छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण मुरिया दरबार के आमंत्रण पत्र को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। बस्तर के विधायक और विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष लखेश्वर बघेल ने इस पूरे मामले को लेकर जिला प्रशासन की व्यवस्था और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि मुरिया दरबार केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर बस्तर के आदिवासी समाज की प्राचीन परंपराओं, संस्कृति और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंच है। लेकिन इस बार के आयोजन के लिए छपे निमंत्रण पत्र में सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के भी कई प्रमुख विधायकों के नाम और उनकी उपस्थिति को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। उन्होंने इसे सीधे तौर पर चुने हुए जनप्रतिनिधियों का अनादर करार दिया है और बड़ा सवाल उठाया है कि यदि इस दरबार में खुद आदिवासी विधायक ही मौजूद नहीं होंगे, तो सदन और समाज के बाहर आदिवासियों की वास्तविक समस्याएं और उनकी आवाज कौन उठाएगा।
लखेश्वर बघेल ने देश की राष्ट्रपति के बस्तर आगमन पर अपनी गहरी खुशी और गर्व की भावना व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह पूरे बस्तर क्षेत्र के लिए गौरव का क्षण है कि देश की महामहिम राष्ट्रपति यहां आ रही हैं। साथ ही उन्होंने याद दिलाया कि मुरिया दरबार बस्तर की सदियों पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक बहुत ही अहम और अटूट हिस्सा रहा है। इस पारंपरिक दरबार के जरिए आदिवासी समाज के लोग सीधे अपनी समस्याएं, दर्द और मांगें खुलकर सामने रखते हैं। ऐसे में इस भव्य आयोजन की गरिमा, मर्यादा और इसकी पारंपरिक व्यवस्थाओं का पूरा ध्यान रखना जिला प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुरिया दरबार के इतिहास में यह एक लंबी परंपरा रही है कि हर साल इस आयोजन में आदिवासी विधायकों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता रहा है। इसी के माध्यम से क्षेत्र के चुने हुए जनप्रतिनिधि आदिवासी समाज की विभिन्न समस्याओं को आधिकारिक रूप से सामने रखते हैं और उनके हितों से जुड़े तमाम संवेदनशील मुद्दों पर अपनी बात पूरी मजबूती के साथ रखते हैं।
आमंत्रण पत्र में स्थानीय विधायकों को जगह नहीं मिलने पर कांग्रेस विधायक ने तीखा एतराज जताया है। लखेश्वर बघेल ने कड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि इस बार जिला प्रशासन ने वर्षों से चली आ रही इस पुरानी परंपरा में अपनी तरफ से बदलाव कर दिया है। उनके अनुसार, इस बार के छपे आमंत्रण पत्र में चुनिंदा मंत्रियों और कुछ ही विधायकों के नाम शामिल किए गए हैं, जबकि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमे के कई ऐसे विधायक हैं जिन्हें न तो इस निमंत्रण पत्र में कोई जगह दी गई और न ही इस पारंपरिक मुरिया दरबार में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने इस व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि आदिवासियों के इस सबसे बड़े दरबार में उनके अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की मौजूदगी सबसे ज्यादा मायने रखती है। यदि खुद जनप्रतिनिधियों को ही इस महत्वपूर्ण आयोजन से जानबूझकर दूर रखा जाएगा, तो आदिवासी समाज के सुदूर इलाकों के मुद्दे शासन और प्रशासन तक कैसे पहुंचेंगे और उन्हें उचित मंच कैसे मिल पाएगा।
लखेश्वर बघेल ने इस पूरे मामले को सीधे तौर पर जनप्रतिनिधियों के सम्मान से जोड़ते हुए अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि प्रशासन का इस तरह का मनमाना रवैया किसी भी लिहाज से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने पुरजोर तरीके से सवाल उठाया कि इस प्रकार के प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण मंच पर आदिवासी समाज की आवाज बुलंद करने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा। फिलहाल मुरिया दरबार के आमंत्रण पत्र को लेकर उठे इन तीखे सवालों और सियासी घमासान के बीच जिला प्रशासन की तरफ से कोई भी विस्तृत या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हुई हैं कि इस गरमाए हुए विवाद पर प्रशासन की ओर से क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है और आने वाले मुरिया दरबार के मुख्य आयोजन में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी को लेकर आगे क्या स्थिति बनती है।
























