टी20 फॉर्मेट के इस दौर में जब क्रिकेट मैच केवल चार घंटे में समाप्त हो जाते हैं और टेस्ट मैच भी पांच दिनों तक सीमित रहते हैं, तब 12 दिनों तक चलने वाले मुकाबले की कल्पना करना भी किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। हालांकि, जब गॉल के मैदान पर भारतीय टीम अपने 600वें टेस्ट मैच के ऐतिहासिक पल से जुड़ी यादों को ताजा करती है, तो क्रिकेट के 149 साल से भी लंबे इतिहास के वे पन्ने सामने आते हैं जो आज के दर्शकों को हैरान कर देते हैं। इस खेल के इतिहास में मार्च 1939 का डरबन टेस्ट सबसे अनोखा मुकाबला माना जाता है, जहां समय और तारीख की तमाम सीमाएं टूट गई थीं।
बिना किसी समय सीमा के खेला गया ऐतिहासिक मुकाबला
क्रिकेट की शुरुआत के शुरुआती दशकों में कुछ टेस्ट मैचों को बिना किसी समय सीमा के खेला जाता था, जिन्हें टाइमलेस टेस्ट कहा जाता था। इन मैचों का नियम यह था कि जब तक कोई टीम स्पष्ट रूप से हार या जीत हासिल न कर ले, तब तक खेल हर दिन जारी रहता था। दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर के किंग्समीड मैदान पर इंग्लैंड और मेजबान टीम के बीच पांच मैचों की सीरीज का आखिरी टेस्ट इसी नियम के तहत शुरू हुआ था। यह मुकाबला 12 दिनों की अवधि तक खिंचा और इसमें 43 घंटे से भी ज्यादा समय तक मैदान पर गेंद और बल्ले की जोरदार जंग हुई। पूरे मैच के दौरान दोनों टीमों ने मिलकर 1,981 रन बनाए, जो आज भी टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में एक मैच में बने सबसे ज्यादा रनों का रिकॉर्ड है।
तीन पारियों में रनों की विशाल इमारत
डरबन के इस मुकाबले में बल्लेबाजों का पूरा दबदबा देखने को मिला। दक्षिण अफ्रीका ने अपनी पहली पारी में शानदार प्रदर्शन करते हुए 530 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। इसके जवाब में इंग्लैंड की टीम अपनी पहली पारी में 316 रन ही बना सकी, जिससे मेजबान टीम को मजबूत बढ़त हासिल हो गई। दूसरी पारी में भी दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाजों ने आक्रामक रुख बनाए रखा और 481 रन ठोक दिए। इस तरह दक्षिण अफ्रीका ने इंग्लैंड के सामने चौथी पारी में जीत हासिल करने के लिए 696 रनों का विशाल और लगभग असंभव दिखने वाला लक्ष्य रखा।
बिल एडरिच का दोहरा शतक और इंग्लैंड की ऐतिहासिक वापसी
पहाड़ जैसे 696 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम ने हार मानने के बजाय अभूतपूर्व साहस दिखाया। बल्लेबाज बिल एडरिच ने 219 रनों की बेहतरीन पारी खेलकर टीम की वापसी की नींव रखी। कप्तान वॉली हैमंड ने भी जिम्मेदारी भरी बल्लेबाजी करते हुए टीम की स्थिति को मजबूत किया। खेल के 12वें दिन तक इंग्लैंड ने 5 विकेट खोकर 654 रन बना लिए थे। उस समय इंग्लैंड को जीत के लिए केवल 42 रनों की दरकार थी और उनके हाथ में 5 विकेट सुरक्षित थे। इंग्लैंड की टीम टेस्ट क्रिकेट इतिहास का सबसे बड़ा लक्ष्य हासिल करके एक नया कीर्तिमान रचने के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी थी।
बारिश का आगमन और समुद्री जहाज पकड़ने की मजबूरी
इंग्लैंड की जीत तय लग रही थी, लेकिन तभी डरबन के मौसम ने करवट ली और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश के कारण खेल को रोकना पड़ा, परंतु इंग्लैंड की टीम के सामने मौसम से भी बड़ी एक प्रशासनिक चुनौती खड़ी थी। मेहमान टीम को डरबन से ट्रेन पकड़कर केपटाउन जाना था, ताकि वे वहां से अपने देश वापस लौटने वाला समुद्री जहाज पकड़ सकें। वर्ष 1939 के उस दौर में लंबी दूरी के लिए हवाई यात्रा की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। यदि खिलाड़ी उस दिन सही समय पर ट्रेन में सवार नहीं होते, तो स्वदेश लौटने वाला उनका तय जहाज छूट जाता।
हमेशा के लिए बंद हुआ टाइमलेस टेस्ट का अध्याय
बारिश के लगातार जारी रहने और ट्रेन की समय सारणी को देखते हुए दोनों टीमों के कप्तानों तथा अंपायरों ने सर्वसम्मति से मैच को वहीं रोकने का निर्णय लिया। इस तरह 12 दिनों के अथक परिश्रम, 43 घंटे के खेल और 1,981 रनों के विशाल स्कोर के बावजूद इस ऐतिहासिक मैच का अंत बिना किसी नतीजे के ड्रॉ पर हुआ। यह मुकाबला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के इतिहास का अंतिम टाइमलेस टेस्ट साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद क्रिकेट प्रशासकों को यह समझ आ गया कि बिना समय सीमा वाले मैच आयोजित करना व्यावहारिक नहीं है। इसके तुरंत बाद शुरू हुए द्वितीय विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया के खेल परिदृश्य को बदल दिया और डरबन का किंग्समीड मैदान इस अनोखे इतिहास का प्रतीक बन गया।



















