फसल की बंपर पैदावार के लिए जमीन में जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन होना बहुत आवश्यक माना जाता है। कृषि विज्ञान के जानकारों के अनुसार पौधों के समुचित विकास के लिए कुल 17 आवश्यक तत्वों की जरूरत होती है, जिनमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश को सबसे अहम प्राथमिक पोषक तत्व माना गया है। सामान्य तौर पर पारंपरिक खेती में इन तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए विभिन्न रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन प्राकृतिक खेती से जुड़े किसानों के लिए सूक्ष्मजीव आधारित कल्चर एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। कृषि अध्ययन से जुड़े रोहन कुमार वर्मा ने इस जैविक घोल को घर पर ही तैयार करने, उसे आगे बढ़ाने और खेतों में इसका सही इस्तेमाल करने की पूरी प्रक्रिया समझाई है।
पौधों के लिए क्यों जरूरी हैं मुख्य तत्व
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसलों की सेहत और वृद्धि के लिए कुल 17 तरह के खनिज और पोषक तत्व अनिवार्य हैं। इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है, जहां नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश प्राथमिक श्रेणी में आते हैं। रासायनिक कृषि प्रणालियों में इनकी भरपाई के लिए यूरिया और अन्य उर्वरक डाले जाते हैं। इसके विपरीत, जैविक पद्धति अपनाने वाले किसान मिट्टी के भीतर मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और विशेष कल्चर की मदद से इन तत्वों की मात्रा को प्राकृतिक रूप से बढ़ा सकते हैं, जिससे जमीन की सेहत लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
घोल बनाने की चरणबद्ध प्रक्रिया
जैविक कल्चर की मात्रा को बढ़ाने के लिए सबसे पहले लगभग दो सौ लीटर की क्षमता वाला एक प्लास्टिक का ड्रम लिया जाता है। इस ड्रम में सौ लीटर साफ पानी भरकर उसमें करीब पांच सौ मिलीलीटर मदर कल्चर डाला जाता है। इसके बाद सूक्ष्मजीवों के पोषण के लिए इस मिश्रण में लगभग एक किलोग्राम गुड़ मिलाया जाता है। पानी, कल्चर और गुड़ को आपस में अच्छी तरह मिलाने के बाद इस ड्रम को ऊपर से ढककर सुरक्षित रख दिया जाता है ताकि प्रक्रिया ठीक प्रकार से आगे बढ़ सके।
पंद्रह दिनों तक ऐसे करें देखभाल
तैयार किए जा रहे इस घोल को सक्रिय करने के लिए नियमित रूप से विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। रोहन कुमार वर्मा के अनुसार इस मिश्रण को रोजाना सुबह और शाम के वक्त एक निश्चित दिशा में चलाना जरूरी होता है। करीब पंद्रह दिनों तक लगातार यह प्रक्रिया दोहराने के बाद जैविक कल्चर पूरी तरह उपयोग के लिए तैयार हो जाता है, जिसे किसान अपनी फसलों में आसानी से डाल सकते हैं। इस विधि के लगातार प्रयोग से खेतों में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की पूर्ति प्राकृतिक रूप से होती रहती है।
बार-बार बाजार जाने की नहीं होगी जरूरत
इस पूरी तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अन्नदाताओं को हर बार नया पैकेट खरीदने के लिए बाजार के चक्कर नहीं काटने पड़ते हैं। एक बार जब घोल तैयार हो जाता है, तो किसान उसमें से लगभग दस लीटर तरल बचाकर सुरक्षित रख सकते हैं। इसके बाद उस बचे हुए हिस्से में नब्बे लीटर पानी और दो किलोग्राम गुड़ मिलाकर दोबारा प्रक्रिया दोहराई जाती है। इस आसान विधि से पंद्रह दिन के भीतर नया कल्चर फिर से बनकर तैयार हो जाता है, जिसका उपयोग खेती में बार-बार किया जा सकता है।
मिट्टी की उर्वरता और टिकाऊ खेती
प्राकृतिक तरीकों से जुड़े किसानों के लिए यह नुस्खा बेहद किफायती और फायदेमंद साबित हो सकता है। इस प्रकार तैयार किए गए जैविक घोल के इस्तेमाल से जमीन की उपजाऊ शक्ति और उसकी गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए रखा जा सकता है। ऐसे असरदार उपाय अपनाने से किसान धीरे-धीरे रासायनिक खादों पर अपनी पुरानी निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर सकते हैं। रोहन खुद भी अपने खेतों में इसी जैविक तकनीक को अपनाते हैं और इसके सकारात्मक परिणाम हासिल कर रहे हैं।



















