गुजरात में सरकारी और नगर निगम स्कूलों के शिक्षकों ने सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को दरकिनार करते हुए एक मिसाल कायम की है। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा मई और जून 2026 के दौरान चलाए गए 'बैक टू स्कूल' अभियान के तहत अहमदाबाद शहर में पढ़ाई छोड़ चुके 86 प्रतिशत बच्चों को फिर से स्कूलों में लाया गया है। भीषण गर्मी की परवाह किए बिना शिक्षकों ने अपनी गर्मियों की छुट्टियां छोड़ दीं और घर-घर जाकर ऐसे बच्चों को तलाशा जो सब्जी बेचने, बाल मजदूरी करने या घरेलू कामों में उलझे हुए थे। शिक्षकों के इस समर्पित प्रयास के चलते आज हजारों मासूम बच्चों के हाथों में एक बार फिर से किताबें आ गई हैं।
अहमदाबाद और गुजरात में अभियान के आंकड़े
गुजरात सरकार ने बीते शैक्षणिक सत्र के दौरान राज्यभर के 44,000 सरकारी और अनुदान प्राप्त स्कूलों में एक व्यापक सर्वेक्षण कराया था। इस सर्वे में करीब 6.41 लाख ऐसे बच्चों की पहचान की गई थी, जिन्होंने विभिन्न कारणों से अपनी स्कूली पढ़ाई छोड़ दी थी। इसके बाद मई-जून 2026 में विशेष नामांकन अभियान शुरू किया गया। अगर केवल अहमदाबाद शहर की बात करें, तो यहां कुल 10,387 ड्रॉपआउट बच्चों की पहचान की गई थी। शिक्षकों के लगातार प्रयासों और काउंसलिंग की बदौलत 9,036 बच्चों का दोबारा स्कूलों में नामांकन कराया गया, जो कि 86 प्रतिशत की एक बड़ी सफलता है। इसके अतिरिक्त, आंकड़ों के अनुसार चिन्हित बच्चों में से 1,357 बच्चे दूसरे राज्यों में चले गए या फिर उन्होंने आईटीआई (ITIs) में प्रवेश लेकर अपनी पढ़ाई को आगे जारी रखा।
भीषण गर्मी में शिक्षकों का जमीनी संघर्ष
ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा कक्षाओं तक लाना कोई आसान काम नहीं था। इसके लिए शिक्षकों को जमीनी स्तर पर कड़ा संघर्ष करना पड़ा। वासना नगर निगम स्कूल की हेड टीचर नीताबेन भद्रेशा ने कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी के दौरान अपने स्कूटर से बस्तियों का दौरा किया और बच्चों के घर के पते तलाशे। जांच के दौरान सामने आया कि कई छोटे बच्चे सुबह-सुबह सब्जी मंडियों में काम करते थे और शाम को सड़कों पर सब्जी बेचते थे। आर्थिक तंगी से जूझ रहे माता-पिता अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए अड़े रहते थे। शिक्षकों ने हार नहीं मानी और अभिभावकों से बार-बार मुलाकात की। उन्होंने माता-पिता को समझाया कि बच्चा परिवार की कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि उसकी असली जगह स्कूल में है और शिक्षा ही उनके परिवार का भविष्य संवार सकती है।
लड़कियों की पढ़ाई और प्रवासी परिवारों की चुनौतियां
अहमदाबाद के असरवा और जहांगीरपुरा जैसे इलाकों में शिक्षकों को कुछ अलग प्रकार की सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जहांगीरपुरा स्कूल के शिक्षक सुकेतुभाई याग्निक के अनुसार, उनके क्षेत्र में कुल 37 ड्रॉपआउट बच्चे पंजीकृत थे, जिनमें से 80 प्रतिशत से अधिक लड़कियां थीं। 8वीं कक्षा के बाद कई परिवार सामाजिक रूढ़ियों और पुरानी मान्यताओं के कारण लड़कियों की पढ़ाई छुड़वा देते थे और उन्हें खाना बनाने या छोटे भाई-बहनों की देखरेख जैसे घरेलू कामों में लगा देते थे। इसके अलावा, काम की तलाश में बार-बार स्थान बदलने वाले प्रवासी परिवारों को खोजना एक बड़ी चुनौती था, क्योंकि वे अक्सर अपने मकान और मोबाइल नंबर बदल लेते थे। इसके बावजूद शिक्षकों ने स्थानीय नेटवर्क और व्यक्तिगत प्रयासों के जरिए इन परिवारों को खोज निकाला।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने किया शिक्षकों का सम्मान
शिक्षकों के इस मानवीय और प्रेरणादायक कार्य की प्रशासनिक स्तर पर भी जमकर सराहना की गई। 22 जुलाई को गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने एक विशेष कार्यक्रम में ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया। नगर निगम स्कूल बोर्ड के अधिकारियों ने बताया कि यह सफलता शिक्षकों की अटूट निष्ठा, लगातार फॉलो-अप और अभिभावकों को सरकारी योजनाओं की सही जानकारी देने से संभव हो सकी है। शिक्षकों के इस संकल्प ने हजारों बच्चों के भविष्य को अंधकार में डूबने से बचा लिया है।



















