छत्तीसगढ़ में सरगुजा संभाग के मुख्यालय अंबिकापुर स्थित घड़ी चौक इन दिनों पारंपरिक देसी स्वाद का एक खास केंद्र बना हुआ है। यहां कॉलेज में पढ़ने वाली छात्रा रुचिका गुप्ता अपनी मां के तैयार किए हुए अचार का स्टॉल संभालती हैं। उनकी मां घर पर ही शुद्ध और ताजे मसाले पीसकर तरह-तरह के अचार तैयार करती हैं। ताजे आंवलों और घरेलू मसालों की खुशबू आने-जाने वाले लोगों को आकर्षित करती है, जिसके चलते स्टॉल पर आंवले के अचार की मांग सबसे ज्यादा देखी जा रही है। स्टॉल पर मिलने वाले इस घरेलू अचार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सही तरीके से रखे जाने पर यह एक से डेढ़ साल तक बिल्कुल खराब नहीं होता।
तीन वर्षों से जारी है पारंपरिक अचार का पारिवारिक सफर
रुचिका गुप्ता के घर में अचार बनाने का यह काम पिछले तीन साल से नियमित रूप से चल रहा है। उनके पारिवारिक संग्रह में केवल एक तरह का स्वाद नहीं है, बल्कि वे कई वैरायटी तैयार करते हैं। उनके घर में पारंपरिक आम और नींबू के अलावा तीखी मिर्च, करेला और करील का अचार भी तैयार किया जाता है। हाल ही में इस सूची में आंवले के अचार को एक नए उत्पाद के रूप में शामिल किया गया है, जिसे ग्राहकों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। परिवार का मुख्य उद्देश्य अपनी रसोई के पारंपरिक जायके को आम लोगों की थाली तक पहुंचाना और घरेलू हुनर को एक सम्मानजनक व्यवसाय का रूप देना है।
पारंपरिक विधि से कैसे तैयार होता है आंवले का अचार
आंवले का स्वादिष्ट और टिकाऊ अचार तैयार करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक नियमों पर आधारित है। इसके लिए सबसे पहले स्थानीय बाजार से अच्छी गुणवत्ता वाला ताजा आंवला खरीदा जाता है। घर लाने के बाद इसे पानी से अच्छी तरह धोया जाता है और फिर उबाला जाता है। उबालते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि आंवला मुलायम तो हो जाए, लेकिन वह गलकर पूरी तरह टूटे नहीं।
उबालने के बाद आंवले के टुकड़ों को धूप में सुखाया जाता है। धूप में नमी सूख जाने के बाद आंवले का आकार सामान्य से थोड़ा छोटा हो जाता है। जब सारी नमी खत्म हो जाती है, तब इसमें घर पर ही कूटे और पीसे गए शुद्ध मसाले मिलाए जाते हैं। इसके बाद इसमें सरसों का तेल डाला जाता है। इस प्रक्रिया में सरसों के तेल को पहले अच्छी तरह गर्म किया जाता है और फिर उपयोग में लाया जाता है। कच्चा या ठंडा तेल सीधे अचार में कभी नहीं मिलाया जाता, जिससे अचार का स्वाद और उसकी बनावट दोनों लंबे समय तक बेहतरीन बने रहते हैं।
शिक्षिका मौसी की सलाह बनी कारोबार की शुरुआत
इस घरेलू हुनर को बाजार तक लाने की प्रेरणा रुचिका के परिवार को उनकी मौसी ममता गुप्ता से मिली। ममता गुप्ता बगीचा क्षेत्र में रहती हैं और पेशे से एक शिक्षिका हैं। उन्होंने जब अपनी बहन के हाथों बने स्वादिष्ट भोजन और अचार के हुनर को देखा, तो उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि जब घर में इतना बेहतरीन अचार बनाने की कला मौजूद है, तो इसे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित रखने के बजाय लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
ममता गुप्ता का मानना था कि इससे न केवल परिवार अपने हुनर के दम पर आर्थिक रूप से मजबूत होगा, बल्कि आसपास की दूसरी महिलाओं और परिवारों को भी स्वावलंबन की प्रेरणा मिलेगी। मौसी की इसी उत्साहवर्धक सलाह के बाद रुचिका की मां ने घरेलू स्तर पर अचार का छोटा कारोबार शुरू करने का फैसला लिया।
घर के बने स्वाद की लंबी शेल्फ लाइफ और स्वच्छता
रुचिका के अनुसार, उनकी मां बचपन से ही स्वादिष्ट अचार बनाने में माहिर रही हैं। बाजार में मिलने वाले कई अचार अक्सर कुछ ही हफ्तों या महीनों में खराब हो जाते हैं या उनमें फफूंद लग जाती है, लेकिन उनकी मां के हाथों से तैयार किए गए अचार की बनावट अलग होती है। यदि इसे सूखे चम्मच और साफ बर्तनों के साथ सुरक्षित रखा जाए, तो यह सालभर से डेढ़ साल तक अपनी ताजगी बनाए रखता है। हालांकि अचार की वास्तविक शेल्फ लाइफ उसकी तैयारी, नमी से बचाव, साफ-सफाई, तेल की पर्याप्त मात्रा और भंडारण की सही स्थिति पर निर्भर करती है।
कॉलेज की पढ़ाई और पारिवारिक उद्यम में संतुलन
रुचिका गुप्ता सरस्वती महाविद्यालय की छात्रा हैं और वर्तमान में बीए के अंतिम सेमेस्टर की पढ़ाई कर रही हैं। स्नातक स्तर की पढ़ाई के इस व्यस्त और महत्वपूर्ण पड़ाव पर होने के बावजूद वह रोजाना घड़ी चौक पर अपने पारिवारिक स्टॉल को समय देती हैं। अपनी कॉलेज की कक्षाओं और पढ़ाई के साथ-साथ वह कारोबार के प्रबंधन में पूरी तरह हाथ बंटाती हैं। उनकी यह लगन यह साबित करती है कि अगर सही प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिले, तो घर की पारंपरिक पाक कला भी एक सफल स्थानीय व्यवसाय का आधार बन सकती है।





















