अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जब संजू सैमसन, अभिषेक, ईशान और श्रेयस जैसे धुरंधर बल्लेबाज एक ही बल्ला लेकर मैदान में उतरते हैं, फिर भी कभी-कभी छक्के लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है, तो सारा ध्यान पिच की उस 22 गज की पट्टी पर जाता है। जब यह मिट्टी की पट्टी अपना मिजाज बदलती है, तो दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों के भी पसीने छूट जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर गेंदबाज और बल्लेबाज के बीच यह दूरी 22 गज की जगह 20 गज रह जाए या बढ़कर 25 गज कर दी जाए, तो खेल का क्या स्वरूप होगा? असल में क्रिकेट में हर रन, हर स्विंग और हर बड़े शॉट की धुरी यही लंबाई है, जिसका इतिहास करीब तीन सदियों पुराना है और इंग्लैंड की माप प्रणाली से जुड़ा हुआ है।
18वीं सदी की गंटर्स चेन और 22 गज का ऐतिहासिक पैमाना
आज दुनिया भर के मैदानों में टेस्ट, वनडे या टी20 मुकाबले 22 गज यानी ठीक 20.12 मीटर की लंबाई वाली मानक पिच पर ही खेले जाते हैं। इस सटीक दूरी की जड़ें 18वीं सदी के इंग्लैंड में छिपी हैं। उस जमाने में जमीन और खेतों की पैमाइश के लिए भूमि सर्वेक्षक गंटर्स चेन का इस्तेमाल करते थे। इस लोहे की चेन की कुल लंबाई 66 फीट यानी 22 गज हुआ करती थी, जिसमें बराबर आकार की 100 कड़ियां जुड़ी होती थीं।
उसी दौर में जब क्रिकेट के नियम पहली बार लिखित और संगठित रूप ले रहे थे, तब खेल के मैदान और स्टंप्स के बीच दूरी तय करने के लिए इसी सर्वसुलभ और पारंपरिक नाप को आधार बना लिया गया। यही गंटर्स चेन बाद में क्रिकेट के आधिकारिक नियमों में शामिल हो गई। इसका सीधा मतलब यह है कि आज विराट कोहली, रोहित शर्मा, जो रूट या बाबर आजम जैसे दिग्गज जिस पिच पर 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आने वाली गेंदों का सामना करते हैं, उसके पीछे कोई आधुनिक लैब रिसर्च नहीं बल्कि ब्रिटिश काल की जमीन मापने वाली चेन की विरासत काम कर रही है।
गेंद और बल्ले का संतुलन साधने वाला भौतिक विज्ञान
गेंदबाज और बल्लेबाज के बीच 20.12 मीटर की यह दूरी खेल के अंदर एक बेजोड़ संतुलन तैयार करती है। जब तेज गेंदबाज गेंद फेंकता है, तो इस फासले के भीतर गेंद को हवा में स्विंग, पिच पर टप्पा खाकर उछाल और रफ्तार हासिल करने का पूरा मौका मिलता है। वहीं दूसरी ओर, बल्लेबाज के पास गेंद की दिशा, उछाल और रफ्तार को भांपकर अपने फुटवर्क और टाइमिंग के साथ शॉट खेलने के लिए महज कुछ सेकंड के हिस्से का समय बचता है। गेंद 20 मीटर की इस दूरी को पलक झपकते ही तय कर लेती है, जिससे मुकाबला निष्पक्ष और रोमांचक बना रहता है।
अगर पिच 20 गज की होती तो क्या होता
यदि पिच की लंबाई को 22 गज से घटाकर मात्र 20 गज कर दिया जाए, तो गेंद बल्लेबाज तक बेहद कम समय में पहुंचने लगेगी। तेज गेंदबाजों के सामने बल्लेबाज की प्रतिक्रिया का समय और घट जाएगा, जिससे शॉर्ट लेंथ की तेज गेंदें सीधे शरीर पर लगेंगी और बेहद खतरनाक साबित होंगी। बल्लेबाजों के पास रक्षात्मक तकनीक और फुटवर्क दिखाने का मौका ही नहीं बचेगा। स्पिन गेंदबाजों के खिलाफ भी बल्लेबाज को गेंद की फिरकी समझने या आगे बढ़कर क्रीज से बाहर निकलने का समय नहीं मिलेगा, जिससे पूरा मुकाबला पूरी तरह गेंदबाजों के पक्ष में झुक सकता है।
25 गज की पिच होने पर खेल में क्या बदलाव आता
इसके उलट यदि दोनों छोरों के बीच की दूरी बढ़ाकर 25 गज कर दी जाती, तो गेंद को बल्लेबाज की क्रीज तक पहुंचने में ज्यादा समय लगता। बल्लेबाज को गेंद की लाइन और लेंथ पढ़ने के लिए अतिरिक्त वक्त मिल जाता, जिससे तेज गेंदबाजों की गति का खौफ काफी हद तक कम हो जाता। दूसरी ओर, स्पिनरों को भी बल्लेबाज तक गेंद पहुंचाने के लिए अधिक दूरी तय करानी पड़ती, जिससे गेंद की गति और मारक क्षमता धीमी पड़ सकती थी। इस तरह पिच की लंबाई में सिर्फ 2 से 3 गज का फेरबदल भी क्रिकेट के पूरे संतुलन, रोमांच और खेल की मूल भावना को पूरी तरह बदल सकता है।
सदियों पुरानी पहचान जो आज भी अडिग है
क्रिकेट की खूबसूरती इसी बात में है कि मैदान चाहे कितना भी बड़ा हो, असली घमासान 22 गज के इस छोटे से गलियारे में ही सिमटा होता है। पिछले 300 सालों में खिलाड़ियों की फिटनेस, बल्ले की तकनीक, सुरक्षा उपकरण और रणनीतियां पूरी तरह बदल चुकी हैं, मगर 22 गज की यह लंबाई आज भी अटल खड़ी है। अगली बार जब आप टीवी स्क्रीन पर पिच को देखें, तो यह बात याद रखें कि यह केवल घास या मिट्टी की पट्टी नहीं, बल्कि 18वीं सदी के सर्वेयरों की चेन से जन्मा एक अमर मानक है।



















