बांग्लादेश की राजनीति में कई दशकों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शेख हसीना की पहचान सिर्फ एक प्रभावशाली राजनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक उच्च शिक्षित और साहित्य प्रेमी व्यक्तित्व के तौर पर भी रही है। राष्ट्रपिता के रूप में जाने जाने वाले बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की ज्येष्ठ पुत्री होने के कारण राजनीति उन्हें स्वाभाविक रूप से विरासत में मिली थी। हालांकि, राजनीतिक माहौल में पली-बढ़ी होने के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई को कभी पीछे नहीं छूटने दिया और निरंतर उच्च शिक्षा की दिशा में काम किया। छात्र जीवन से ही उन्होंने शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों में संतुलन बनाए रखा, जिससे उनकी एक अलग पहचान बनी।
गोपालगंज के तुंगीपारा से शुरू हुआ शुरुआती शैक्षणिक सफर
शेख हसीना का जन्म 28 सितंबर 1947 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (जो अब बांग्लादेश है) के गोपालगंज जिले में स्थित तुंगीपारा गांव में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा गांव के ही एक प्राथमिक विद्यालय में संपन्न हुई, जहां उन्होंने बुनियादी पढ़ाई हासिल की। इसके बाद जब उनका परिवार ढाका स्थानांतरित हुआ, तो उन्होंने वहां की प्रमुख शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश लिया। उन्होंने ईडन महिला कॉलेज से अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी और तत्पश्चात नामी गवर्नमेंट इंटरमीडिएट महिला कॉलेज से इंटरमीडिएट की शिक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण की। यह दौर उनके शैक्षणिक और व्यक्तिगत विकास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
ढाका यूनिवर्सिटी से बंगाली साहित्य में स्नातक की डिग्री
इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात शेख हसीना ने उच्च शिक्षा के लिए ढाका यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। ढाका यूनिवर्सिटी बांग्लादेश के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों में गिनी जाती है, जहां देश के कई प्रमुख विचारकों और नेताओं ने शिक्षा प्राप्त की है। इस संस्थान में उन्होंने अपनी रुचि के अनुसार बंगाली साहित्य विषय का चयन किया। अपनी पढ़ाई के प्रति निष्ठा बनाए रखते हुए उन्होंने वर्ष 1973 में ढाका यूनिवर्सिटी से बंगाली साहित्य में स्नातक (ग्रेजुएशन) की डिग्री प्राप्त की।
छात्र जीवन के दौरान राजनीति में कदम और संगठनात्मक दायित्व
अपने कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिनों से ही शेख हसीना का रुझान सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की ओर होने लगा था। ईडन महिला कॉलेज में अध्ययन के दौरान वे छात्र संघ की राजनीति में अत्यधिक सक्रिय रहीं। वर्ष 1966-67 की अवधि के दौरान उन्हें अपने कॉलेज की स्टूडेंट यूनियन का उपाध्यक्ष चुना गया, जो उनके शुरुआती नेतृत्व कौशल को दर्शाता है। इसके उपरांत ढाका यूनिवर्सिटी में अध्ययन के दौरान वे अपनी पार्टी की छात्र इकाई छात्र लीग की सक्रिय सदस्य के रूप में जुड़ी रहीं। उन्होंने विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध रोकेया हॉल शाखा के महासचिव पद का दायित्व भी संभाला और छात्रों के हितों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई।
साहित्यिक रुचि और प्रमुख पुस्तकों का लेखन
राजनीतिक भाषणों और संगठनात्मक कार्यों के साथ-साथ शेख हसीना का झुकाव पठन-पाठन और लेखन कार्य में भी गहरा रहा। बंगाली भाषा और साहित्य पर मजबूत पकड़ होने के कारण उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'ओरा टोके टोके टाके', 'माय फादर, माय बांग्लादेश' तथा 'डेवलपमेंट फॉर द मासेज' शामिल हैं। उनकी इन साहित्यिक कृतियों में बांग्लादेश के इतिहास, वहां के स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं और उनके पिता बंगबंधु के लंबे संघर्षों की विस्तृत झलक देखने को मिलती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और मानद डॉक्टरेट उपाधियां
ढाका यूनिवर्सिटी से मिली औपचारिक स्नातक डिग्री के अतिरिक्त शेख हसीना को उनकी सामाजिक सेवाओं, जनहित के कार्यों और सांगठनिक नेतृत्व के लिए दुनिया भर के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी क्षमताओं को पहचानते हुए विभिन्न संस्थानों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधियों से अलंकृत किया। इनमें भारत की प्रसिद्ध विश्व भारती यूनिवर्सिटी (शांतिनिकेतन) और त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थान सम्मिलित हैं।



















