पश्चिम एशिया के समुद्री रास्तों पर गहराते सैन्य संकट और वॉशिंगटन द्वारा तैयार किए जा रहे कड़े व्यापारिक नियमों ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री गलियारों में तनाव फैलने के कारण भारतीय रिफाइनरियों के लिए सस्ता कच्चा तेल जुटाना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसका सीधा असर देश के सरकारी खजाने पर दिखने लगा है, जहां चालू वित्त वर्ष के शुरुआती पांच महीनों (अप्रैल से अगस्त) में कच्चे तेल की खरीदारी का कुल खर्च लगभग 50 फीसदी उछलकर 74.8 अरब डॉलर के स्तर को छू चुका है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 50.4 अरब डॉलर दर्ज किया गया था।
समुद्री परिवहन गलियारों पर गहराता संकट और ऊर्जा प्रवाह
फारस की खाड़ी से लेकर लाल सागर तक के अहम व्यापारिक जलमार्गों में सुरक्षा संबंधी जोखिम अचानक बढ़ गए हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई किए जाने के बाद से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं चरमरा गई हैं। हालांकि बीच में वॉशिंगटन और तेहरान के वार्ताकारों के मध्य बातचीत के जरिए राजनयिक समाधान तलाशने की कवायद शुरू हुई थी, परंतु कुछ ही हफ्तों में यह कूटनीतिक पहल बेअसर साबित हुई। मौजूदा समय में होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री संकरे मार्गों पर जहाजों के परिचालन में गंभीर व्यवधान पैदा हो रहे हैं। इन प्रमुख समुद्री चौकियों से गुजरने वाले तेल टैंकरों और एलएनजी-एलपीजी वाहकों को भारी जोखिम का सामना करना पड़ रहा है, जिससे एशिया और यूरोप के ऊर्जा खरीदार असमंजस में हैं।
सप्लाई पक्ष पर दबाव केवल समुद्री बाधाओं तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब के भीतर ऊर्जा के मुख्य बुनियादी ढांचे, खासकर उसकी रणनीतिक ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को ड्रोन हमलों का निशाना बनाया गया है। इस घटना ने खाड़ी क्षेत्र से होने वाली तेल निकासी पर तात्कालिक दबाव को और ज्यादा बढ़ा दिया है। वाणिज्य विभाग द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में भारत की कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का आधे से अधिक हिस्सा रूस, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब द्वारा मिलकर पूरा किया गया था। यही वजह है कि इन प्राथमिक आपूर्तिकर्ता देशों से होने वाले प्रवाह में कोई भी रुकावट सीधे तौर पर भारत के बजट को प्रभावित करती है।
रूसी खेप पर अमेरिकी दबाव और टैरिफ की तलवार
सस्ते ईंधन के सबसे बड़े विकल्प के रूप में उभरे रूसी तेल पर भी अब कूटनीतिक अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी प्रशासन ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले शीर्ष पांच आयातक देशों के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधानों वाले एक कानूनी मसौदे को मंजूरी दी है। इस कानूनी व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क थोपने का अधिकार मिल सकता है। इससे पहले भी रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी प्रमुख रूसी ऊर्जा कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण आयात के प्रवाह में उतार-चढ़ाव देखा गया था।
वर्ष 2025 में भारत अपनी जरूरत का लगभग 30 से 35 प्रतिशत कच्चा तेल मॉस्को से मंगा रहा था, जो प्रतिदिन करीब 20 लाख बैरल था। वॉशिंगटन की सख्ती के बाद इस साल फरवरी में यह आंकड़ा गिरकर 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। हालांकि, जब अमेरिकी प्रशासन ने वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता सुचारु रखने के मकसद से दो महीने की अस्थायी छूट दी, तब मार्च में यह आंकड़ा फिर संभला। इस दौरान वॉशिंगटन ने अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ हटाने को रूसी तेल खरीद कम करने से जोड़ने का प्रयास किया था, यद्यपि नई दिल्ली ने इस प्रकार की शर्त को आधिकारिक रूप से स्वीकार करने की पुष्टि नहीं की।
वेनेजुएला और ईरान से खरीद का ऐतिहासिक अनुभव
प्रतिबंधों की वजह से ऊर्जा स्रोतों के सीमित होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। भारत पहले भी ईरान और वेनेजुएला के संदर्भ में इस तरह की कूटनीतिक पेचीदगियों से गुजर चुका है। मार्च 2019 तक ईरान भारत के शीर्ष पांच तेल सप्लायरों में शुमार था और देश की कुल खरीद में उसका योगदान करीब 12 प्रतिशत था, परंतु अमेरिकी नियमों के कड़े होते ही यह आपूर्ति पूरी तरह बंद करनी पड़ी थी। चालू वर्ष के अप्रैल-मई में जब पाबंदियों में थोड़ी ढील मिली, तब भारत ने फौरन ईरान से लगभग 59 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा।
वेनेजुएला के मामले में भी ऐसा ही उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान भारत के तेल बास्केट में वेनेजुएला की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत से ज्यादा थी, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते घटकर 1 प्रतिशत से नीचे आ गई और अगले दो वर्षों तक पूरी तरह शून्य रही। वर्ष 2023-24 में जब प्रतिबंध हटे तो व्यापार दोबारा बहाल हुआ और इस साल अप्रैल से वेनेजुएला की हिस्सेदारी एक बार फिर 6 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच गई। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि जब भी भू-राजनीतिक पाबंदियां लगती हैं, भारत के पास विकल्प तुरंत सीमित हो जाते हैं।
क्रूड बास्केट में उछाल और कूटनीतिक सक्रियता
वैश्विक बाजार में उपजी अनिश्चितता का असर कीमतों पर तेजी से पड़ा है। ताजा सैन्य तनातनी छिड़ने से पहले भारतीय क्रूड बास्केट की लागत 70 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बनी हुई थी। लेकिन पश्चिम एशिया के सुलगने के बाद यह लगभग 80 प्रतिशत चढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल चुकी है। यद्यपि भारत ने जोखिम कम करने के लिए बीते वर्षों में लगभग 40 अलग-अलग देशों से तेल खरीदकर अपने आयात का विविधीकरण किया है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अचानक सप्लाई घटने से वैकल्पिक अनुबंध बहुत महंगे पड़ रहे हैं।
इस जटिल स्थिति के बीच विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने आर्थिक और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका के साथ लगातार संवाद बनाए हुए है। हाल के महीनों में दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच इस विषय पर उच्चस्तरीय विमर्श हुआ है, जिसमें नई दिल्ली ने द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की स्थिरता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को स्पष्ट रूप से सामने रखा है।

















