भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसी कहानियां दर्ज हैं जहां असाधारण प्रतिभा और अद्वितीय उपलब्धियों के बावजूद खिलाड़ियों का सफर अचानक किसी मोड़ पर थम जाता है। 30 जुलाई को जब अनुभवी बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे ने एक भावुक वीडियो जारी कर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा की, तो क्रिकेट प्रशंसकों को एक बार फिर उसी अधूरेपन का अहसास हुआ। जिस खिलाड़ी ने विपरीत परिस्थितियों में अपनी कप्तानी से टीम इंडिया को ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक जीत दिलाई, वह अपने अंतरराष्ट्रीय सफर का आखिरी मुकाबला भी नहीं खेल सका। मैदान पर हमेशा शांत और गंभीर दिखने वाले अजिंक्य रहाणे उर्फ 'अज्जू' का करियर भारतीय क्रिकेट व्यवस्था की उसी जटिलता की भेंट चढ़ गया, जिसका सामना अतीत में राहुल द्रविड़ और युवराज सिंह जैसे दिग्गजों को भी करना पड़ा था।
अहमदनगर की गलियों से मुंबई की 'क्रिकेट फैक्ट्री' तक का सफर
महाराष्ट्र के अहिल्याबाई नगर (अहमदनगर) में वर्ष 1988 में पिता मधुकर रहाणे के घर जन्मे अजिंक्य रहाणे ने बचपन में ही देश के लिए सर्वोच्च स्तर पर क्रिकेट खेलने का सपना देख लिया था। इसके बाद वह मुंबई की उस प्रसिद्ध 'क्रिकेट फैक्ट्री' का हिस्सा बने जिसने देश को एक से बढ़कर एक महान बल्लेबाज दिए। मुंबई क्रिकेट के कड़े अनुशासन में ढले रहाणे की शैली अपने दौर के अन्य खिलाड़ियों से बिल्कुल अलग थी। वह विराट कोहली की तरह आक्रामक अंदाज में विरोधी टीम पर हमलावर नहीं होते थे और न ही रोहित शर्मा की तरह आतिशी बल्लेबाजी से गेंदबाजों को पस्त करते थे। इसके बजाय, रहाणे ने सबसे मुश्किल परिस्थितियों में अपनी मजबूत बल्लेबाजी तकनीक और असाधारण मानसिक शांति के दम पर टीम को संकट से निकालना सीखा। उनके खेल में एमएस धोनी जैसी प्रशासनिक शांति और राहुल द्रविड़ जैसा अटूट धैर्य साफ दिखाई देता था। वह एक तरफ जहां पारंपरिक तकनीक वाले क्लासिकल बल्लेबाज थे, वहीं जरूरत पड़ने पर बड़े शॉट खेलने और टीम की अगुवाई करने में भी उतने ही माहिर थे।
मेलबर्न का वो ऐतिहासिक टेस्ट और बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी की गाथा
क्रिकेट केवल बल्ले और गेंद का खेल नहीं है, बल्कि यह मानसिक दृढ़ता की एक कठिन परीक्षा भी है। जब दबाव उच्चतम स्तर पर होता है, तब महान खिलाड़ी अपनी पहचान बनाते हैं, और रहाणे इसी मिजाज के उस्ताद थे। वर्ष 2020-21 का भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। चार मैचों की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का पहला मुकाबला मेलबर्न में गुलाबी गेंद से खेला गया था। उस डे-नाइट टेस्ट मैच की दूसरी पारी में भारतीय टीम महज 36 रन पर सिमट गई थी, जिसे भारतीय क्रिकेट के इतिहास का सबसे काला दिन माना गया। इस शर्मनाक हार के तुरंत बाद नियमित कप्तान विराट कोहली अपने पहले बच्चे के जन्म के कारण भारत वापस लौट आए। टीम इंडिया का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था और सीरीज में 0-4 से सफाए की आशंका जताई जा रही थी। ऐसे बेहद नाजुक मोड़ पर अजिंक्य रहाणे ने टीम की कमान संभाली। रहाणे के शांत नेतृत्व में भारतीय टीम ने मेलबर्न में न केवल जोरदार वापसी की, बल्कि अंतिम दो मैच जीतकर 2-1 से बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी अपने नाम की। रहाणे का वह कप्तानी स्पेल और शतक भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया।
