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संजय मांजरेकर का करियर: राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के आने से क्या थमा सुनील गावस्कर के उत्तराधिकारी का सफर?क्रिकेट
12 जुल॰ 2026, 6:44 am (17 दिन पहले)· 3

संजय मांजरेकर का करियर: राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के आने से क्या थमा सुनील गावस्कर के उत्तराधिकारी का सफर?

संजय मांजरेकर को भारतीय क्रिकेट का अगला सुनील गावस्कर माना जाता था, लेकिन खुद उनके खुलासे के मुताबिक टीम में नए खिलाड़ियों के उदय और सचिन तेंदुलकर को लेकर उनकी बेबाक राय ने उनके सफर को प्रभावित किया।

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में संजय मांजरेकर का नाम एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में लिया जाता है, जिन्हें कभी सुनील गावस्कर का असली वारिस माना गया था। खेल विरासत में मिलने के कारण उन पर हमेशा से एक बड़ा दबाव था। उनके पिता विजय मांजरेकर उस दौर के दिग्गज थे जब भारतीय टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। नियति की क्रूरता देखिए कि जब उनके पिता का देहांत हुआ, तब संजय की उम्र महज 18 साल थी और उन्होंने अभी तक घरेलू स्तर पर रणजी ट्रॉफी में पदार्पण भी नहीं किया था। इसके बावजूद, उनके पिता का अटूट विश्वास था कि उनका बेटा एक दिन टीम इंडिया की नीली जर्सी पहनकर देश का गौरव बढ़ाएगा।

तकनीकी रूप से सक्षम खिलाड़ी की पहचान

अपने अंतरराष्ट्रीय करियर के दौरान, संजय मांजरेकर ने अपनी एक ऐसी छवि बनाई जो तकनीक के मामले में बेहद परिपक्व और ठोस थी। विदेशी पिचों पर उनका प्रदर्शन इतना शानदार रहता था कि साथी खिलाड़ी उन्हें प्यार और सम्मान से ‘मिस्टर परफेक्ट’ कहकर बुलाते थे। हालांकि, सचिन तेंदुलकर का नजरिया थोड़ा अलग था। सचिन उन्हें ‘मिस्टर परफेक्ट’ के बजाय ‘मिस्टार डिफरेंट’ के नाम से संबोधित करते थे, जो उनके अलग अंदाज और व्यक्तित्व को बयां करता था।

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करियर का असमय अंत और बदलाव

इतनी प्रतिभा और तकनीक होने के बावजूद, संजय मांजरेकर उस ऊंचाई को हासिल नहीं कर पाए जिसकी उनसे अपेक्षा की जा रही थी। उनके करियर का ग्राफ़ उम्मीद के अनुरूप लंबा नहीं रहा। 2018 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘इंपर्फेक्ट’ में उन्होंने खुद इस बात के पीछे की कहानी साझा की। मांजरेकर ने स्पष्ट किया कि राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के भारतीय टीम में आगमन ने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर के अंत की नींव रख दी थी।

1996 का इंग्लैंड दौरा और संन्यास का फैसला

मांजरेकर ने किताब में उल्लेख किया है कि जब उन्होंने क्रिकेट छोड़ने का निर्णय लिया, तब वे टीम से बाहर नहीं थे और न ही वे अपनी लय से भटके हुए थे। 1996 का इंग्लैंड दौरा उनके लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उस दौरे पर राहुल द्रविड़ से शानदार प्रदर्शन की उम्मीदें थीं, लेकिन सौरव गांगुली का प्रदर्शन एक सुखद आश्चर्य की तरह सामने आया। मांजरेकर ने ईमानदारी से स्वीकारा कि द्रविड़ और गांगुली को इंग्लैंड की चुनौतीपूर्ण पिचों पर खेलते देखकर वे भांप गए थे कि अब उनका दौर पूरा हो चुका है। उन्होंने महसूस किया कि नई पीढ़ी के लिए रास्ता छोड़ना ही समझदारी है। खेल को अलविदा कहने के बाद उन्होंने कमेंट्री के क्षेत्र में अपनी एक अलग और बेबाक पहचान बनाई।

सचिन तेंदुलकर पर टिप्पणी

संजय मांजरेकर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। अपनी किताब में उन्होंने सचिन तेंदुलकर की फॉर्म और टीम में उनके स्थान पर भी बात की है। उनका तर्क था कि जब सचिन अपने करियर के आखिरी दौर में खराब दौर से गुजर रहे थे, तब उनकी महानता के कारण प्रबंधन में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उन्हें प्लेइंग-11 से हटा सके। मांजरेकर का मानना था कि खराब फॉर्म के बावजूद केवल नाम के आधार पर खिलाड़ी को टीम में बनाए रखना, उन युवा प्रतिभाओं के साथ अन्याय था जो बाहर बैठकर मौका मिलने का इंतजार कर रहे थे।

सवाल-जवाब

संजय मांजरेकर की आत्मकथा का क्या नाम है?
संजय मांजरेकर की आत्मकथा का नाम 'इंपर्फेक्ट' है, जो 2018 में लॉन्च हुई थी।
संजय मांजरेकर ने करियर खत्म होने का मुख्य कारण किसे माना?
मांजरेकर ने माना कि भारतीय क्रिकेट में राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के उदय के कारण उन्हें लगा कि उनका समय पूरा हो गया है।
सचिन तेंदुलकर संजय मांजरेकर को क्या बुलाते थे?
सचिन तेंदुलकर उन्हें 'मिस्टार डिफरेंट' कहकर बुलाते थे।
मांजरेकर ने 1996 के किस दौरे के बाद संन्यास लेने का मन बनाया?
1996 के ऐतिहासिक इंग्लैंड दौरे के बाद उन्हें एहसास हुआ कि अब उन्हें युवाओं के लिए जगह छोड़ देनी चाहिए।
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