भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए विदेशी क्लाइंट्स को सेवाएं देने वाले पेशेवरों के लिए वित्तीय लेनदेन और विदेशी मुद्रा रिपोर्टिंग से जुड़ा एक अहम प्रावधान अमल में आ चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि देश के फ्रीलांसर्स, यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स, स्वतंत्र कंसल्टेंट्स, कंटेंट क्रिएटर्स और संबंधित एजेंसियों को विदेशी स्रोतों से होने वाले भुगतान का ब्योरा अब नए नियमों के तहत दर्ज कराना होगा। फॉरेन एक्सचेंज रिपोर्टिंग और उससे जुड़े जरूरी दस्तावेजों की व्यवस्था को पारदर्शी और सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से यह ढांचा तैयार किया गया है।
विदेशी मुद्रा प्रबंधन के तहत नए रेगुलेशंस लागू
केंद्रीय बैंक ने 1 अक्टूबर 2026 से सेवा एवं उत्पाद के निर्यात और आयात से संबंधित नए फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट रेगुलेशंस को लागू किया है। इस संशोधित व्यवस्था के तहत भारत से सेवाएं निर्यात करने वाले प्रोफेशनल्स को एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन फॉर्म (EDF) जमा करना अनिवार्य किया गया है। इस फॉर्म में विदेश भेजी गई सेवा का वास्तविक कुल मूल्य स्पष्ट रूप से दर्ज करना होता है। यह व्यवस्था सॉफ्टवेयर विकास के साथ-साथ अन्य सभी तरह के सेवा निर्यात पर भी लागू होती है, जिसमें घरेलू टैरिफ से जुड़े ऑथराइज्ड डीलर को ही इस प्रक्रिया के लिए अधिकृत माना गया है।
किन लोगों पर सीधे तौर पर लागू होगी यह व्यवस्था
इस नई गाइडलाइन का दायरा उन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं तक फैला है, जो भारत में रहकर विदेशों में अपनी सेवाओं का निर्यात करते हैं। इनमें स्वतंत्र काम करने वाले फ्रीलांसर्स, कंसल्टेंसी फर्म्स, सोशल मीडिया क्रिएटर्स और अन्य तकनीकी या पेशेवर सर्विस प्रोवाइडर्स प्रमुख रूप से शामिल हैं। नियम का असर केवल उन्हीं कमाई करने वालों पर पड़ेगा जो किसी विदेशी संस्था या अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट से धन प्राप्त करते हैं। यदि कोई क्रिएटर या पेशेवर यूट्यूब, गूगल एडसेंस, अपवर्क, फाइवर या मेटा जैसे अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स के जरिए विदेशी कंपनी अथवा क्लाइंट से भुगतान लेता है, तो वह सीधे तौर पर निर्यात के दायरे में आएगा और उसे निर्धारित नियमों का पालन करना होगा।
फॉर्म जमा करने की समय-सीमा और कंसोलिडेटेड फाइलिंग
सेवाओं के निर्यातक के रूप में पंजीकृत व्यक्ति या संस्था को ईडीएफ के माध्यम से अपनी सेवाओं के पूर्ण निर्यात मूल्य की सटीक जानकारी साझा करनी होती है। निर्यातक की श्रेणी में हर वह व्यक्ति या फर्म आती है जो भारत की सीमा से बाहर किसी मुवक्किल को सेवाएं देती है और उसके एवज में विदेशी मुद्रा में पारिश्रमिक लेती है।
यदि किसी एक महीने के दौरान एक से अधिक अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट्स को सेवाएं दी गई हैं, तो निर्यातक को हर क्लाइंट के लिए अलग आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी। वह उस पूरे महीने के दौरान हुए सभी सेवा निर्यातों के लिए एक ही कंसोलिडेटेड ईडीएफ जमा कर सकता है। समय-सीमा के संदर्भ में, जिस महीने सेवाओं के लिए इनवॉइस जारी किया गया था, उस महीने के समाप्त होने के 30 दिनों के भीतर यह दस्तावेज जमा करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, यदि किसी पेशेवर ने अक्टूबर 2026 में कोई सर्विस इनवॉइस जारी किया है, तो उस लेनदेन के लिए फॉर्म दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 नवंबर 2026 निर्धारित होगी।
बैंक में जमा करने की प्रक्रिया और विलंब का समाधान
सॉफ्टवेयर सेवाओं से इतर अन्य क्षेत्रों के सेवा निर्यातक अपने ईडीएफ को संबंधित ऑथराइज्ड डीलर बैंक में जमा करेंगे। यह सामान्यतः वही बैंक शाखा होती है जहां विदेश से आने वाला पेमेंट ट्रांसफर होता है और जो विदेशी मुद्रा से संबंधित बैंकिंग सेवाएं संभालती है। इसके बाद ऑथराइज्ड डीलर बैंक घोषणा पत्र मिलने के 5 कार्यदिवसों के भीतर इस पूरे विवरण को एक्सपोर्ट डेटा प्रोसेसिंग एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (EDPMS) में दर्ज करता है। यदि किसी अनिवार्य कारण से फॉर्म तय समय में जमा नहीं हो पाता, तो निर्यातक ठोस कारण स्पष्ट करते हुए अपने ऑथराइज्ड डीलर बैंक से समय-सीमा बढ़ाने की गुहार लगा सकता है।
