संयम और तकनीक से सुसज्जित एक शांत योद्धा
मैदान के भीतर और बाहर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना हर खिलाड़ी के बस की बात नहीं होती। काम, क्रोध और ईर्ष्या जैसी मानवीय कमजोरियों से परे, रहाणे ने हमेशा अपनी नब्ज पर काबू बनाए रखा। मैदान पर विकेट गिरने के बाद न तो उन्होंने कभी आक्रामक जश्न मनाया और न ही किसी असफलता पर गुस्सा जाहिर किया। जीत हो या हार, वह हर परिस्थिति में अपने संवेगों पर पूरी तरह नियंत्रण रखते थे। रहाणे की गिनती भारत के उन चुनिंदा बल्लेबाजों में होती है जिनका विदेशी धरती पर रिकॉर्ड घरेलू मैदानों से भी ज्यादा शानदार रहा। उनकी बल्लेबाजी शैली में राहुल द्रविड़ की झलक मिलती थी। उन्हें समझदारी से पारी को आगे बढ़ाना पसंद था, यानी अच्छी गेंदों को पूरा सम्मान देकर पहले गेंदबाजों को थका देना और फिर उनके लय से भटकते ही रन जुटाना।
आधुनिक क्रिकेट का दबाव और करियर का अंत
इसमें कोई संदेह नहीं कि रहाणे तकनीक और मिजाज के मामले में एक दुर्लभ बल्लेबाज थे, लेकिन आधुनिक क्रिकेट के बदलते स्वरूप और तेजी से रन बनाने के दबाव ने उनके करियर की राह मुश्किल कर दी। हर गेंद पर सीमा रेखा पार करने के दबाव के कारण पहले वह टी20 अंतरराष्ट्रीय प्रारूप से बाहर हुए और फिर वनडे क्रिकेट की योजनाओं से भी ओझल हो गए। टेस्ट क्रिकेट में वह आसानी से 100 मैचों का आंकड़ा छू सकते थे, लेकिन अच्छी शुरुआत को बड़े शतकों में न बदल पाने के कारण चयनकर्ताओं ने आखिरकार टेस्ट टीम से भी उनसे किनारा कर लिया। अजिंक्य रहाणे ने भारत के लिए अपने करियर में 85 टेस्ट मैचों में 5077 रन बनाए। वहीं 90 वनडे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में उनके नाम 2962 रन दर्ज रहे, जबकि 20 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 375 रन का योगदान दिया।
सादगी से भरा जीवन और घरेलू क्रिकेट की शुरुआत
रहाणे का व्यक्तिगत जीवन भी उनके खेल की तरह ही बेहद सादा और दिखावे से दूर रहा। जब उन्होंने राधिका के साथ विवाह किया, तो उसमें न तो कोई शाही ठाठ-बाट था और न ही कोई महंगी शेरवानी। वह बिल्कुल साधारण तरीके से जींस और टी-शर्ट पहनकर अपनी शादी के मंडप में पहुंचे थे। अपने शुरुआती रणजी ट्रॉफी सीजन में ही लगभग 1000 रन बनाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले इस बल्लेबाज ने अपने शांत स्वभाव और निरंतरता से करोड़ों दिलों को जीता। भले ही उन्हें संन्यास के समय मैदान पर विदाई का मौका न मिला हो, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनके दिए गए योगदान और मेलबर्न की वो ऐतिहासिक जीत हमेशा याद रखी जाएगी।



















