छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाई में अदालत ने एक बड़ा मोड़ ला दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने खूंखार नक्सली प्रभाकर और उसकी पत्नी राजे कांगे को 7-7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है, जबकि इसी मामले से जुड़े तीन अन्य नक्सलियों को 5-5 साल जेल भेजा गया है। बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद की समाप्ति के बाद इसे किसी बड़े नक्सली लीडर पर आया पहला बड़ा अदालती फैसला बताया जा रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम दस साल पुरानी उस मुठभेड़ से जुड़ा है, जिसने आगे चलकर एक लंबी कानूनी लड़ाई की नींव रखी।
मामले की जड़ 2015 के मुठभेड़ में
यह पूरा मामला 2015 का है, जब ग्राम बेसगांव के पहाड़ी इलाके में पुलिस और नक्सलियों के बीच जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी। इस घटना के तुरंत बाद कोरर थाने में अपराध क्रमांक 108/2015 दर्ज किया गया था। पुलिस ने इस मामले में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA की धाराओं, धारा 307 और आर्म्स एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू की थी। करीब एक दशक तक चली इस लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब जाकर अदालत ने अपना फैसला सुनाया है।
चार दशक से नक्सल नेटवर्क में सक्रिय था प्रभाकर
एसपी निखिल राखेचा के मुताबिक, दोषी ठहराया गया नक्सली प्रभाकर बीते चार दशक से ज्यादा समय से पूरे बस्तर इलाके में नक्सलवाद का एक बड़ा चेहरा रहा है। वह नक्सली संगठन में SGCM और DKSZC रैंक का खूंखार कैडर है और अलग-अलग थानों में उसके खिलाफ 60 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस ने उस पर 25 लाख रुपये का इनाम रखा हुआ था, जो उसके संगठन में कद और खतरनाक गतिविधियों की गवाही देता है।
पत्नी राजे कांगे भी संगठन में बड़े ओहदे पर
प्रभाकर की पत्नी राजे कांगे भी नक्सली संगठन में DVCM रैंक की बड़ी नेता मानी जाती थी। वह रावघाट इलाके और नक्सलियों की सप्लाई टीम में सक्रिय भूमिका निभाती थी, जो संगठन के लिए हथियार और साजोसामान पहुंचाने के काम में अहम मानी जाती है। उसके खिलाफ भी 30 से ज्यादा मामले दर्ज हैं और उस पर 8 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
जांच और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों ने पलटी बाजी
पुलिस के लिए यह फैसला एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि इस मामले की जांच बेहद बारीकी से की गई थी। विवेचक ने मजबूत चार्जशीट तैयार कर अदालत में पेश की, जिसमें नक्सलियों के खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का भी इस्तेमाल किया गया। पुलिस और अभियोजन पक्ष की मजबूत पैरवी के चलते ही अदालत ने कुल पांच आरोपियों को सजा सुनाई, जिसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान की एक बड़ी कानूनी जीत के तौर पर देखा जा रहा है।





















