खुले समंदर में हजारों मील दूर गश्त लगाने वाले अमेरिकी नौसैनिक बेड़ों के सामने चीनी हथियारों की मारक क्षमता को लेकर सामरिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। बीजिंग की DF-26B बैलिस्टिक मिसाइल से जुड़ा एक परीक्षण फुटेज 1 नवंबर 2026 को दोबारा चर्चा के केंद्र में आया। इस वीडियो में मिसाइल को शिनजियांग के रेगिस्तानी इलाके में बने एक बड़े अमेरिकी विमानवाहक पोत के हुबहू ढांचे पर अचूक प्रहार करते हुए दिखाया गया है। इसी मारक प्रदर्शन के चलते सैन्य विश्लेषक इस हथियार प्रणाली को 'कैरियर किलर' के नाम से बुलाते हैं। जानकारों के मुताबिक, अत्यधिक गति, लंबी दूरी और उन्नत वॉरहेड तकनीक के मेल से तैयार यह मिसाइल यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड, यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन और लिंकन जैसे अमेरिकी नौसेना के विशालकाय युद्धपोतों के लिए खासी गंभीर चुनौती पेश कर सकती है। हालांकि यह कोई एकदम नया प्रक्षेपास्त्र नहीं है, क्योंकि चीन के सरकारी प्रसारण नेटवर्क सीसीटीवी पर यही फुटेज दिसंबर 2024 में भी दिखाया जा चुका था, जिसकी चर्चा नवंबर 2026 में नए सिरे से गर्मा गई है। यदि यह तकनीक या हथियार प्रणाली चीन के साझेदार ईरान तक पहुंचती है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य में तैनात अमेरिकी युद्धपोत सीधे निशाने पर आ सकते हैं।
सड़क पर दौड़ने वाले लॉन्चर और गुप्त तैनाती की रणनीति
DF-26B वास्तव में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स की DF-26 मिसाइल शृंखला का आधुनिक एंटी-शिप संस्करण है। यह जमीन से दागी जाने वाली एक ऐसी बहुउद्देशीय बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे सतही जमीन पर स्थित दुश्मन के सैन्य अड्डों के साथ-साथ गहरे समंदर में तैरते भारी युद्धपोतों को तबाह करने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। इस मिसाइल प्रणाली की सबसे बड़ी सामरिक खूबी इसका रोड-मोबाइल होना है। इसका अर्थ यह है कि इसे किसी निश्चित, स्थायी कंक्रीट साइलो में तैनात रखने की मजबूरी नहीं है। इसे पहियों वाले भारी सैन्य ट्रकों पर लादकर सड़क मार्ग से किसी भी गुप्त स्थान पर पहुंचाया जा सकता है, सुरंगों या जंगलों में छिपाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर अचानक तैनात कर लॉन्च किया जा सकता है। इस गतिशीलता की वजह से उपग्रहों और हवाई टोह लेने वाले विदेशी निगरानी तंत्रों के लिए हमले से पहले इसके लॉन्च प्लेटफॉर्म का पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है।
4,000 किलोमीटर की मारक दूरी और गुआम का सामरिक घेरा
मारक क्षमता के पैमाने पर DF-26 परिवार की रेंज करीब 3,000 से 5,000 किलोमीटर से अधिक, विशेषकर 4,000 किलोमीटर तक आंकी जाती है। पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिकी नौसैनिक अभियानों और सैन्य रणनीति के लिहाज से यह दूरी बेहद निर्णायक मानी जाती है। प्रशांत क्षेत्र में वाशिंगटन का सबसे अहम रणनीतिक सैन्य ठिकाना गुआम भी इस मिसाइल की सीधी मारक जद में आ जाता है। इस मिसाइल की एक और घातक खूबी इसका डुअल-कैपेबल होना है, यानी यह पारंपरिक विस्फोटक वॉरहेड के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर परमाणु हथियार ले जाने में भी पूरी तरह सक्षम बताई जाती है। हालांकि अलग-अलग सैन्य दस्तों में तैनात मिसाइलों के वास्तविक विन्यास, पेलोड क्षमता और तैनाती के विवरण रणनीतिक गोपनीयता के दायरे में रहते हैं। इस परीक्षण क्लिप को लेकर सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा की गई, जिसमें शिनजियांग के रेगिस्तान में बने विमानवाहक पोत के सटीक आकार वाले डमी ढांचे पर मिसाइल के सीधे हमले का उल्लेख किया गया था।
विशालकाय ढांचे को कच्चे अंडे की तरह फोड़ने का दावा
