भारत में उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में कदम रखने वाले युवाओं के लिए आर्थिक मदद एक बहुत बड़ा सहारा होती है। हर साल देश भर के लाखों मेधावी विद्यार्थी अपने सुनहरे भविष्य का सपना संजोकर सबसे कठिन माने जाने वाले अकादमिक मूल्यांकन को पार करते हैं। इन सभी उम्मीदवारों का मुख्य लक्ष्य जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) प्राप्त करना होता है, ताकि वे बिना किसी आर्थिक चिंता के अपनी पीएचडी (PhD) की पढ़ाई पूरी कर सकें। हालांकि, जमीनी सच्चाई छात्रों के इन सपनों से कोसों दूर है। जमीनी आंकड़े बताते हैं कि परीक्षा की निर्धारित कट-ऑफ को पार करने वाले विशाल छात्र समूह में से महज मुट्ठी भर लोगों को ही असल में आर्थिक अनुदान मिल पाता है। देश के होनहार शोधार्थियों को हो रहे इस भारी नुकसान का मुद्दा हाल ही में लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान गूंजा, जहां विपक्षी दल के नेता ने सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा किया।
सदन के पटल पर तीखे सवालों की बौछार
संसद के निचले सदन में तिरुवनंतपुरम के सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने शिक्षा व्यवस्था की इस खामी पर सरकार से सीधे तौर पर जवाब मांगा। उन्होंने शिक्षा मंत्रालय के सामने पिछले पांच वर्षों का पूरा खाका रखने की मांग की। विपक्षी नेता ने सदन में खड़े होकर स्पष्ट रूप से पूछा कि बीते पांच सालों के दौरान हर एक साल में कुल कितने अभ्यर्थियों ने बुनियादी अर्हता को सफलतापूर्वक पार किया और उनमें से कितने खुशकिस्मत लोगों को JRF का लाभ मिला। उन्होंने सरकार से सफल उम्मीदवारों और फेलोशिप पाने वाले छात्रों के बीच के वास्तविक प्रतिशत का ब्योरा भी मांगा। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पूछा कि क्या नीति-निर्माताओं ने कभी इस बात पर गौर किया है कि परीक्षा में सफल होने वाले और आर्थिक अनुदान पाने वाले छात्रों के बीच की खाई साल-दर-साल चौड़ी होती जा रही है। उन्होंने इस चिंताजनक अंतर के पीछे के असली कारणों को सार्वजनिक करने की मांग की।
आंकड़ों की जुबानी फेलोशिप की कड़वी सच्चाई
सदन में अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए कांग्रेस सांसद ने हालिया परीक्षाओं के बेहद चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि जून 2025 में आयोजित हुई राष्ट्रीय स्तर की इस परीक्षा में पूरे देश से 7,51,907 छात्रों ने हिस्सा लिया था। इतने बड़े पैमाने पर परीक्षा देने वाले इस समूह में से सिर्फ 5,269 उम्मीदवारों को ही JRF के योग्य माना गया। इसके बाद की परीक्षा में भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। दिसंबर 2025 के सत्र का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि उस दौरान करीब 7,35,614 परीक्षार्थी परीक्षा में बैठे, लेकिन अनुदान केवल 5,108 होनहारों के नसीब में ही आया। इन सटीक गणितीय आंकड़ों को सामने रखते हुए उन्होंने सरकार से तीखा सवाल किया कि जब देश के इतने सारे युवा अपनी अकादमिक योग्यता साबित कर रहे हैं, तो फिर उन्हें शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी फेलोशिप से वंचित क्यों रखा जा रहा है।
व्यवस्था में बदलाव की जोरदार मांग
केवल पुराने आंकड़े पेश करने के बजाय, सांसद ने सरकार से भविष्य की कार्ययोजना को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने सीधे तौर पर पूछा कि क्या शिक्षा मंत्रालय के पास उन तमाम छात्रों को राहत देने की कोई ठोस योजना है, जो शोध के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आने वाले समय में JRF के तहत दी जाने वाली सीटों की कुल संख्या में इजाफा करने पर कोई विचार-विमर्श चल रहा है। इसके साथ ही उन्होंने मौजूदा नियमों पर भी सवाल खड़े किए, जिनके तहत वर्तमान में फेलोशिप दी जाती है। फिलहाल फेलोशिप का वितरण एक निश्चित प्रतिशत आधारित प्रणाली के तहत किया जाता है। सांसद ने जोर देकर कहा कि इस पुरानी सीमा में तत्काल बदलाव की जरूरत है, ताकि अधिक से अधिक योग्य और मेधावी युवाओं को अपने महत्वपूर्ण शोध कार्यों के लिए समय पर आर्थिक सहायता मुहैया कराई जा सके।
सालों से अटकी फेलोशिप का अनसुलझा मुद्दा
मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस नेता का ध्यान केवल मुख्य फेलोशिप तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने एक और बहुत पुरानी और महत्वपूर्ण मांग को सदन के पटल पर रखा। उन्होंने उन पीएचडी छात्रों के दर्द को साझा किया, जो किसी कारणवश मुख्य फेलोशिप से चूक जाते हैं और उन्हें वैकल्पिक आर्थिक सहायता (नॉन-नेट फेलोशिप) के सहारे अपनी पढ़ाई जारी रखनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत दी जाने वाली 8,000 रुपये प्रति माह की राशि साल 2006 से लेकर आज तक जस की तस बनी हुई है। पिछले लगभग दो दशकों में देश में महंगाई कई गुना बढ़ चुकी है और जीवन यापन का खर्च आसमान छू रहा है, फिर भी इस राशि में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या मंत्रालय इस गंभीर स्थिति से पूरी तरह वाकिफ है, और अगर हां, तो इतने सालों से अटकी पड़ी इस राशि को बढ़ाने के लिए कौन से ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
