आमतौर पर युवा वर्ग आजीविका की तलाश में पारंपरिक कॉलेज डिग्रियों और सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा रहता है, परंतु कलात्मक अभिव्यक्ति की दुनिया भी आजीविका के बेहतरीन रास्ते उपलब्ध करा रही है। अभिनय, कहानी कहने, रचनात्मक लेखन अथवा मंच संचालन में रुचि रखने वालों के लिए रंगमंच एक सशक्त पेशेवर आधार तैयार करता है। मंच पर जीवंत प्रस्तुति देने से शुरू होने वाला यह सफर आगे चलकर सिनेमा निर्माण, पटकथा लेखन, फिल्म निर्देशन अथवा खुद का कला प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने तक विस्तारित हो जाता है। इस विधा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि छोटे शहरों या साधारण स्तर से शुरुआत करके भी कलाकार अपने अनुभव और अभ्यास के दम पर नियमित आमदनी खड़ी कर सकते हैं।
मंचीय नाटकों से परे कई क्षेत्रों में खुलते हैं अवसर
अंबाला में बीते करीब चार वर्षों से रंगमंच की गतिविधियों से जुड़े कलाकार यश शर्मा का मानना है कि वर्तमान दौर में रंगमंच की सीमाएं सिर्फ सभागार के मंच पर नाटक खेलने तक सीमित नहीं रह गई हैं। मूल रूप से बहादुरगढ़ के निवासी यश शर्मा जब इस विधा में आए थे, तब उन्हें रंगमंच की विस्तृत समझ नहीं थी और वे मुख्य रूप से एक वीडियो एडिटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। धीरे-धीरे नाटकों के परिवेश से जुड़ने के बाद उनके नजरिए और कौशल में व्यापक विस्तार हुआ। उनका कहना है कि जो युवा मंच पर रुचि दिखाते हैं, वे केवल अदाकारी ही नहीं बल्कि मनोरंजन जगत के अन्य तकनीकी व रचनात्मक आयामों में भी खुद को स्थापित कर सकते हैं।
रचनात्मक लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में बढ़ता दायरा
रंगमंच से जुड़ने का सीधा प्रभाव किसी भी व्यक्ति की रचनात्मक सोच और अवलोकन क्षमता पर पड़ता है। मंच के अनुभव ने यश शर्मा की सृजनशीलता को तराशा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें रचनात्मक लेखक के तौर पर काम करने के नियमित मौके मिलने लगे। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि किसी युवा के पास कहानी गढ़ने और भावों को अभिव्यक्त करने की क्षमता है, तो थिएटर उसके लिए एक बेहतरीन व्यावहारिक प्रशिक्षण केंद्र का काम करता है। यहां से तैयार होकर कलाकार आगे चलकर पटकथा लेखन, लघु फिल्मों के निर्माण और निर्देशन जैसे गंभीर रचनात्मक दायित्वों को आत्मविश्वास के साथ संभाल सकते हैं।
शुरुआती मानदेय से लेकर लाखों की आय तक का सफर
रंगमंच में आर्थिक सुरक्षा को लेकर अक्सर संशय रहता है, परंतु व्यावहारिक आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। इस क्षेत्र में शुरुआती दौर में भले ही कुछ हजार रुपये से शुरुआत होती हो, लेकिन जैसे-जैसे अनुभव और काम का दायरा बढ़ता है, आमदनी लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। मेट्रो और बड़े शहरों में चार से पांच साल तक लगातार मंच अभ्यास करने वाले दक्ष कलाकारों को करीब 1 लाख रुपये मासिक वेतन या प्रोजेक्ट आधारित पैकेज वाले अवसर मिलने लगते हैं। वहीं शुरुआती स्तर पर काम करने वाला कलाकार भी विभिन्न प्रोजेक्ट्स के जरिए लगभग 30 से 40 हजार रुपये महीने की कमाई का आधार तैयार कर लेता है। हालांकि यह कमाई शहर के आकार, काम के स्वरूप, प्रोजेक्ट के बजट और व्यक्तिगत दक्षता के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
मंडली की प्रस्तुतियां और युवा उत्सवों से आर्थिक संबल
रंगमंच से जुड़े दलों के लिए सामूहिक प्रस्तुतियां आमदनी का एक प्रमुख स्रोत होती हैं। किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम या सार्वजनिक आयोजन के लिए एक नाटक मंडली को सामान्यतः 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक का भुगतान प्राप्त होता है। एक सामान्य नाटकीय दल में करीब 9 से 10 सदस्य शामिल होते हैं, जिनमें मंच के कलाकारों के साथ तकनीकी सहयोगी भी रहते हैं। आयोजन से मिलने वाली यह कुल राशि कलाकारों के दायित्व और उनकी भूमिका के अनुसार आपस में वितरित की जाती है। इसके अतिरिक्त कॉलेज व विश्वविद्यालय स्तर पर होने वाले यूथ फेस्टिवल और राज्य स्तरीय नाट्य प्रतियोगिताओं में नकद पुरस्कार जीतने के अवसर मिलते हैं। यश शर्मा स्वयं रंगमंच की कमाई से अपनी कॉलेज की पढ़ाई का शुल्क भरने के साथ-साथ रहने और खानपान का दैनिक खर्च भी निकाल रहे हैं।
नाट्य अकादमी और शिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षण के मौके
रंगमंच का पर्याप्त अनुभव अर्जित करने के उपरांत कलाकारों के लिए शिक्षण का क्षेत्र भी एक मजबूत आय का साधन बनता है। कई कलाकार बच्चों और युवाओं को अभिनय सिखाने के लिए अपनी स्वतंत्र छोटी नाट्य अकादमी शुरू करते हैं। अंशकालिक तौर पर बच्चों को अभिनय और मंच प्रस्तुति का प्रशिक्षण देकर लगभग 30 से 35 हजार रुपये प्रति माह की आय आसानी से बनाई जा सकती है। इसके अलावा निजी एवं सरकारी स्कूलों में नाट्य प्रशिक्षक या कला शिक्षक के तौर पर भी स्थायी व अनुबंध आधारित नियुक्तियां मिलती हैं, जहां नए प्रशिक्षक को शुरुआती दौर में करीब 20 से 25 हजार रुपये महीने का वेतन मिल सकता है।
कड़े अनुशासन, रियाज और समाज के यथार्थ की समझ
रंगमंच केवल जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की वास्तविकताओं और संवेदनशील मुद्दों को गहराई से समझने की दृष्टि भी देता है। आज अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को केवल किताबी पढ़ाई और अंकों की दौड़ तक सीमित रखने का प्रयास करते हैं, जबकि मंचीय कलाएं बच्चों के भीतर कल्पनाशक्ति, संवाद कौशल और आत्मविश्वास का संचार करती हैं। थिएटर में अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए सुबह जल्दी उठकर घंटों शारीरिक और वाचिक रिहर्सल करनी पड़ती है। लगातार कड़े रियाज और समाज के प्रति सजग दृष्टिकोण से ही एक कलाकार अपनी अलग पहचान कायम कर पाता है। अभिनय से लेकर खुद की अकादमी स्थापित करने तक, थिएटर अब युवाओं के लिए एक स्वावलंबी उद्यम में तब्दील हो चुका है।



















