घर के आंगन, बाड़ी या छत पर रखे गमलों में ताजी हरी सब्जियां उगाने का शौक रखने वालों के लिए बस्तर का पारंपरिक खट्टा भाजी एक बेहतरीन विकल्प साबित हो रहा है। बस्तर के स्थानीय निवासी चैतन कश्यप ने अपने घरेलू किचन गार्डन में इस पारंपरिक पत्तेदार सब्जी को सफलतापूर्वक तैयार किया है। चैतन कश्यप के अनुसार, खट्टा भाजी की बागवानी करना बेहद सीधा और सरल काम है, जिसे कोई भी व्यक्ति सीमित जगह या साधारण गमलों में आसानी से शुरू कर सकता है।
बुआई और मिट्टी तैयार करने की सरल विधि
इस भाजी को रोपने की शुरुआती प्रक्रिया काफी आसान है। चैतन कश्यप बताते हैं कि पौधे लगाने से पहले फावड़े की मदद से मिट्टी की अच्छी तरह जुताई और गुड़ाई करके जमीन तैयार की जाती है। मिट्टी भुरभुरी हो जाने पर उसमें बीजों का छिड़काव किया जाता है। बीज डालने के तुरंत बाद उस पर गोबर की सड़ी खाद बिखेरी जाती है, जिससे बीजों को पर्याप्त नमी और प्राकृतिक पोषण मिल सके। नियमित और उचित देखरेख करने पर बीजों में बुआई के ठीक एक सप्ताह बाद अंकुरण शुरू हो जाता है।
मात्र 100 से 150 रुपये की लागत में जैविक उत्पादन
घरेलू स्तर पर खट्टा भाजी तैयार करने में बहुत मामूली खर्च आता है। चैतन कश्यप के मुताबिक, इस पूरी बागवानी प्रक्रिया में लगभग 100 से 150 रुपये की ही लागत बैठती है। इसे पूरी तरह से प्राकृतिक और जैविक पद्धति से उगाया जा सकता है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर केवल गोबर की खाद का ही इस्तेमाल होता है। यह कम खर्च में शुद्ध और रसायनमुक्त सब्जी हासिल करने का एक टिकाऊ जरिया बन जाता है।
कीटों का कम प्रभाव और 5 महीने तक नियमित पैदावार
इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता है। खट्टा भाजी के पौधों पर कीटों या बीमारियों का हमला बहुत कम देखने को मिलता है, जिसके चलते इसकी रोजमर्रा की देखभाल काफी झंझटमुक्त रहती है। अगर कभी पत्तों पर छोटे-छोटे छेद नजर आएं, तो जरूरत पड़ने पर कीटनाशक दवा का छिड़काव किया जा सकता है। बीज बोने के लगभग 30 दिनों यानी एक महीने के भीतर इसके पत्ते पूरी तरह से खाने योग्य हो जाते हैं। एक बार पौधा तैयार हो जाए, तो यह लगभग चार से पांच महीने तक लगातार ताजी फसल देता रहता है। कम खर्च, सहज देखभाल और लंबे समय तक मिलने वाली उपज की वजह से इसे घर में उगाना बेहद मुफीद माना जाता है।



















