छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में प्रतिबंधित नशीले इंजेक्शन और दवाओं का काला कारोबार सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। लगातार की जा रही छापामार कार्रवाई और आरोपियों की धरपकड़ के बाद भी इस अवैध नेटवर्क पर पूरी तरह लगाम नहीं लग पा रही है। पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक साल 2025 से अब तक इस अवैध कारोबार से जुड़े लगभग 78 प्रकरण दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से 15 ऐसे मामले सामने आए हैं जिनके तार सीधे दूसरे राज्यों से जुड़े हुए हैं, जहां तक पहुंचकर पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा आबकारी विभाग की तरफ से चलाई गई विशेष मुहिम के तहत भी लगभग 75 से 80 लोगों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। इन तमाम सख्त कदमों के बावजूद इस प्रतिबंधित नशे के दाम बाजार में आसमान छू रहे हैं और जो इंजेक्शन पहले मात्र 200 रुपये में मिल जाता था, उसकी कीमत अब बढ़कर 800 से 1000 रुपये तक पहुंच गई है।
दूसरे राज्यों तक फैला है सप्लाई का नेटवर्क
अवैध नशे के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियां लगातार अभियान चला रही हैं, जिसमें नशीले इंजेक्शन, कैप्सूल और प्रतिबंधित दवाइयों की तस्करी करने वाले तत्वों को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि इतनी सख्ती के बाद भी यह अवैध कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। पुलिस आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 से दर्ज मामलों में से 15 मामलों की कड़ियां झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हैदराबाद तक फैली पाई गई हैं। पुलिस ने इन बाहरी राज्यों से ऑपरेट करने वाले तस्करों को भी धर दबोचा है। इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए दीपक झा ने स्पष्ट किया है कि केवल छोटे और स्थानीय स्तर के विक्रेताओं को पकड़ने के बजाय पूरे सप्लाई नेटवर्क की जड़ें उखाड़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है ताकि इस अवैध व्यापार को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।
उपभोक्ता ही बन रहे हैं इस धंधे के विक्रेता
संभागीय आबकारी उड़नदस्ता की टीम द्वारा अप्रैल 2025 से लगातार ऑपरेशन क्लीन के तहत कार्रवाई को अंजाम दिया जा रहा है। विभाग के अनुसार इस अवधि में करीब 75 से 80 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है, साथ ही भारी मात्रा में प्रतिबंधित इंजेक्शन, कैप्सूल और टैबलेट भी बरामद किए गए हैं। लेकिन आबकारी जांच में एक बेहद चिंताजनक पहलू सामने आया है कि जो लोग खुद इन नशीले इंजेक्शनों के आदी हैं, वे अब इस अवैध कारोबार की बिक्री में भी संलिप्त पाए जा रहे हैं। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक पहले लगभग 200 रुपये में मिलने वाला यह प्रतिबंधित इंजेक्शन अब 800 से 1000 रुपये में बिक रहा है। अपनी लत को पूरा करने के लिए पैसों का जुगाड़ करने की मजबूरी कई बार इन लोगों को खुद ही नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री के दलदल में धकेल देती है।
सीमावर्ती राज्यों से हो रही है प्रतिबंधित सामान की खेप सप्लाई
जांच में यह बात भी पुख्ता तौर पर सामने आई है कि संभाग में पहुंचने वाले इन नशीले इंजेक्शनों के तार दूसरे राज्यों के जिलों से जुड़े हैं। आबकारी विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक झारखंड का गढ़वा जिला इन प्रतिबंधित इंजेक्शनों की सप्लाई का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के म्योरपुर और आश्रम मोड़ जैसे इलाकों से भी नशीले कफ सिरप की तस्करी किए जाने की खुफिया जानकारियां मिल रही हैं। हालांकि, महकमे के पास सीमित संसाधन होने के कारण अन्य राज्यों की सीमाओं में जाकर मुख्य सप्लायरों तक पहुंचना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। आबकारी अधिकारियों का कहना है कि पुलिस के सहयोग से पूर्व में गढ़वा में दबिश देकर आरोपियों को दबोचा गया था, लेकिन जब तक इस सप्लाई चैन के सरगनाओं पर प्रभावी और निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्थानीय स्तर पर गिरफ्तारियां होने के बावजूद यह अवैध कारोबार यूं ही जारी रहने की आशंका बनी रहेगी।
मुख्य तस्करों तक पहुंचने के दिए गए हैं कड़े निर्देश
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए पुलिस प्रशासन ने अपनी रणनीति को और अधिक धारदार बना दिया है। पुलिस के उच्च अधिकारियों द्वारा सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को सख्त निर्देश जारी किए गए हैं कि एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले हर एक मामले की गहराई से जांच करते हुए सीधे मुख्य सप्लायर तक पहुंचा जाए। इसके अलावा क्षेत्र की मेडिकल दुकानों को भी प्रतिबंधित दवाइयों की अवैध बिक्री को लेकर समय-समय पर जागरूक किया जा रहा है और हिदायत दी जा रही है। पुलिस और आबकारी महकमे के बीच आपसी समन्वय बेहतर करने के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा रहा है और जरूरत पड़ने पर साझा अभियान चलाने पर भी जोर दिया जा रहा है। ऐसे में वर्तमान परिस्थिति में असली चुनौती केवल छोटे विक्रेताओं पर शिकंजा कसना नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से संचालित हो रहे इस पूरे अवैध सप्लाई नेटवर्क को जड़ से नेस्तनाबूद करना है।



















