छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के पहाड़ी इलाकों में स्थित दरिमा से जुड़े कर्महा गांव में पेयजल की गंभीर समस्या आज भी बनी हुई है। सरकार की ओर से हर घर तक शुद्ध पानी पहुंचाने के लिए तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन धरातल पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। गांव के पटेल पारा में रहने वाले 20 से अधिक परिवारों के घरों के आंगन में जल जीवन मिशन के तहत पानी की टंकी का निर्माण तो करा दिया गया है, लेकिन इन टंकियों के नल पानी न आने की वजह से सूखे पड़े हैं। इस प्रशासनिक नाकामी का सीधा खामियाजा यहां के आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें अपनी प्यास बुझाने के लिए भारी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। शुद्ध पेयजल की आपूर्ति न होने से नाराज ग्रामीण अब अपने इलाके में एक नए बोर या हैंडपंप की मांग कर रहे हैं ताकि इस विकट समस्या से स्थाई राहत मिल सके।
जुगाड़ के सहारे जीवन, धान के खेत से बना रहे प्यास बुझाने का जरिया
कर्महा गांव के पटेल पारा में रहने वाली सरिता मझवार ने बताया कि उनके पूरे मोहल्ले में पानी की किल्लत काफी लंबे समय से चली आ रही है। पहले पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए ग्रामीणों को अपने घरों से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित एक कुएं पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता था। इस लंबी दूरी और रोजाना की परेशानी से तंग आकर ग्रामीणों ने खुद ही एक नायाब लेकिन जोखिम भरा जुगाड़ निकाला। धान की फसल से लगे हुए एक झरिया खेत के पास पानी का प्राकृतिक स्रोत देखकर लोगों ने वहां अपने स्तर पर एक छोटी सी ढोढ़ी तैयार कर ली। पिछले करीब एक साल से ज्यादा समय से इस पूरे इलाके के ग्रामीण इसी ढोढ़ी के पानी के सहारे अपना जीवन गुजार रहे हैं, हालांकि यह पानी किसी भी लिहाज से सुरक्षित नहीं है।
कीड़ेयुक्त पानी उबालकर पीने की मजबूरी, स्वास्थ्य पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
सरिता मझवार ने आगे बताया कि इस जुगाड़ से बनाई गई ढोढ़ी का पानी बेहद गंदा और दूषित रहता है, जिसमें अक्सर छोटे-छोटे कीड़े तैरते हुए दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है, इसलिए वे इस पानी को पहले एक साफ कपड़े से छानते हैं और फिर उबालकर पीने के काम में लाते हैं। बरसात के मौसम में इस पानी की हालत और भी ज्यादा बदतर हो जाती है, जिससे टायफायड, डायरिया और पेट से जुड़ी अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा हर वक्त बना रहता है। साफ और सुरक्षित पानी का कोई वैकल्पिक स्रोत न होने के कारण इन परिवारों को अनचाहे ही इस स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पानी का सेवन करना पड़ रहा है, जिससे स्थानीय लोगों में लगातार चिंता बढ़ती जा रही है।
सरकारी टंकी में नहीं है एक बूंद पानी, अधूरी साबित हो रही योजना
गांव में सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना के तहत भले ही पानी की बड़ी टंकी खड़ी कर दी गई हो, लेकिन इसका फायदा ग्रामीणों को एक प्रतिशत भी नहीं मिल रहा है। सरकारी स्तर पर कागजों में योजना भले ही पूरी हो चुकी हो, लेकिन हकीकत यह है कि इन टंकियों से आज तक एक बूंद पानी भी लोगों के घरों तक नहीं पहुंच पाया है। घर के बिल्कुल नजदीक सरकारी पानी की व्यवस्था का ढांचा खड़ा होने के बावजूद ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए खुद ही जतन करने पड़ रहे हैं। स्थानीय लोगों ने अब शासन-प्रशासन से मांग उठाई है कि उनके इलाके में तुरंत नल-बोरिंग की पुख्ता व्यवस्था कराई जाए ताकि उन्हें और उनके बच्चों को रोजाना शुद्ध पेयजल मिल सके।
बारिश के दिनों में पुलिया और नदियों का उफान बनता है बड़ी मुसीबत
कर्महा के पटेल पारा के निवासियों के सामने केवल पीने के पानी का ही संकट नहीं है, बल्कि बरसात का मौसम आते ही उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। सरिता मझवार के अनुसार वर्षा ऋतु में गांव की पुलिया और आसपास की छोटी-नदी में पानी अत्यधिक भर जाने के कारण पूरे इलाके का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग कट जाता है। आवागमन पूरी तरह बाधित होने का सबसे बुरा असर गांव के स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है, जिन्हें रोजाना स्कूल आने-जाने में भारी दिक्कतों और जोखिमों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के इन तीन से चार महीनों के दौरान उन्हें हर साल ऐसी ही नरकीय और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना भी आसान नहीं, बदहाल रास्तों ने बढ़ाई पीड़ा
गांव के लोगों ने बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है। सरिता मझवार बताती हैं कि पानी की इस भीषण समस्या के बीच छोटे-छोटे बच्चों को पालना और संभालना माताओं के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। यदि गांव में अचानक कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए, तो उसे तुरंत इलाज के लिए कमलेश्वरपुर, दरिमा या फिर अंबिकापुर अस्पताल ले जाना पड़ता है। लेकिन गांव की बेहद खराब सड़कें और बरसात के दिनों में नदी का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाने के कारण समय पर अस्पताल पहुंचना लगभग नामुमकिन हो जाता है, जिससे कई बार मरीजों की जान पर भी बड़ा खतरा बन आता है।



















