रबी मौसम के दौरान सरसों की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत जरिया साबित हो सकती है। बाजार में शुद्ध सरसों तेल की लगातार मांग बनी रहती है, जिससे अच्छी उपज होने पर काश्तकारों को उपज का वाजिब मूल्य भी प्राप्त होता है। हालांकि अधिकतम पैदावार जुटाने के लिए केवल उन्नत किस्म के बीज खरीद लेना अथवा सामान्य रासायनिक खादों का छिड़काव कर देना पर्याप्त नहीं होता। बुवाई की तकनीक से लेकर संतुलित पोषण और सही समय पर पानी देने की व्यवस्था ही फसल की दिशा तय करती है। तिलहनी फसलों में विशेष तौर पर गंधक यानी सल्फर का उपयोग पौधों की वानस्पतिक बढ़वार के साथ दानों में तेल की सघनता बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
बीज की सटीक मात्रा का चयन जरूरी
खेत तैयार करते समय अक्सर किसान जरूरत से अधिक बीज का इस्तेमाल कर बैठते हैं, जिससे बाद में पौधे घने हो जाते हैं और उनकी बढ़वार प्रभावित होती है। कृषि विशेषज्ञ डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार, बीज दर का निर्धारण किस्म और खेत के रकबे के हिसाब से होना चाहिए। यदि किसान एक कट्ठा जमीन में हाइब्रिड किस्म लगाने की योजना बना रहे हैं, तो इसके लिए लगभग 50 ग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त मानी जाती है। वहीं दूसरी तरफ रिसर्च प्रभेद यानी ओपन पॉलिनेटेड किस्मों की बुवाई के लिए प्रति कट्ठा करीब 90 ग्राम बीज की दर अनुशंसित की जाती है।
बड़े पैमाने पर खेती करने वाले किसानों के लिए हेक्टेयर के हिसाब से बीज की दर तय करना लाभकारी रहता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रति हेक्टेयर लगभग 2.5 किलोग्राम बीज का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके विपरीत शोध आधारित विशेष प्रभेदों के मामले में स्थानीय कृषि परिस्थितियों और मिट्टी की गुणवत्ता को देखते हुए यह मात्रा 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक रखी जा सकती है। जरूरत से ज्यादा बीज डालने से खेत में पौधों के बीच संघर्ष बढ़ता है, जिससे फसल कमजोर पड़ सकती है।
छिटकवां पद्धति के बजाय कतार में बुवाई के लाभ
परंपरागत तौर पर कई काश्तकार आज भी छिटकवां विधि से सरसों के बीज खेत में बिखेर देते हैं। इस पद्धति का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि खेत के किसी हिस्से में पौधे बहुत घने उग आते हैं, जबकि कुछ हिस्से खाली रह जाते हैं। असमान दूरी के कारण पौधों को जमीन से जरूरी पोषक तत्व, नमी और ऊपर से धूप समान रूप से नहीं मिल पाती, जिससे फसल की पैदावार घट जाती है।
इस समस्या से बचने के लिए किसानों को लाइन यानी कतार बनाकर ही बुवाई करनी चाहिए। कतारबद्ध बुवाई करते समय पौधे से पौधे की आपसी दूरी करीब 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। वहीं एक लाइन से दूसरी लाइन के बीच लगभग 30 सेंटीमीटर का फासला रखना बेहद मुफीद साबित होता है। इस निश्चित दूरी की वजह से प्रत्येक पौधे को फैलने के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है। साथ ही फसल में खरपतवार निकालने, निराई-गुड़ाई करने और सुरक्षात्मक छिड़काव के दौरान खेत में आवाजाही आसान हो जाती है।
सल्फर का अनुप्रयोग क्यों माना जाता है अनिवार्य
अधिकांश किसान फसल चक्र में यूरिया, डीएपी और पोटाश का इस्तेमाल तो नियमित रूप से करते हैं, लेकिन सल्फर जैसे महत्वपूर्ण द्वितीयक पोषक तत्व की अनदेखी कर देते हैं। सरसों एक प्रमुख तिलहनी फसल है, जिसमें तेल संश्लेषण के लिए सल्फर की मौजूदगी अनिवार्य होती है। मिट्टी में सल्फर की कमी होने पर पौधे का विकास तो धीमा होता ही है, साथ ही दानों में तेल का प्रतिशत भी घट जाता है।
कृषि विशेषज्ञों के सुझाव के अनुसार, प्रति एकड़ खेत में लगभग 11 किलोग्राम सल्फर का प्रयोग करना चाहिए। सल्फर पौधों के भीतर प्रोटीन और एंजाइम निर्माण की प्रक्रिया को गति देता है, जिससे दानों का आकार सुडौल बनता है और तेल की मात्रा में सीधा सुधार देखने को मिलता है। संतुलित पोषण मिलने से फसल मौसमी बीमारियों और प्रतिकूल तापमान को झेलने में भी सक्षम बनती है।
संतुलित पोषण और सिंचाई का सटीक प्रबंधन
अधिकतम उत्पादन हासिल करने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर का संतुलित अनुपात में प्रयोग किया जाना चाहिए। उर्वरकों की अंतिम मात्रा हमेशा मिट्टी की मौजूदा जांच रिपोर्ट और फसल की वास्तविक मांग के आधार पर तय की जानी चाहिए, ताकि जमीन का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे। पोषण के साथ-साथ नमी का स्तर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
सरसों की फसल में जल प्रबंधन के तहत दूसरी सिंचाई का समय बेहद नाजुक होता है। यह दूसरी सिंचाई हमेशा पौधों पर फूल खिलने से ठीक पहले की जानी चाहिए। इस विशेष चरण में खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध रहने से पौधे तेजी से फूल और फलियां विकसित करते हैं, जिससे दानों का भराव बेहतर होता है। सही बीज दर, कतारबद्ध बुवाई, अनुशंसित सल्फर और समयबद्ध सिंचाई का तालमेल अपनाकर किसान अपनी पैदावार और आमदनी को नया आयाम दे सकते हैं।



















