शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में भक्ति और रचनात्मकता का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। शहर के अलग-अलग मुहल्लों में स्थापित पूजा पंडालों में इस बार देवी के विविध स्वरूपों के साथ-साथ गंभीर सामाजिक विषयों और पौराणिक आख्यानों को बड़ी बारीकी से पेश किया गया है। दर्शनार्थियों के कदम हर उस चौराहे की तरफ बढ़ रहे हैं जहां कलाकारों ने अपनी कल्पनाशीलता से देवी दुर्गा के दरबार को बिल्कुल निराला रूप दे दिया है।
मसनगंज: कॉपियों और पेंसिलों से तराशी गई कारीगरी
शहर के मसनगंज इलाके में स्थापित पंडाल की चर्चा इस समय हर जुबान पर है। यहां की दुर्गा पूजा समिति ने सजावट के पारंपरिक तौर-तरीकों से हटकर स्कूली स्टेशनरी का इस्तेमाल किया है। पेंसिलों, रबर और दफ्तरी सामानों को जोड़कर न केवल विशाल मंडप की आंतरिक संरचना तैयार की गई है, बल्कि मां भगवती की प्रतिमा के अलंकरण में भी इन्हीं सामग्रियों का अनूठा प्रयोग देखने को मिल रहा है। इस अनूठी शिल्पकला को निहारने के लिए सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं की कतारें लगी हुई हैं।
शिव टॉकीज चौक: हिमालयी तबाही के बीच मां की ममता
शिव वाहिनी दुर्गा उत्सव समिति ने शिव टॉकीज चौक पर अपनी सजावट के जरिए केवल धार्मिक औपचारिकता निभाने के बजाय एक गहरा सामाजिक संदेश दिया है। यहां पड़ोसी मुल्क नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक विपदा के दृश्यों को बेहद जीवंत रूप में उकेरा गया है। पंडाल में दिखाया गया है कि जलप्रलय के बीच असहाय फंसे इंसानों की हिफाजत के लिए मां दुर्गा स्वयं रक्षक बनकर सामने आती हैं। तिनके की तरह बहते घरों और पानी में घिरे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालते हुए देवी की यह झांकी संकट के समय मानवीय संवेदना और राहत कार्य की अहमियत को रेखांकित करती है।
तिफरा: ध्यानमग्न साधकों की मुद्रा में देवगण
तिफरा क्षेत्र में जय मां काली दुर्गा उत्सव समिति अपने उत्सव के 10 वर्ष पूरे कर रही है। एक दशक की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए आयोजकों ने पंडाल के भीतर गहन आध्यात्मिक शांति का वातावरण रचा है। यहां आदिशक्ति के सानिध्य में विराजमान अन्य समस्त देवी-देवताओं को किसी राजसी ठाठ-बाट के बजाय घने जंगलों में तपस्यारत प्राचीन ऋषि-मुनियों की तरह ध्यानावस्था में दिखाया गया है। कठिन साधना और योग मुद्रा को दर्शाती ये प्रतिमाएं यहां पहुंचने वाले हर भक्त को अंतर्मुखी होने की प्रेरणा दे रही हैं।
तेलीपारा: पांच दशकों की विरासत और करोड़ों का वैभव
बिलासपुर के तेलीपारा में चंद्रशेखर आजाद दुर्गा उत्सव समिति का आयोजन इस बार अपने 50वें गौरवशाली वर्ष में प्रवेश कर चुका है। स्वर्ण जयंती के इस पड़ाव पर समिति ने अपनी आधी सदी पुरानी प्रतिष्ठा के अनुरूप ही एक अत्यंत भव्य और नयनाभिराम मंडप का निर्माण कराया है। इस निर्माण पर करोड़ों रुपये की धनराशि खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। पंडाल का वास्तुशिल्प और रोशनी की व्यवस्था इतनी मनमोहक है कि इसे देखने के लिए शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी श्रद्धालु उमड़ रहे हैं।
उदाई चौक: सुर्ख लाल परिधान और नीले गगन की छटा
उदाई चौक पर जय संतोषी मां दुर्गा उत्सव समिति ने रंगों के चयन में अद्भुत संतुलन साधा है। यहां जगदंबा की प्रतिमा को गाढ़े लाल रंग के पारंपरिक वस्त्र पहनाए गए हैं, जो तेज और शक्ति का संचार करते हैं। इसके विपरीत पूरे मंडप को शांत आसमानी नीले रंग के पर्दों और आभा से सजाया गया है। लाल और आसमानी रंग का यह कंट्रास्ट दूर से ही आने वालों की आंखों को शीतलता प्रदान करता है, जहां अन्य देवी-देवताओं की आकृतियों को भी विशेष अलंकरण से नवाजा गया है।
जूना बिलासपुर किला वार्ड: कुरुक्षेत्र का वह रौद्र रूप
सार्वजनिक उत्सव समिति किलावार्ड, जूना बिलासपुर इस समय अपने आयोजन का 58वां वर्ष मना रही है। इस लगभग छह दशक पुराने मंच पर द्वापर युग के महाभारत काल का वह क्षण साकार किया गया है, जब रणभूमि में अर्जुन का मोह भंग करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम विराट और रौद्र स्वरूप का साक्षात्कार कराया था। मंडप के केंद्र में भगवान कृष्ण की इसी विराट प्रतिमा को स्थापित किया गया है, जिसके तेज और विशालता को देखकर श्रद्धालु नतमस्तक हो रहे हैं।
हटरी चौक: श्वेत परिधानों में शांति का संदेश
हटरी चौक पर स्थित एकता दुर्गा उत्सव समिति लगातार 49 वर्षों से मां की चौकी सजा रही है। अपने अर्धशतक की दहलीज पर खड़ी इस समिति ने इस दफा सादगी और दिव्यता का रास्ता चुना है। यहां मां दुर्गा को पूरी तरह से धवल यानी सफेद रेशमी वस्त्रों में सुसज्जित किया गया है। चमचमाती सफेद पोशाक में मां का यह शांत स्वरूप दर्शकों को अनायास ही अपनी ओर खींच लेता है और पंडाल में निरंतर चहल-पहल बनी हुई है।
शांति लॉज गली और पुराना बस स्टैंड: सिंह वाहिनी और योगमाया
जूना बिलासपुर की शांति लॉज गली में सजे पंडाल में पारंपरिक शक्ति की महिमा बिखरी हुई है। यहां मां दुर्गा को उनके चिर-परिचित सिंह वाहिनी अवतार में स्थापित किया गया है। शेरों पर सवार मां की गर्जना करती मुद्रा भक्तों के भीतर श्रद्धा और उत्साह भर देती है। वहीं दूसरी ओर, तेलीपारा के पुराने बस स्टैंड पर विराजी प्रतिमा में श्रीकृष्ण लीला का पुट दिया गया है। यहां आदिशक्ति को योगमाया के अलौकिक रूप में गढ़ा गया है, जिसकी मनोहारी मुस्कान और दार्शनिक भावभंगिमा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुट रहे हैं।



















