छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक स्थित मोहतरा गांव की महिलाएं अपनी पुश्तैनी कारीगरी के दम पर स्वावलंबन का एक मजबूत रास्ता तैयार कर रही हैं। साधारण से दिखने वाले बांस को तराशकर उपयोगी और मनमोहक घरेलू वस्तुओं में बदलने का यह काम अब केवल शौक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कई ग्रामीण परिवारों की नियमित आमदनी का आधार बन चुका है। इसी गांव की रमाबाई धुलिया के लिए यह पुश्तैनी दस्तकारी परिवार के भरण-पोषण और आर्थिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा जरिया साबित हो रही है। अपने पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ वह इस काम से हर महीने करीब 2 हजार रुपये की बचत भी कर पा रही हैं।
पुश्तैनी हुनर को प्रशिक्षण से दिया नया रूप
रमाबाई धुलिया के जीवन में बांस शिल्प कोई नया काम नहीं है। वह बचपन के दिनों से ही अपने परिवार के साथ मिलकर बांस से विभिन्न वस्तुएं तैयार करने का हुनर सीखती रही हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे इस कार्य को उन्होंने अपनी आजीविका का मुख्य साधन बनाया। बाद में गांव की गठन समिति की ओर से आयोजित विशेष प्रशिक्षण सत्रों में शामिल होकर उन्होंने अपनी कला को और अधिक परिपक्व किया। इस औपचारिक प्रशिक्षण के जरिए उन्हें उत्पादों में बारीक फिनिशिंग लाने और आधुनिक जरूरतों के अनुसार नई डिजाइन तैयार करने की समझ मिली, जिससे बाजार में उनके उत्पादों का आकर्षण काफी बढ़ गया।
बांस को तराशकर उत्पाद बनाने की पेचीदा प्रक्रिया
बांस के जरिए आकर्षक उत्पाद गढ़ने का सफर काफी श्रमसाध्य होता है। सबसे पहले जंगलों या हाट से उपयुक्त कच्चा बांस खरीदकर लाया जाता है। इसके उपरांत उसकी निर्धारित नाप के अनुसार कटाई और बाहरी परत की छिलाई की जाती है। बांस के रेशे लचीले बने रहें और मोड़ते समय टूटे नहीं, इसके लिए कटी हुई पट्टियों को पानी में भिगोकर रखा जाता है। जब बांस पर्याप्त रूप से मुलायम हो जाता है, तब कारीगर अपने हाथों की सूक्ष्म कारीगरी से उसे टोपी, कमंडल, गुलदस्ता, टोकनी, सूपा या पंखे का रूप देते हैं। हर वस्तु को तैयार करने में धैर्य और शारीरिक श्रम दोनों की बराबर आवश्यकता होती है।
घर बैठे बिक्री और तय होती आमदनी
रमाबाई और उनके परिवार द्वारा बनाए जाने वाले सामानों की मांग आसपास के इलाकों में बनी हुई है। उनके बनाए गुलदस्ते, सूपा और टुकनी जैसे सामानों के जोड़े बाजार में 400 से लेकर 700 रुपये तक के भाव में बिक जाते हैं। अच्छी बात यह है कि उन्हें बिक्री के लिए भटकना नहीं पड़ता, बल्कि बड़े व्यापारी सीधे उनके घर पहुंचकर तैयार हस्तशिल्प खरीद लेते हैं। घरेलू जरूरतों पर होने वाले सारे खर्च पूरे करने के बाद रमाबाई के पास हर महीने करीब 2 हजार रुपये की शुद्ध बचत बच जाती है, जो ग्रामीण परिवेश में वित्तीय सुरक्षा की दृष्टि से बेहद मददगार साबित हो रही है।
घटते बाजार के बीच कला को बचाने की उम्मीद
प्लास्टिक और मशीनी उत्पादों के बढ़ते प्रभाव के कारण पिछले कुछ वर्षों में पारंपरिक बांस शिल्प की मांग पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है। इसके बावजूद रमाबाई का हौसला डिगा नहीं है। उन्हें विश्वास है कि प्रकृति के अनुकूल और टिकाऊ हस्तशिल्प की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती। वह चाहती हैं कि आम नागरिक इन पारंपरिक सामानों का महत्व समझें और स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पादों को प्राथमिकता दें, ताकि ग्रामीण महिलाओं का यह रोजगार सुरक्षित रहे और सदियों पुरानी धरोहर जीवित बनी रहे।



















