद मध्यम प्रकार की ड्यूल पर्पस बर्ड्स आती हैं।
सरकारी संस्थानों द्वारा विकसित उन्नत नस्लें
यह मध्यम श्रेणी की बर्ड्स हमारी देसी किस्मों से काफी अधिक अंडा देती हैं और एक साल में 200 से 280 अंडे तक दे सकती हैं। देश की केंद्रीय सरकारी संस्थाओं जैसे आईसीएआर, आईवीआरआई और हैदराबाद में भी कुछ विशेष ड्यूल पर्पस नस्लें विकसित की गई हैं, जिनमें सोनाली और वनराज प्रमुख हैं। इन सभी नस्लों को कोई भी अपने घर के आस-पास बहुत आसानी से पाल सकता है। इन पक्षियों में न तो बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है और न ही इन्हें बहुत अधिक दाने या महंगे चारे की जरूरत पड़ती है, बल्कि यह घरों से निकलने वाले सब्जी के कचरे से ही अपना पेट भर लेती हैं।
वाणिज्यिक पोल्ट्री फार्म के लिए खास नस्लें
इसके बाद दो ऐसी प्रमुख नस्लें आती हैं जो पूरी तरह से विशेष अंडा उत्पादन के लिए जानी जाती हैं। पहली व्हाइट लेगहॉर्न है जो मूल रूप से एक इतालवी पक्षी थी और बाद में इसे अमेरिका में जेनेटिक रूप से मॉडिफाई करके केवल अंडा उत्पादन के वास्ते विकसित किया गया। दूसरी नस्ल रोड आइलैंड रेड है जो एक अमेरिकी पक्षी है और इसका रंग हल्का भूरा होता है, साथ ही इसका अंडा भी हल्के भूरे रंग का ही निकलता है। व्हाइट लेगहॉर्न बर्ड अंडा कारोबार में बेहद लोकप्रिय है और यह अपनी उम्र के 20 हफ्ते पूरे होते ही अंडा देना शुरू कर देती है।
अंडे की भारी पैदावार और खानपान
इस खास मुर्गी नस्ल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हर दिन 110 से लेकर 140 ग्राम तक फीड खाती है और बदले में 280 से 350 तक अंडों का उत्पादन करके देती है। मुर्गियों की यह अद्भुत नस्ल अधिक अंडे पाने के लिए देश के लगभग हर प्रदेश में बड़े पैमाने पर पाली जाती है और कमर्शियल पोल्ट्री फार्म चलाने वालों के लिए यह बेहद उपयोगी साबित होती है। सही प्रबंधन और खानपान का ध्यान रखकर कोई भी व्यक्ति इस व्यवसाय में अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकता है और बाजार में इसकी लगातार मांग का पूरा फायदा उठा सकता है।
















