छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में ग्रामीण युवाओं ने सैलून जाने की लंबी दूरी और जेब पर पड़ने वाले अतिरिक्त खर्च से निपटने के लिए एक व्यावहारिक देसी उपाय खोज निकाला है। पैगा गांव के युवा अब नियमित रूप से किसी महंगे हेयर कटिंग सैलून जाने के बजाय गांव में लगे आम के पेड़ की छांव में बैठकर एक-दूसरे के बाल संवार रहे हैं। यह साझा प्रयास न केवल समय और पैसे की सीधी बचत कर रहा है, बल्कि पारंपरिक आत्मनिर्भर जीवनशैली और पूर्वजों की पुरानी पद्धतियों की जीवंत मिसाल भी पेश करता है।
आदिवासी विरासत और आधुनिक सैलून की चुनौतियों के बीच आत्मनिर्भरता
सरगुजा संभाग मुख्य रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां ग्रामीण समाज आज भी अपनी सांस्कृतिक विरासत और परस्पर सहयोग की परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। आधुनिक दौर में कस्बों और शहरों में बड़े सैलून खुल चुके हैं, लेकिन दूरदराज के इलाकों में रहने वाले युवाओं के लिए वहां तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। इसी को ध्यान में रखते हुए गांव के युवकों ने बाहर जाने के बजाय खुद ही यह हुनर सीखने और आपस में एक-दूसरे की मदद करने का फैसला किया।
सैलून में कारीगरों को देख-देखकर सीखा बाल तराशने का काम
पैगा गांव के निवासी बिरीजेंद्र मझवार ने इस पूरी पहल की जानकारी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने और उनके साथी युवाओं ने कभी कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया। उन्होंने जब भी कभी सैलून का रुख किया, वहां कारीगरों को बाल काटते हुए ध्यान से देखा और धीरे-धीरे इस बारीक हुनर को खुद ही सीख लिया। अब उन्हें नियमित बाल कटवाने के लिए गांव छोड़कर दूर जाने की बिल्कुल जरूरत महसूस नहीं होती।
तीन हेयर स्टाइल में माहिर और आपसी सहयोग का नियम
बिरीजेंद्र मझवार ने बताया कि वे और उनके साथी अब मुख्य रूप से तीन तरह की हेयर कटिंग आसानी से कर लेते हैं, जिनमें सामान्य साधारण कटिंग, डिजाइन वाली विशेष कटिंग और खड़े बालों वाला आधुनिक स्टाइल शामिल है। गांव में जिस भी साथी को बाल कटवाने की जरूरत होती है, अन्य युवा तुरंत कैंची थाम लेते हैं। इस पूरे काम में कोई पैसा नहीं लिया जाता, बल्कि जिसकी कटिंग की जाती है, वह भी बाद में मौका मिलने पर दूसरे साथी के बाल काटकर इस सहयोग को आगे बढ़ाता है।
15 से 16 किलोमीटर की दूरी और पेट्रोल के खर्च से राहत
सैलून जाने से परहेज करने की मुख्य वजह बताते हुए युवा ने स्पष्ट किया कि उनके गांव से नजदीकी सैलून लगभग 15 से 16 किलोमीटर दूर स्थित है। इतनी दूर जाने पर आने-जाने में लंबा समय तो बर्बाद होता ही है, साथ ही मोटरसाइकिल में लगने वाले पेट्रोल का खर्च भी जेब पर भारी पड़ता है। कभी-कभार किसी खास अवसर पर वे सैलून चले जाते हैं, लेकिन सामान्य दिनों में गांव में ही पेड़ की छांव का यह देसी इंतजाम उनकी पहली पसंद रहता है।
छोटे आईने से पीछे की निगरानी और दाढ़ी बनाने की नई तैयारी
इस देसी सैलून में किसी बड़े आधुनिक शीशे या कीमती उपकरणों का कोई तामझाम नहीं है। बाल काटते समय सिर के पिछले हिस्से को देखने के लिए युवा हाथ में एक छोटा सा आईना पकड़ते हैं और उसी के सहारे सही कटिंग सुनिश्चित करते हैं। बिरीजेंद्र मझवार ने बताया कि अभी उन्होंने दाढ़ी सेट करने का काम नहीं सीखा है, लेकिन आने वाले दिनों में वे इस हुनर को भी सीखने का पूरा प्रयास करेंगे ताकि पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकें।



















