बिलासपुर के रेलवे कॉलोनी में स्थित सुमुख गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी के अवसर पर श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है और यहां भक्तों की अटूट आस्था साफ नजर आ रही है। लगभग 75 वर्षों से यह मंदिर लोगों की श्रद्धा का मुख्य केंद्र बना हुआ है, जहां छत्तीसगढ़ के अलावा पुराने मध्य प्रदेश के विभिन्न इलाकों से भी लोग दर्शन और पूजन के लिए आते हैं। ऐसी गहरी मान्यता है कि यहां सच्चे दिल से भगवान गणेश के सामने जो भी मनोकामना रखी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है। यही कारण है कि कई परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस पवित्र स्थल पर पूजा-अर्चना करने के लिए लगातार आ रहे हैं। स्थानीय लोगों और भक्तों का विश्वास है कि भगवान गणेश की असीम कृपा से उनके घरों में सुख और समृद्धि का वास हुआ है तथा उनके बच्चों ने शिक्षा पूरी करने के बाद जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ी सफलता प्राप्त की है।
टिन के छोटे शेड से भव्य मंदिर तक का सफर
सुमुख गणेश मंदिर के अध्यक्ष बी. कृष्ण कुमार के अनुसार, बिलासपुर में भगवान गणेश की स्थापना को लगभग 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस ऐतिहासिक मंदिर की शुरुआत बेहद साधारण रूप में हुई थी, जहां शुरुआती दिनों में एक छोटे से टिन के शेड के नीचे भगवान की पूजा की जाती थी। वक्त बीतने के साथ-साथ भक्तों की बढ़ती श्रद्धा और उनके निरंतर सहयोग से मंदिर का दायरा बढ़ता गया, जो आज एक विशाल और भव्य मंदिर का रूप ले चुका है। मंदिर के अध्यक्ष यह भी बताते हैं कि यहां की पूजा-पद्धति बेहद खास है, क्योंकि इस मंदिर में सभी अनुष्ठान पूरी तरह से दक्षिण भारतीय परंपरा और वैदिक विधि-विधान के अनुसार ही संपन्न किए जाते हैं।
तमिलनाडु से आए परिवारों ने रखी थी नींव
मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए अध्यक्ष बी. कृष्ण कुमार बताते हैं कि शुरुआती समय में रेलवे कॉलोनी में तमिलनाडु से आकर कुछ परिवार बसे हुए थे, जिनके मन में भगवान गणेश के प्रति गहरी और अनन्य आस्था थी। सबसे पहले इन परिवारों ने अपने-अपने घरों के भीतर ही गणेश जी की आराधना शुरू की थी। इसके बाद सभी जरूरी प्रशासनिक अनुमति और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद मंदिर परिसर में भगवान गणेश की मूर्ति की आधिकारिक स्थापना की गई। समय के पहिए के साथ यह मंदिर केवल रेलवे कॉलोनी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे बिलासपुर शहर के निवासियों के लिए आस्था का एक सर्वप्रमुख केंद्र बन गया।
सर्वधर्म समभाव और हर वर्ग की सहभागिता
बी. कृष्ण कुमार का यह भी कहना है कि सुमुख गणेश मंदिर की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि यहां किसी एक खास समाज या वर्ग के लोग ही नहीं पहुंचते, बल्कि समाज के हर तबके और हर धर्म के लोग दर्शन करने आते हैं। उनका दावा है कि अन्य धर्मों के कई श्रद्धालु भी भगवान गणेश में गहरी आस्था रखते हैं और नियमित रूप से मंदिर आकर पूजा-अर्चना करते हैं। गणेश चतुर्थी के पावन पर्व के दौरान तो मंदिर में आने वाले भक्तों की संख्या में भारी इजाफा हो जाता है और पूरा परिसर उत्सव के रंग में रंग जाता है।
भक्तों के अनोखे और चमत्कारी अनुभव
मंदिर दर्शन करने पहुंचीं प्रियंका राय ने बताया कि वह इस मंदिर में दूसरी बार आईं हैं। उन्होंने कहा कि गणेश चतुर्थी के दौरान मंदिर की भव्य सजावट और वहां उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखकर उन्हें बेहद खुशी महसूस हुई है। उन्होंने साझा किया कि इस मंदिर की प्राचीनता और यहां वर्षों से चली आ रही पूजा की परंपरा के बारे में उन्होंने पहले भी सुन रखा था। उनके मुताबिक, इस मंदिर में विभिन्न धर्मों के लोगों को एक साथ शांति से पूजा करते देखना एक अपने आप में बेहद अनूठा और सुखद अनुभव है।
अपनी आस्था का मार्मिक अनुभव साझा करते हुए प्रतीक्षा देवांगन ने बताया कि उनका सरकारी क्वार्टर मंदिर के ठीक पीछे ही स्थित है। जब वह पहली बार इस मंदिर में आईं थीं, तब उन्होंने भगवान गणेश से प्रार्थना की थी कि उन्हें मनपसंद क्वार्टर आवंटित हो जाए। उनके अनुसार, मंदिर से अपने घर वापस लौटने के महज डेढ़ घंटे के भीतर ही उनके पास क्वार्टर मिलने से जुड़ा फोन आ गया था। इस चमत्कारिक घटना के बाद से उनकी इस मंदिर के प्रति श्रद्धा और अधिक मजबूत हो गई है। वह बताती हैं कि क्वार्टर मिलने और वहां शिफ्ट होने के बाद से वह हर रोज मंदिर आती हैं और यहां सेवा कार्य में भी हाथ बंटाती हैं।
विशेष भोग और पारंपरिक व्यंजन
मंदिर में भगवान गणेश को उनकी पसंद का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। जानकारों के अनुसार, उत्तर भारत में आमतौर पर मैदे से गुजिया के आकार का मोदक तैयार किया जाता है, जबकि दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार चावल के आटे से मोदक बनाकर उसे भाप में पकाया जाता है। इसके अलावा भगवान गणेश को बेसन के लड्डू, ताजे केले, गन्ने और ककड़ी समेत कई अन्य प्रकार की चीजों का भोग श्रद्धा के साथ लगाया जाता है।
वर्ष 1993 से लगातार मंदिर आ रहे एक पुराने श्रद्धालु ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि वह पिछले कई दशकों से इस स्थान से जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार, यहां होने वाली आरती, पूजा और वैदिक मंत्रोच्चार के दौरान मन को एक अलग ही प्रकार की शांति और सुकून मिलता है। केवल गणेश चतुर्थी ही नहीं, बल्कि वह साल की हर महीने आने वाली चतुर्थी पर भी मंदिर पहुंचकर दर्शन करने का पूरा प्रयास करते हैं। उन्होंने बताया कि सुबह की पूजा के समय मंदिर में भक्तों की संख्या सीमित होती है, जिसके चलते उस वक्त वहां बेहद शांत और गहरा आध्यात्मिक वातावरण महसूस होता है।



















