भारत में त्योहारों का आगमन केवल धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का उत्सव नहीं होता, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को भी तेज करता है। दो दिन बाद रक्षाबंधन के साथ ही देश भर में त्योहारी खरीदारी का बड़ा दौर शुरू होने जा रहा है। बाजार में छाए इस उत्साह का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि व्यापारी संगठन कैट ने अकेले रक्षाबंधन पर लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान जताया है। अपनी जरूरतों और खुशियों को पूरा करने के लिए लोग अपनी बचत के साथ-साथ कर्ज लेकर भी खरीदारी करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। दूसरी तरफ, ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कंपनियों ने भी अपनी रणनीतियों में बदलाव किया है और इस बार प्रचार का बड़ा हिस्सा नए डिजिटल माध्यमों पर खर्च किया जा रहा है।
इंफ्लूएंशर मार्केटिंग पर 900 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट
त्योहारी सीजन के दौरान ग्राहकों तक सीधे पहुंचने के लिए ब्रांड्स अब पारंपरिक विज्ञापनों के बजाय कंटेंट क्रिएटर्स का तेजी से सहारा ले रहे हैं। क्रिएटर्स इंटेलीजेंस प्लेटफॉर्म कॉरुज़ के आंकड़ों से सामने आया है कि इस साल त्योहारों के दौरान इंफ्लूएंशर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के बाजार में कंपनियों का कुल खर्च 900 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले साल के त्योहारी सीजन में कंटेंट मार्केटिंग पर ब्रांड्स ने करीब 700 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जिसकी तुलना में इस बार खर्च में 29 फीसदी की भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है।
कंटेंट क्रिएटर्स के साथ काम करने वाली कंपनियों की संख्या में भी साल-दर-साल बड़ा इजाफा हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 में जहां 4,500 ब्रांड्स ने डिजिटल क्रिएटर्स की सेवाएं ली थीं, वहीं साल 2024 में यह संख्या बढ़कर 5,200 हो गई। साल 2025 में करीब 6 हजार कंपनियों ने क्रिएटर्स के जरिए प्रचार किया, जबकि चालू साल में यह आंकड़ा उछलकर 7,200 कंपनियों तक पहुंच गया है। ये आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि कंपनियां अपने मार्केटिंग बजट का रुख बदल रही हैं और सोशल मीडिया क्रिएटर्स पर उनका भरोसा लगातार बढ़ रहा है।
छोटे क्रिएटर्स की मांग में उछाल और रीजनल मार्केट पर फोकस
इस त्योहारी सीजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बड़ी हस्तियों और बड़े इंफ्लूएंशर्स के बजाय नैनो और माइक्रो क्रिएटर्स की मांग सबसे अधिक देखी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सत्र के दौरान कुल ब्रांड डिमांड का 75 फीसदी हिस्सा छोटे और स्थानीय स्तर के नैनो और माइक्रो क्रिएटर्स के पास गया था। इसके विपरीत, लाखों फॉलोअर्स वाले मेगा क्रिएटर्स और सेलिब्रिटीज की हिस्सेदारी महज 5 फीसदी तक सिमट कर रह गई। कंपनियों का मानना है कि स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय माहौल को समझने वाले छोटे क्रिएटर्स ग्राहकों के साथ ज्यादा गहरा और वास्तविक जुड़ाव बना पाते हैं।
इसके साथ ही, देश के छोटे शहरों के क्रिएटर्स भी इस बाजार में अपनी मजबूत पैठ बना रहे हैं। वर्तमान में मेट्रो शहरों में रहने वाले क्रिएटर्स की कुल मार्केट हिस्सेदारी 62 फीसदी बनी हुई है, लेकिन टीयर-2 और टीयर-3 शहरों के क्रिएटर्स की हिस्सेदारी तेजी से बढ़कर 38 फीसदी तक पहुंच गई है। जैसे-जैसे ब्रांड्स अपने मार्केटिंग बजट का विस्तार कर रहे हैं, वे केवल बड़े नामों के बजाय क्षेत्रीय और स्थानीय कंटेंट पर ज्यादा जोर दे रहे हैं ताकि हर वर्ग के ग्राहक तक पहुंचा जा सके।
बाजार का वैल्यूएशन और कॉर्पोरेट खर्च का गणित
कॉरुज़ के सह-संस्थापक और CEO प्रणेश भुवनेश्वर का कहना है कि साल 2023 के बाद से भले ही इस बाजार में ब्रांड्स की भागीदारी में 60 फीसदी की वृद्धि हुई हो, लेकिन अगर कुल वैल्यू के आधार पर देखें तो यह बाजार 350 करोड़ रुपये से बढ़कर 900 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा इस सेक्टर में सालाना 37 फीसदी की मजबूत ग्रोथ दर को दिखाता है। कंपनियों की प्राथमिकताओं में आया यह बदलाव बताता है कि त्योहारी बजट का एक बड़ा हिस्सा अब डिजिटल कंटेंट क्रिएशन में सीधे लगाया जा रहा है।
हालांकि, इस बाजार में बजट के वितरण में एक बड़ा अंतर भी दिखाई देता है। प्रणेश भुवनेश्वर के अनुसार, त्योहारी सीजन में कंटेंट मार्केटिंग पर होने वाले कुल खर्च का 65 फीसदी हिस्सा केवल 10 से 15 फीसदी शीर्ष क्रिएटर्स की जेब में जाता है। वहीं, फंडिंग की बात करें तो इस सीजन में होने वाले कुल 900 करोड़ रुपये के खर्च का करीब 66 फीसदी हिस्सा लगभग 700 से 1,100 बड़ी कंपनियों और ब्रांड्स द्वारा ही किया जाएगा।



