इस वीडियो पर टिप्पणी करते हुए रूसी सीनेटर एलेक्सी पेशकोव ने दावा किया कि चीनी मिसाइल का वार अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर को हथौड़े से टूटने वाले किसी कच्चे अंडे की तरह बिखेर सकता है। उनका मानना था कि चीन ने समुद्री युद्ध की स्थिति में अमेरिका के रणनीतिक दबदबे को तोड़ने के मकसद से इस मिसाइल को पूरी तरह तैयार कर लिया है। हालांकि युद्ध विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अतिश्योक्तिपूर्ण राजनीतिक दावों और वास्तविक रणभूमि के बीच बड़ा अंतर होता है। रेगिस्तान में स्थिर खड़े एक लोहे या कंक्रीट के ढांचे पर विस्फोटक धमाका कर देना एक बात है, लेकिन खुले और अशांत समंदर में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के साए में तेजी से आगे बढ़ रहे 1 लाख टन के आधुनिक विमानवाहक पोत को एक झटके में पूरी तरह नष्ट कर देना पूरी तरह अलग मामला है। बैलिस्टिक मिसाइल की असली शक्ति केवल उसके बारूद में नहीं, बल्कि चरम गति और अंतिम पलों में दिशा बदलकर लक्ष्य भेदने की तकनीक में निहित होती है।
चलते पोत को ट्रैक करने और टर्मिनल गाइडेंस की पेचीदगियां
रेगिस्तानी रेंज पर स्थिर बैठे किसी कृत्रिम लक्ष्य पर निशाना साधना और प्रशांत के पानी में 30 समुद्री मील प्रति घंटे की गति से लगातार दिशा बदल रहे कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को भेदना तकनीकी रूप से दो विपरीत छोर हैं। खुले समुद्र में सफल हमले के लिए सबसे पहले चीनी सेना को अमेरिकी बेड़े की वास्तविक समय में सटीक भौगोलिक स्थिति जाननी होगी। इसके लिए टोही उपग्रहों के समूह, लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमानों और ओवर-द-होराइजन रडार की संयुक्त मदद लेनी पड़ती है। इसके बाद प्राप्त आंकड़ों को डेटा-लिंक के जरिए मिसाइल के कंप्यूटर सिस्टम में भेजा जाता है। लॉन्च के बाद मिसाइल को कई मिनट का सफर तय करना होता है, जिस दौरान जहाज अपनी पुरानी लोकेशन से कई मील दूर जा चुका होता है।
इसी गतिशीलता की काट के लिए मिसाइल में मैनुवरेबल री-एंट्री व्हीकल यानी MaRV जैसी तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक से लैस वॉरहेड वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय अपनी दिशा में बदलाव कर सकता है। अंतिम क्षणों में जहाज को तलाशने के लिए इसमें ऑन-बोर्ड रडार सीकर और आधुनिक टर्मिनल गाइडेंस प्रणाली का सहारा लिया जाता है। हालांकि वायरल वीडियो में केवल धमाका दिखाया गया है, उसने यह कतई साबित नहीं किया कि मिसाइल ने इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा घेरे और हवा में तैरते वास्तविक युद्धपोत को लाइव परिवेश में कैसे ट्रैक किया।
1 लाख टन के अमेरिकी दैत्य और डैमेज कंट्रोल का सच
सैन्य विश्लेषकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या DF-26B वास्तव में जेराल्ड आर. फोर्ड या जॉर्ज वाशिंगटन जैसे अमेरिकी नौसैनिक दिग्गजों को सीधे डुबो सकती है। यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड और यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन केवल पानी के जहाज नहीं हैं, बल्कि लगभग 1 लाख टन विस्थापन वाले तैरते हुए अजेय सैन्य अड्डे हैं, जिन पर दर्जनों आधुनिक लड़ाकू विमान, अर्ली वार्निंग विमान और मिसाइल रक्षा प्रणालियां चौबीसों घंटे तैनात रहती हैं। इतने भारी-भरकम जहाजों का आंतरिक ढांचा दर्जनों अभेद्य जलरोधी डिब्बों में विभाजित होता है। किसी भीषण हमले, आग, या पेंदे में पानी भरने की सूरत में जहाजों पर बेहद उन्नत स्वचालित डैमेज कंट्रोल प्रणालियां सक्रिय हो जाती हैं, जिससे एक हिस्से में गंभीर खराबी आने पर भी बाकी जहाज संतुलित और चालू हालत में रहता है।
इसके बावजूद, ऐसे मिसाइल हमले को पूरी तरह बेअसर भी नहीं माना जा सकता। यदि मिसाइल का भारी भरकम वॉरहेड सुपरसोनिक या हाइपरसोनिक रफ्तार से जहाज के फ्लाइट डेक, रडार टावर या एयरक्राफ्ट लिफ्ट से टकराता है, तो भले ही 1 लाख टन का जहाज तुरंत न डूबे, लेकिन उस पर से लड़ाकू विमानों का उड़ान भरना और उतरना पूरी तरह ठप हो सकता है। सैन्य भाषा में इसे मिशन किल कहा जाता है, जहां जहाज तैरता तो रहता है मगर युद्ध लड़ने के काबिल नहीं बचता। यही जोखिम अमेरिकी नौसेना को पश्चिमी प्रशांत और मध्य पूर्व में अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करने को मजबूर कर रहा है।



















