छत्तीसगढ़ के इतिहास में सबसे दर्दनाक और दहला देने वाले हादसों में शामिल झीरम घाटी नक्सली हमले में 13 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार अदालत का फैसला आ गया है। NIA की विशेष अदालत ने इस मामले में सभी 10 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई है। विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इससे पहले अदालत ने 5 सितंबर को इन सभी आरोपियों को दोषी करार दिया था। इस सजा के साथ ही 2013 के इस भीषण नरसंहार के पीड़ितों के परिवारों को एक बड़ा इंसाफ मिला है।
24 धाराओं में मुकदमा, 7 में मिली मौत की सजा
इस मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश किए। अदालत ने पाया कि आरोपियों पर कुल 24 अलग-अलग धाराएं लगाई गई थीं। कानूनी बारीकियों और अपराध की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने इनमें से 7 गंभीर धाराओं के तहत दोषियों को मृत्युदंड की सजा दी है। इस फैसले ने देश में नक्सली हिंसा के खिलाफ एक कड़ा संदेश दिया है। सजा पाने वाले आरोपियों में सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पूनम मोडियम का नाम भी शामिल है।
2013 का वह खूनी मंजर और झीरम घाटी का घात
यह खूनी घटना साल 2013 की है जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज थी। कांग्रेस पार्टी पूरे राज्य में अपनी 'परिवर्तन यात्रा' निकाल रही थी। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जब बस्तर की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तभी पहले से घात लगाकर बैठे सैकड़ों नक्सलियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। पहाड़ियों से घिरी इस तंग घाटी में कांग्रेस नेताओं के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। नक्सलियों की इस कायराना गोलीबारी में कुल 27 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी, जबकि 15 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस हमले ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेतृत्व की एक पूरी पीढ़ी को खत्म कर दिया था।
इस भीषण हमले में जान गंवाने वालों में तत्कालीन छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल शामिल थे। इनके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और वरिष्ठ नेता उदय मुदलियार ने भी इस हमले में अपनी जान गंवाई। बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ खड़े हुए 'सलवा जुडूम' आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार महेंद्र कर्मा को भी नक्सलियों ने बेरहमी से निशाना बनाया था। इस घटना को देश के इतिहास में सबसे बड़े राजनीतिक नक्सली हमलों में से एक माना जाता है।
जांच पर उठे सवाल: कांग्रेस ने एनआईए को घेरा
हालांकि इस अदालती फैसले के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर इस हमले की जांच को लेकर बहस तेज हो गई है। PCC अध्यक्ष दीपक बैज ने इस जांच प्रक्रिया और NIA की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। दीपक बैज का आरोप है कि NIA ने इस मामले में केवल खानापूर्ति की है और असली मास्टरमाइंड अभी भी कानून की गिरफ्त से बाहर हैं। उनका कहना है कि जिन 10 लोगों को सजा मिली है, वे बड़े नक्सली नेता नहीं हैं। बड़े नक्सली नेताओं को सरकारी संरक्षण हासिल है और यदि उनसे कड़ाई से पूछताछ की जाती, तो कई बड़े BJP नेताओं के नाम और इस साजिश के पीछे के राज बेनकाब हो जाते।
इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी इस अदालती फैसले और जांच पर असंतोष व्यक्त किया है। भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि NIA ने इस मामले की गहराई से जांच नहीं की और वास्तविक दोषियों को पकड़ने में पूरी तरह नाकाम रही। उन्होंने कहा कि घटना के समय मौके पर मौजूद रहे चश्मदीद गवाहों से न तो कोई पूछताछ की गई और न ही उनके बयान दर्ज किए गए। पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि FIR से मुख्य आरोपियों के नाम सुनियोजित तरीके से हटा दिए गए थे। उनका सवाल है कि जब इस हमले में 200 से अधिक नक्सली शामिल थे, तो केवल 10 लोगों को सजा मिलने से पूर्ण न्याय कैसे सुनिश्चित हो सकता है।



















