हेल्थकेयर और चिकित्सा के क्षेत्र में डॉक्टरों की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही अहमियत दवाओं को तैयार करने और उनकी सही खुराक तय करने वाले फार्मासिस्ट की भी होती है। दवा की बनावट, उसमें मौजूद रासायनिक मिश्रण और फार्मूले की बारीकियों को समझने की जिम्मेदारी फार्मासिस्ट बखूबी निभाते हैं। कोरोना महामारी के दौर के बाद से वैश्विक स्तर पर दवा उद्योग का महत्व काफी बढ़ चुका है, जिसके चलते स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ी संख्या में युवा इस दिशा में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अधिकांश छात्रों के सामने यह दुविधा आती है कि वे चार वर्ष के बैचलर डिग्री प्रोग्राम बीफार्मा में प्रवेश लें या फिर दो वर्ष के डिप्लोमा कोर्स डीफार्मा को चुनें। दोनों ही पाठ्यक्रम पूरी तरह से दवाओं के विज्ञान और फार्मास्युटिकल दुनिया से जुड़े हैं, लेकिन इनके अध्ययन का स्तर, पाठ्यक्रम की समयावधि, औद्योगिक मांग और शुरुआती वेतन में काफी अंतर देखा जाता है। अपने करियर के लक्ष्यों के अनुसार सही निर्णय लेने के लिए इन दोनों पाठ्यक्रमों के मुख्य पहलुओं को समझना जरूरी है।
कोर्स की संरचना और अध्ययन का दायरा
डिप्लोमा इन फार्मेसी यानी डीफार्मा केवल 2 साल की अवधि का एक संक्षिप्त पाठ्यक्रम है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को दवाओं की बुनियादी जानकारी, खुदरा व थोक दवा व्यापार की कार्यप्रणाली, दवाओं की निर्धारित खुराक और किसी मेडिकल स्टोर के व्यावहारिक संचालन से जुड़ी जमीनी समझ देना है। यह उन लोगों के लिए मुफीद माना जाता है जो कम समय में पढ़ाई पूरी करके सीधे फार्मेसी के कामकाज में उतरना चाहते हैं।
दूसरी ओर, बैचलर इन फार्मेसी यानी बीफार्मा 4 साल का विस्तृत स्नातक डिग्री प्रोग्राम है। इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत दवा निर्माण के तकनीकी सिद्धांतों, प्रयोगशाला परीक्षण, नए केमिकल फॉर्मूलेशन के विकास, अनुसंधान और फार्मास्यूटिकल विनिर्माण उद्योग के जटिल पहलुओं की गहन व व्यापक पढ़ाई कराई जाती है। यह डिग्री छात्रों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ औद्योगिक स्तर पर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार करती है।
प्रवेश पात्रता और चयन प्रक्रिया
शैक्षणिक योग्यता के मामले में दोनों ही पाठ्यक्रमों के नियम समान हैं। आवेदक का 12वीं कक्षा में विज्ञान वर्ग से उत्तीर्ण होना जरूरी है, जिसमें फिजिक्स और केमिस्ट्री के साथ-साथ गणित या बायोलॉजी में से कोई एक विषय होना अनिवार्य है। यानी पीसीएम या पीसीबी दोनों ही स्ट्रीम के विद्यार्थी इसके पात्र होते हैं।
दाखिले की प्रक्रिया की बात करें तो विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में मेरिट के आधार पर या प्रवेश परीक्षाओं के जरिए चयन होता है। कई राज्यों में राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं, जबकि उच्च स्तरीय संस्थानों में जीपैट (GPAT) जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं अथवा विशिष्ट टेस्ट के जरिए सीटें आवंटित की जाती हैं।
करियर के अवसर और जिम्मेदारी
यदि कोई छात्र जल्द से जल्द पढ़ाई पूरी करके खुद की केमिस्ट शॉप खोलना चाहता है या किसी अस्पताल में डिस्पेंसर के रूप में व्यावहारिक सेवाएं देना चाहता है, तो डीफार्मा सबसे सीधा और व्यावहारिक मार्ग उपलब्ध कराता है। इसके अलावा डिप्लोमा धारक दवा कंपनियों में सेल्स रिप्रेजेंटेटिव के तौर पर भी अपनी सेवाएं शुरू कर सकते हैं।
इसके विपरीत, जो युवा बड़े अनुसंधान का हिस्सा बनना चाहते हैं, दवा नियंत्रक या ड्रग इंस्पेक्टर के प्रतिष्ठित पद पर जाना चाहते हैं अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फार्मा उद्योग में लंबी छलांग लगाने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए बीफार्मा की डिग्री आवश्यक है। फार्मास्युटिकल क्षेत्र आर्थिक मंदी के दौर में भी स्थिर रहने वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। बीफार्मा उत्तीर्ण करने वालों के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट, क्वालिटी कंट्रोल, क्लीनिकल रिसर्च और मेडिकल कोडिंग जैसे उच्च स्तरीय तकनीकी विभागों के रास्ते पूरी तरह खुल जाते हैं।
शुरुआती पैकेज और कमाई की संभावनाएं
कमाई के नजरिए से देखें तो डीफार्मा पूरा करने के बाद करियर की शुरुआत में मासिक वेतन आमतौर पर 15,000 रुपये से 25,000 रुपये के बीच रहता है। वहीं अपना मेडिकल स्टोर शुरू करने पर कमाई दुकान की बिक्री और संचालन पर निर्भर करती है।
दूसरी तरफ बीफार्मा ग्रेजुएट्स को कॉर्पोरेट और रिसर्च सेक्टर में बेहतर पैकेज मिलते हैं। शुरुआत में ही वार्षिक पैकेज 3 लाख से 6 लाख रुपये या इससे भी अधिक मिल सकता है। आगे चलकर यदि कोई पेशेवर एमफार्मा या एमबीए जैसी उच्च डिग्री हासिल कर लेता है, तो उसकी पदोन्नति और वेतन वृद्धि की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं।



















