जीवन में परेशानियाँ, तनाव और अनिश्चितता कभी भी पूर्व सूचना देकर नहीं आती हैं। हर किसी के सफर में ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ सब कुछ बिखरता हुआ महसूस होने लगता है। लेकिन आपने निश्चित रूप से ध्यान दिया होगा कि ऐसी विकट स्थितियों में जहाँ अधिकांश लोग घबरा जाते हैं, गुस्सा करने लगते हैं या पूरी तरह हार मान लेते हैं, वहीं कुछ लोग गहरे संकट के बीच भी बिल्कुल शांत और स्थिर बने रहते हैं। कई बार ऐसा आभास होता है कि क्या इन लोगों को दर्द, दबाव या तनाव का अहसास ही नहीं होता है? मनोवैज्ञानिक शोध और अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि यह कोई जादुई ताकत नहीं है, बल्कि मानसिक अभ्यासों, दैनिक आदतों और मस्तिष्क के काम करने के एक खास तरीके का परिणाम है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करें तो हमारा मस्तिष्क किसी भी खतरे, संकट या तनाव की स्थिति में दो मुख्य तरीकों से प्रतिक्रिया करता है। पहला तरीका बिना सोचे-समझे तुरंत रीएक्ट करना होता है और दूसरा तरीका पूरी स्थिति को गहराई से समझकर एक सही रिस्पॉन्स देना होता है। संकट और आपदा के समय जो लोग शांत बने रहते हैं, वे असल में अपने मस्तिष्क के तार्किक हिस्से का सही इस्तेमाल करना अच्छी तरह जानते हैं। वे विपरीत परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने के बजाय खुद को, अपनी भावनाओं को और अपनी सोच को बहुत बेहतरीन ढंग से संभालते हैं। आइए कुछ आसान बिंदुओं और वैज्ञानिक तथ्यों के जरिए विस्तार से समझते हैं कि आखिर कुछ लोग हर बड़े तूफान में भी इतने शांत और अडिग कैसे बने रहते हैं।
अमिग्डाला हाइजैक को रोकना
हमारे मस्तिष्क के भीतर ‘अमिग्डाला’ नाम का एक बहुत छोटा सा हिस्सा मौजूद होता है, जिसका मुख्य कार्य हमें बाहरी खतरों और नुकसान से बचाना होता है। जब भी हमारे सामने कोई मुश्किल स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह हिस्सा हमारे दिमाग को ‘फाइट या फ्लाइट’ यानी लड़ो या भागो का सीधा संदेश भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप हमें अचानक गुस्सा, तीव्र डर या अत्यधिक घबराहट महसूस होने लगती है। मानसिक रूप से शांत रहने वाले लोग इस संभावित ‘अमिग्डाला हाइजैक’ की प्रक्रिया को समय रहते रोक लेते हैं। वे किसी भी संकट के आते ही तुरंत कोई भी फैसला लेने या उतावला रिएक्शन देने से बचते हैं। वे हमेशा कुछ सेकंड का एक जरूरी ब्रेक लेते हैं, जिससे उनके मस्तिष्क का सबसे तार्किक और सोचने-विचारने वाला हिस्सा यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय हो जाता है। यही 5 से 10 सेकंड का छोटा सा ठहराव उन्हें बेहद सही और शांत निर्णय लेने में मदद करता है।
भावनाओं को स्वीकार करना, उन्हें दबाना नहीं
अक्सर आम लोगों में यह बड़ी गलतफहमी होती है कि जो लोग शांत रहते हैं, वे असल में अपनी भावनाओं या आंतरिक दर्द को छुपाते हैं या फिर उन्हें अंदर ही अंदर दबा लेते हैं, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है। मनोविज्ञान के नियमों के अनुसार, ऐसे लोग ‘इमोशनल रेगुलेशन’ यानी भावनाओं के प्रबंधन की कला में पूरी तरह माहिर होते हैं। जब भी कोई बड़ा संकट सामने आता है, तो वे सबसे पहले इस बात को पूरी सहजता से स्वीकार करते हैं कि स्थिति वास्तव में खराब है और उन्हें इस समय तनाव महसूस हो रहा है। वे अपनी घबराहट, चिंता या डर को किसी भी रूप में नकारते नहीं हैं, बल्कि उसे पूरी तरह स्वीकार करके एक शांत दिमाग से यह विचार करते हैं कि अब आगे क्या कदम उठाना चाहिए। भावनाओं को खुलकर स्वीकार कर लेने से दिमाग का आधा मानसिक तनाव अपने आप ही समाप्त हो जाता है।
इंटरनल लोकस ऑफ कंट्रोल का महत्व
मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत महत्वपूर्ण अवधारणा है जिसे ‘लोकस ऑफ कंट्रोल’ के नाम से जाना जाता है। जिन व्यक्तियों का ‘इंटरनल लोकस ऑफ कंट्रोल’ बहुत मजबूत होता है, उनका अटूट विश्वास होता है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी प्रतिकूल या खराब क्यों न हों, उन पर अपनी प्रतिक्रिया को वे खुद पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं। मानसिक रूप से शांत रहने वाले लोग इस अकाट्य सत्य को बहुत गहराई से समझते हैं कि वे इस पूरी दुनिया को, दूसरे लोगों के व्यवहार को या अचानक आ धमकी मुसीबत को अपनी मर्जी से नहीं बदल सकते। वे अपना कीमती समय और ऊर्जा कभी भी उन चीजों पर बर्बाद नहीं करते जो पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर होती हैं। उनका पूरा फोकस और ध्यान सिर्फ इस एक बात पर केंद्रित होता है कि वे खुद इस स्थिति पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
