आम धारणा के अनुसार विज्ञान का अर्थ प्रयोगशाला, रसायनों, टेस्ट ट्यूब और गणितीय सूत्रों से लगाया जाता है। इसी वजह से जब किसी अध्ययन शाखा को राजनीति विज्ञान कहा जाता है, तो लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि चुनाव, शासन, कानून और राजनीतिक गतिविधियों में वैज्ञानिक पद्धति का क्या स्थान है। समाजशास्त्र, इतिहास या कला संकाय से जुड़े इस विषय के साथ विज्ञान शब्द जुड़ने पर अक्सर चर्चाएं होती हैं। कई लोग इसे केवल नेताओं के भाषणों या चुनावी उठापटक तक सीमित मान लेते हैं, जबकि इसके मूल में एक सुव्यवस्थित और तार्किक अध्ययन प्रणाली काम करती है। प्राचीन विचारक अरस्तू ने राजनीति को मास्टर साइंस की संज्ञा दी थी, और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे यूपीपीएससी पीसीएस के साक्षात्कारों में भी उम्मीदवारों से यह सवाल पूछा गया है कि इसे विज्ञान क्यों कहा जाता है।
व्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन की वैज्ञानिक पद्धति
किसी भी ज्ञान शाखा को विज्ञान मानने की पहली शर्त यह होती है कि उसमें अध्ययन क्रमबद्ध और व्यवस्थित तरीके से किया जाए। राजनीति विज्ञान इसी सिद्धांत को पूरी तरह से लागू करता है। इस विषय में राज्य की उत्पत्ति, सरकारों की संरचना, विधायी प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों का मनमाना अध्ययन नहीं किया जाता, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और ठोस आंकड़ों के आधार पर पड़ताल की जाती है।
किसी भी राजनीतिक व्यवस्था का विश्लेषण करने के लिए एक तय वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। सबसे पहले वास्तविक धरातल से तथ्य और आंकड़े जुटाए जाते हैं। इसके बाद उस डेटा का तार्किक वर्गीकरण किया जाता है और गहन परीक्षण के बाद ही किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है। यह चरणबद्ध तरीका इसे विशुद्ध रूप से व्यवस्थित अध्ययन बनाता है।
कारण और प्रभाव का निश्चित संबंध
भौतिक विज्ञान की तरह राजनीति विज्ञान में भी कारण और प्रभाव का गहरा ताल्लुक देखा जाता है। समाज या राजनीति के क्षेत्र में घटने वाली प्रत्येक घटना के पीछे कोई न कोई ठोस वजह मौजूद होती है। राजनीतिक विचारक इसी आधार पर घटनाओं की व्याख्या करते हैं।
इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है। जब किसी मुल्क में बेरोजगारी और महंगाई चरम पर पहुंच जाती है, तो यह एक ठोस कारण बनता है। इसका सीधा प्रभाव यह होता है कि जनता सत्ताधारी सरकार के खिलाफ मतदान करती है या फिर क्रांति का रास्ता चुनती है। राजनीति वैज्ञानिक ऐसे ही कारणों और उनके प्रभावों के पैटर्न का विश्लेषण करके यह तय करते हैं कि किसी नई नीति या कानून का समाज पर किस तरह का असर पड़ सकता है।
प्रयोगशाला के रूप में संपूर्ण समाज
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि राजनीति विज्ञान में कोई बंद कमरा या रसायनों वाली लैब नहीं होती, इसलिए यहां परीक्षण संभव नहीं हैं। लेकिन हकीकत यह है कि राजनीति विज्ञान के लिए समूचा मानव समाज ही एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह काम करता है।
जब कोई देश अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव करता है, जैसे राजशाही व्यवस्था को छोड़कर लोकतांत्रिक ढांचे को अपनाना या फिर पूरी तरह से नया संविधान लागू करना, तो वह दरअसल एक बड़े पैमाने का राजनीतिक प्रयोग ही होता है। इसी तरह जब सरकारें कोई नया कर नियम लागू करती हैं या जनहित की नई योजनाएं लाती हैं, तो उनके परिणामों की लगातार निगरानी और समीक्षा की जाती है। समाज पर इन नीतियों के प्रभाव को देखकर ही उनमें जरूरी संशोधन किए जाते हैं।
पूर्वानुमान और रुझानों का सटीक विश्लेषण
रसायन विज्ञान की तरह राजनीति विज्ञान में शत-प्रतिशत सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं हो सकती, क्योंकि इसका अध्ययन विषय मानव व्यवहार से जुड़ा है। इसके बावजूद उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सटीक रुझान और पूर्वानुमान सामने रखे जाते हैं।
चुनावों के दौर में ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल का सांख्यिकीय डेटा यह संकेत देने में सक्षम होता है कि किस राजनीतिक दल का पलड़ा भारी रहने वाला है। ठीक इसी प्रकार, अनुभवी राजनीतिक विचारक वर्तमान वैश्विक और आर्थिक आंकड़ों के आधार पर यह पहले ही रेखांकित कर देते हैं कि किसी देश की विदेश नीति या वित्तीय फैसलों का आने वाले वक्त में क्या नतीजा निकलेगा।
प्राकृतिक विज्ञान से अलग सामाजिक विज्ञान का स्वरूप
राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक विज्ञान की श्रेणी में गिना जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसके अध्ययन के केंद्र में इंसान और मानवीय समाज होते हैं, जिनकी मनोदशा और प्रतिक्रियाएं परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं।
गुरुत्वाकर्षण का भौतिक नियम पूरी धरती पर एक समान लागू रहता है, लेकिन राजनीति के नियम अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बदल जाते हैं। यही वजह है कि राजनीति विज्ञान को एक निरंतर विकसित होने वाला और गतिशील सामाजिक विज्ञान माना जाता है।



