मौजूदा नियमों पर सरकार का बचाव
संसद में उठे इन तमाम सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने उठाई। उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए फेलोशिप वितरण की पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया। हालांकि, उनका यह जवाब विपक्षी नेता द्वारा पूछे गए सीटों की बढ़ोतरी के सवालों का सीधा उत्तर देने के बजाय सिर्फ वर्तमान कार्यप्रणाली की जानकारी देने तक ही सीमित नजर आया। राज्य मंत्री ने सदन को अवगत कराया कि JRF के लिए छात्रों का चयन उनके राष्ट्रीय परीक्षा में किए गए प्रदर्शन की मेरिट के आधार पर किया जाता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान नियमों के अनुसार, परीक्षा में बैठने वाले कुल उम्मीदवारों में से केवल शीर्ष 6 प्रतिशत छात्रों को ही असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए पात्र घोषित किया जाता है। इसके बाद इसी सीमित समूह में से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हर साल कुल 11,750 छात्रों के लिए JRF को मंजूरी प्रदान करता है।
आर्थिक सहायता के अन्य संभावित विकल्प
मुख्य फेलोशिप के अलावा छात्रों को मिलने वाली अन्य आर्थिक सहायताओं का जिक्र करते हुए सरकार ने अपनी बात का दायरा बढ़ाया। राज्य मंत्री ने सदन को बताया कि देश में शोध कार्यों को बढ़ावा देने का जिम्मा केवल एक आयोग का नहीं है, बल्कि कई अन्य केंद्रीय मंत्रालय और सरकारी संस्थाएं भी अपने स्तर पर पीएचडी करने वाले छात्रों को विभिन्न प्रकार की फेलोशिप उपलब्ध कराती हैं। इसके अलावा, समाज के विभिन्न वर्गों को समान अवसर प्रदान करने के लिए विशेष योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इनमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), और दिव्यांग (PwD) श्रेणी के छात्रों के साथ-साथ सिंगल गर्ल चाइल्ड के लिए विशेष फेलोशिप शामिल हैं। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र अगर चाहें तो विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा चलाए जा रहे रिसर्च प्रोजेक्ट्स के साथ जुड़कर भी अपने लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता का प्रबंध कर सकते हैं।
राशि बढ़ाने के सवाल पर सीधा जवाब नहीं
जब बात उस फेलोशिप की आई जिसकी राशि 2006 से नहीं बढ़ाई गई है, तो सरकार का जवाब काफी घुमावदार रहा। विपक्ष की तरफ से 8,000 रुपये की राशि में इजाफा करने और इसकी समयसीमा तय करने की जो सीधी मांग की गई थी, उस पर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया। इसके बजाय, सरकार ने सिर्फ इस योजना के मूल उद्देश्य को दोहराने पर जोर दिया। राज्य मंत्री ने बताया कि यह विशेष आर्थिक सहायता उन एमफिल (MPhil) और पीएचडी छात्रों को थोड़ी बहुत राहत देने के लिए शुरू की गई थी, जिन्हें किसी और जगह से कोई भी वित्तीय मदद नहीं मिल पा रही हो। सरकार के मुताबिक, इस योजना का मुख्य लक्ष्य देश के दूरदराज के इलाकों और खासकर पूर्वोत्तर भारत में स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे शोधार्थियों को संबल प्रदान करना है। नतीजतन, इस फेलोशिप की राशि में कब वृद्धि की जाएगी, यह महत्वपूर्ण सवाल सदन में अनुत्तरित ही रह गया।
शोधार्थियों के लिए अभी भी बरकरार है संकट
लंबी बहस और सवालों के दौर के बावजूद, इस संसदीय संवाद से देश के लाखों छात्रों की मूल चिंताओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका। विपक्षी नेता ने जो बुनियादी सवाल उठाए थे, जैसे पिछले पांच वर्षों का पूरा डेटा, सफल छात्रों और फेलोशिप पाने वालों के बीच लगातार बढ़ती खाई, और प्रतिशत आधारित नियमों में बदलाव, वे अभी भी चर्चा का मुख्य विषय बने हुए हैं। छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए JRF की कुल सीटों में इजाफा करने की जो सबसे बड़ी मांग थी, उसका भी कोई सीधा जवाब नहीं मिला और सरकार सिर्फ मौजूदा कोटा प्रणाली का ही हवाला देती रही। यही कारण है कि आज भी यह एक बड़ा ज्वलंत मुद्दा है। हर साल लाखों की संख्या में देश के होनहार युवा अपनी पूरी मेहनत से इस कठिन परीक्षा को पास कर रहे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर को अपने सपनों का शोध पूरा करने के लिए जरूरी आर्थिक संबल नहीं मिल पा रहा है।




