कॉग्निटिव रिफ्रेमिंग और सोच का नजरिया
विपरीत और कठिन परिस्थितियों में पूरी तरह शांत रहने वाले लोगों की सबसे बड़ी मानसिक ताकत उनकी ‘कॉग्निटिव रिफ्रेमिंग’ की क्षमता होती है। इसका सीधा अर्थ होता है कि किसी भी बेहद बुरी या डरावनी स्थिति को देखने के अपने दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल देना। जहाँ एक आम इंसान किसी भी छोटे-बड़े संकट को एक भयानक तबाही या ‘सब कुछ खत्म हो गया’ के रूप में देखता है, वहीं एक मानसिक रूप से मजबूत व्यक्ति उसी गंभीर समस्या को एक नई चुनौती या फिर कुछ नया सीखने के शानदार अवसर के रूप में देखता है। जैसे ही हमारा मस्तिष्क किसी घटना को तबाही की बजाय एक चुनौती के रूप में स्वीकार करता है, वैसे ही शरीर के भीतर तनाव बढ़ाने वाला मुख्य हार्मोन यानी कोर्टिसोल कम मात्रा में बनने लगता है और दिमाग तेजी से उस समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजने में जुट जाता है.
माइंडफुलनेस और सांसों का विज्ञान
शारीरिक स्तर पर अगर देखा जाए तो हमारे तनाव और आंतरिक शांति का सीधा और गहरा संबंध हमारी सांसों की गति से जुड़ा होता है। जब भी हम किसी भी प्रकार के तनाव की चपेट में होते हैं, तो हमारी सांसें बहुत तेज और उथली हो जाती हैं, जिसके कारण हमारे दिल की धड़कन भी काफी बढ़ जाती है। शांत रहने का नियमित अभ्यास करने वाले लोग अनजाने में या पूरी सचेत अवस्था में ‘माइंडफुल ब्रीदिंग’ यानी सचेत और गहरी सांस लेने की प्रक्रिया का सहारा लेते हैं। शरीर में गहरी और धीमी गति से साँस लेने पर हमारे शरीर का पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम तुरंत एक्टिवेट हो जाता है। यह तंत्र हमारे मस्तिष्क को एक सीधा और स्पष्ट सिग्नल भेजता है कि अब सब कुछ पूरी तरह सुरक्षित है और घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके प्रभाव से शरीर बहुत कम समय में स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है।
ओवर थिंकिंग से उचित दूरी बनाना
तनाव और दबाव के समय अधिकांश लोग अपनी आधी से ज्यादा मानसिक लड़ाई केवल अपनी ही कल्पनाओं के दायरे में लड़ रहे होते हैं। वे लगातार अनियंत्रित रूप से सोचने लगते हैं कि यदि ऐसा हो गया तो फिर क्या होगा या अब तो हमारा सब कुछ पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। इसके विपरीत, शांत रहने वाले लोग इस तरह के नकारात्मक ‘वॉरस्ट केस सिनेरियो’ यानी सबसे बुरे नतीजों की बेवजह कल्पना करने से हमेशा बचते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ वर्तमान समय और वर्तमान में मौजूद ठोस तथ्यों पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखते हैं। वे काल्पनिक और भविष्य के डरावने डर से भयभीत होने के बजाय इस महत्वपूर्ण बात पर विचार करते हैं कि आज और अभी इस वर्तमान पल में क्या कदम उठाया जा सकता है। वर्तमान में मजबूती से टिके रहने की यही खास आदत उन्हें हर परिस्थिति में शांत रखती है।
कठिन समय में अतीत के अनुभवों पर भरोसा
मानसिक रूप से बेहद शांत रहने वाले व्यक्तियों को अपनी आंतरिक क्षमताओं और खुद पर अटूट भरोसा होता है। जब भी उनके जीवन में कोई नया और गंभीर संकट आता है, तो उनका मस्तिष्क बिना किसी प्रयास के अतीत की उन तमाम स्थितियों को याद करने लगता है जहाँ वे पहले भी अपनी सूझबूझ से मुश्किलों को पार कर चुके होते हैं। इस विशेष मनोवैज्ञानिक अनुभव को ‘रेजिलिएंस’ यानी मानसिक लचीलापन कहा जाता है। उनके मन में यह गहरा विश्वास होता है कि यदि वे पिछली बार उस भयंकर मुश्किल से सफलतापूक बाहर निकल आए थे, तो इस बार भी वे इस चुनौती को पार कर ही लेंगे। अतीत के सकारात्मक अनुभव वर्तमान के हर बड़े तूफान में एक मजबूत ढाल का काम करते हैं।



















