भारत में उच्च शिक्षा और गहन शोध के क्षेत्र में वित्तीय संसाधनों की कमी अक्सर प्रतिभावान छात्रों के लिए एक बड़ी बाधा बन जाती है। कई बार आर्थिक तंगी के कारण शोधार्थियों को अपने रिसर्च की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है। इसी समस्या को दूर करने और देश की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर उच्च स्तरीय शोध को बढ़ावा देने के लिए फोरम ऑन इंडियन ट्रेडिशनल मेडिसिन (FITM) ने साल 2026 के लिए अपने रिसर्च फेलोशिप प्रोग्राम की घोषणा की है। यह डॉक्टोरल और पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप विशेष रूप से उन शोधार्थियों के लिए डिज़ाइन की गई है जो पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और उनसे जुड़ी सरकारी नीतियों पर शोध करना चाहते हैं, ताकि वे बिना किसी वित्तीय चिंता के अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।
पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में नीतिगत शोध का महत्व
वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर समग्र स्वास्थ्य और प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के प्रति लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी प्राचीन प्रणालियां अब आधुनिक स्वास्थ्य ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं। लेकिन इन पद्धतियों को प्रभावी सरकारी नीतियों में बदलने के लिए व्यापक अकादमिक विश्लेषण की आवश्यकता है। यह फेलोशिप कार्यक्रम उन युवा वैज्ञानिकों और विचारकों के लिए एक शानदार मंच है जिनके पास पारंपरिक चिकित्सा को नई दिशा देने के लिए अभिनव विचार हैं। इसके माध्यम से शोधकर्ता न केवल अपने ज्ञान का विस्तार कर सकते हैं बल्कि देश की स्वास्थ्य नीतियों को आकार देने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
सीटों का विभाजन और वर्गीकरण
इस फेलोशिप कार्यक्रम के तहत सीटों का बंटवारा बहुत ही संतुलित तरीके से किया गया है ताकि विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को समान अवसर मिल सके। कुल 10 उपलब्ध सीटों को दो बराबर भागों में बांटा गया है। इसमें से 5 सीटें AYUSH श्रेणी के शोधार्थियों के लिए निर्धारित हैं, जो पहले से ही इन चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े हुए हैं। वहीं, शेष 5 सीटें Non-AYUSH श्रेणी के आवेदकों को दी जाएंगी, जो सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र या सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे अन्य क्षेत्रों से आकर पारंपरिक चिकित्सा पर नीतिगत शोध करना चाहते हैं। सीटों का यह समान वर्गीकरण डॉक्टोरल और पोस्ट-डॉक्टोरल दोनों ही स्तरों पर समान रूप से लागू रहेगा, जिससे एक बहु-विषयक अनुसंधान वातावरण तैयार हो सके।
आकर्षक स्टाइपेंड और आर्थिक लाभ
शोध के दौरान उम्मीदवारों को मिलने वाली आर्थिक सहायता इस कार्यक्रम का सबसे आकर्षक पहलू है। कार्यक्रम के नियमों के अनुसार, चयनित होने वाले डॉक्टोरल फेलो (Doctoral Fellows) को प्रति माह 70,000 रुपये का स्टाइपेंड दिया जाएगा। इसके साथ ही, जिन उम्मीदवारों के पास पहले से पीएचडी की डिग्री है और वे पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो (Post-Doctoral Fellows) के रूप में काम कर रहे हैं, उन्हें हर महीने 75,000 रुपये की वित्तीय सहायता राशि प्रदान की जाएगी। यह मासिक वित्तीय सहायता शोधार्थियों को बिना किसी अतिरिक्त नौकरी या काम के पूरी तरह से अपने शोध कार्य पर ध्यान केंद्रित करने की आजादी देती है।
पात्रता मानदंड और आवेदन की प्रक्रिया
इस फेलोशिप का लाभ उठाने के इच्छुक उम्मीदवारों को कुछ महत्वपूर्ण पात्रता मानदंडों को पूरा करना होगा। सबसे पहली अनिवार्यता यह है कि आवेदक भारत का नागरिक होना चाहिए। उनका शोध प्रस्ताव पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों या उनकी नीतियों से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होना चाहिए। हालांकि, उम्मीदवारों को यह ध्यान रखना होगा कि फार्माकोलॉजिकल (Pharmacological), क्लिनिकल (Clinical) और फार्माकोग्नोसी (Pharmacognosy) जैसे प्रयोगात्मक वैज्ञानिक विषयों पर आधारित शोध को इस फेलोशिप के दायरे से बाहर रखा गया है। इस प्रोग्राम के लिए ऑनलाइन आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 11 अक्टूबर है, और आवेदन पोर्टल उसी दिन रात 11:59 बजे बंद हो जाएगा। इच्छुक उम्मीदवार आवेदन करने से पहले आधिकारिक वेबसाइट fitm.ris.org.in पर जाकर सभी आवश्यक दिशा-निर्देशों और पात्रता शर्तों का अध्ययन जरूर कर लें।



















