वर्ष 1939 से 1945 के बीच लड़े गए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मोर्चे पर तैनात सैनिकों तक पौष्टिक खुराक पहुंचाना भारी चुनौती बन गया था। युद्ध के मैदान अक्सर ऐसी वीरान या दुर्गम जगहों पर होते थे जहां न तो कोई सैन्य भोजनालय मौजूद होता था और न ही चूल्हा जलाकर ताजा खाना पकाने की कोई गुंजाइश रहती थी। इसी भारी संकट को देखते हुए विशेष राशन पैकेट तैयार करने की नीति अपनाई गई, जिन्हें जवान अपनी वर्दी या बैग में आसानी से रखकर चल सकें और वक्त जरूरत तुरंत पेट भर सकें। इस व्यवस्था के तहत अमेरिकी सैन्य बलों के लिए के-राशन, सी-राशन तथा डी-राशन जैसे कई अलग-अलग आपातकालीन खानपान प्रारूप विकसित किए गए।
हल्के और सुविधाजनक के-राशन की रूपरेखा
अमेरिकी सेना ने के-राशन का निर्माण विशेष रूप से उन टुकड़ियों के लिए किया था जिन्हें तेजी से आगे बढ़ना होता था और जिन्हें बेहद हल्के वजन वाला भोजन चाहिए था। इस विशेष पैक को आधिकारिक तौर पर साल 1942 में सेना की रसद में शामिल किया गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के लिए अलग-अलग बक्से निर्धारित किए गए थे। इन पैकेटों के भीतर सैनिकों को बिस्कुट, डिब्बे में बंद प्रिजर्व मीट, चीज, तुरंत घुलने वाली इंस्टेंट कॉफी, चीनी, फ्रूट बार और च्यूइंग गम जैसी चीजें मुहैया कराई जाती थीं। कुछ विशेष खेपों में नींबू रस का पाउडर और चॉकलेट भी डाली जाती थी ताकि जवानों को ऊर्जा मिलती रहे।
खानपान के अलावा के-राशन के डिब्बों में कई जरूरी दैनिक सामग्री भी शामिल की जाती थी। सैनिकों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए इनमें सिगरेट, पानी को पीने लायक बनाने वाली शुद्धिकरण गोलियां और टॉयलेट पेपर जैसी चीजें भी रखी जाती थीं। हालांकि, युद्ध की जरूरतों और मौसम के हिसाब से इन पैकेटों में समय-समय पर बदलाव भी किए जाते रहे।
सी-राशन में लंबे समय तक टिकने वाला भोजन
के-राशन के साथ-साथ सैनिकों के व्यापक इस्तेमाल के लिए सी-राशन की व्यवस्था भी की गई थी। सी-राशन मुख्य रूप से टिन के डिब्बों में बंद पके हुए मीट और अन्य ठोस भोजन पर आधारित था। इस किट में सूखे बिस्कुट या क्रैकर्स, चीनी और इंस्टेंट कॉफी के पाउच शामिल रहते थे। डिब्बाबंद होने के कारण यह खाना महीनों तक खराब नहीं होता था और किसी भी प्रतिकूल मौसम में सुरक्षित रहता था। इस राशन की एक बड़ी कमी यह थी कि शुरुआती दौर में इसमें व्यंजनों की विविधता बहुत सीमित थी, जिसके चलते जवानों को लगातार कई हफ्तों तक एक ही जैसा स्वाद बार-बार खाना पड़ता था।
आपातकालीन ऊर्जा के लिए खास डी-राशन
नियमित नाश्ते या दोपहर के खाने से हटकर डी-राशन को पूरी तरह संकटकालीन परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया था। यह कोई पूर्ण भोजन नहीं था, बल्कि अत्यधिक पोषक तत्वों और कैलोरी से भरपूर चॉकलेट बार का एक विशेष रूप था। इसे इसलिए बनाया गया था ताकि जब सैनिक भोजन से पूरी तरह कट जाएं, तब यह बार उन्हें तुरंत शारीरिक ऊर्जा प्रदान कर सके। यह बाजार में मिलने वाली सामान्य मीठी चाकलेट जैसी स्वादिष्ट नहीं थी, बल्कि इसे उच्च तापमान और अत्यधिक गर्मी में भी बिना पिघले टिके रहने के हिसाब से सख्त बनाया गया था।
विश्व भर की सेनाओं में अलग-अलग खानपान
युद्ध में शामिल सभी देशों के सैनिकों को एक जैसा खाना बिल्कुल नहीं मिलता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अलग-अलग मुल्कों ने अपने देश की खानपान परंपरा, उपलब्ध संसाधनों और युद्ध क्षेत्र के भौगोलिक हालात के अनुसार अपने सैनिकों के लिए रसद तैयार की थी। किसी भी सैनिक को हर रोज केवल पैकेटबंद भोजन पर निर्भर नहीं रखा जाता था। जब भी मोर्चे के पीछे हालात सामान्य होते थे या सुरक्षित ठिकाना मिलता था, तब सैन्य बावर्चीखानों में बना ताजा और गर्म खाना ही जवानों को परोसा जाता था।

















