किस्मत और अवसरों का खेल कई बार बेहद अजीब मोड़ ले लेता है, जहां तमाम योग्यता होने के बावजूद फैसला आपके हक में नहीं जाता है। भारतीय क्रिकेट के गलियारों में कुछ ऐसा ही वाकया एक बार फिर देखने को मिला है, जब घरेलू क्रिकेट के दिग्गजों में गिने जाने वाले खिलाड़ी को बड़ा पद मिलने से चूक जाना पड़ा। बिना किसी कमी के जब हर पैमाना पूरा करने के बाद भी नतीजा मनमुताबिक न हो, तो इसे केवल किस्मत की विडंबना ही कहा जा सकता है।
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व सलामी बल्लेबाज वसीम जाफर का करियर हमेशा से ही आंकड़ों और प्रतिभा से समृद्ध रहा है, लेकिन जब राष्ट्रीय चयन समिति में शामिल होने का मौका आया, तो वे एक बार फिर बाहर रह गए। उनके शानदार रिकॉर्ड और मैदान पर बनाए गए रनों का अंबार भी इस बार उनके काम नहीं आ सका। हालात ऐसे बन गए कि उनका अत्यधिक क्रिकेट खेलना और बेहतरीन आंकड़े ही उनके रास्ते में बड़ी रुकावट बन गए, जिससे चयन की प्रक्रिया में वे पिछड़ गए।
चयन समिति के नियम और गणित का फेर
वसीम जाफर के मुकाबले रमेश पोवार को चयन समिति में तरजीह मिलने के पीछे बोर्ड के अपने नियम और समीकरण काम कर रहे थे। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के तय नियमों के अनुसार, चयन समिति में सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने वाला सदस्य ही पैनल का अध्यक्ष बनता है। इस नियम के तहत वरिष्ठता का पैमाना लागू होता है, जिसके मुताबिक सबसे अधिक टेस्ट खेलने वाले खिलाड़ी को ही समिति की कमान सौंपी जाती है। वसीम जाफर ने अपने करियर में 31 टेस्ट मैच खेले थे, जबकि प्रज्ञाच ओझा के खाते में 24 टेस्ट दर्ज थे। यदि वसीम जाफर का चयन हो जाता, तो वे स्वतः ही इस नियम के कारण समिति के अध्यक्ष बन जाते।
सामने आई जानकारियों के मुताबिक, क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी का यह मानना था कि आगामी विश्व कप से ठीक एक साल पहले समिति के अध्यक्ष पद पर किसी नए बदलाव से टीम की मौजूदा सोच और निरंतरता पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से रमेश पोवार को इस जिम्मेदारी के लिए चुना गया, जिन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में दो टेस्ट और 31 वनडे मैच खेले थे। रमेश पोवार का राष्ट्रीय चयनकर्ता के रूप में चुना जाना कई क्रिकेट प्रेमियों और जानकारों को रास नहीं आ रहा है, क्योंकि उनका पिछला कोचिंग का सफर विवादों से घिरा रहा था।
विवादों और पुराने तौर-तरीकों पर उठते सवाल
रमेश पोवार इससे पहले भारतीय महिला क्रिकेट टीम के साथ मुख्य कोच के रूप में काम कर चुके हैं, जहां उस दौरान दिग्गज खिलाड़ी मिताली राज के साथ उनका विवाद सामने आया था। उनके कोचिंग कार्यकाल का वह अध्याय बेहद चर्चित और विवादित रहा था, जिसके बाद उन्हें उस पद से हटाना पड़ा था। ऐसे में उनके चयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है और कई लोगों का यह भी मानना है कि उनकी कार्यशैली और सोच पुरानी है, जिससे बोर्ड का यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है।
हालांकि, यह पूरा मामला किसी एक व्यक्ति को सही या गलत ठहराने का नहीं है, बल्कि मुख्य सवाल यह है कि जब चयन के मानक और कसौटी पूरी तरह स्पष्ट न हों, तो सबसे ज्यादा नुकसान उस व्यक्ति को उठाना पड़ता है जिसके पास सबसे मजबूत और ठोस आंकड़े होते हैं। वसीम जाफर ने अपने पूरे करियर के दौरान कभी भी मीडिया में आकर अपनी शिकायतों का शोर नहीं मचाया। उन्होंने मैदान पर हमेशा बल्ले से रन बनाकर ही अपने आलोचकों को जवाब दिया और अपनी काबिलियत साबित की। वर्ष 2027 का आगामी विश्व कप यह तय करेगा कि बोर्ड द्वारा चला गया यह दांव सही साबित हुआ या नहीं, लेकिन इतिहास के पन्नों में यह जरूर दर्ज रहेगा कि चयन समिति की बस पकड़ने के लिए कतार में सबसे आगे खड़े खिलाड़ी की ही बस छूट गई।
शानदार आंकड़े और घरेलू क्रिकेट का बेजोड़ सफर
बैकफुट के बेहद शानदार और तकनीक रूप से दक्ष खिलाड़ी माने जाने वाले वसीम जाफर को किस्मत ने कभी भी फ्रंटफुट पर खुलकर खेलने का पूरा मौका नहीं दिया। उन्होंने भारत के लिए कुल 31 टेस्ट मैच खेले, जिनमें उन्होंने 34.10 की औसत से 1,944 रन बनाए। इस दौरान उनके बल्ले से पांच शतक और 11 अर्धशतक निकले, जिसमें एक शानदार दोहरा शतक (212 रन) भी शामिल है। इसके विपरीत, एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें सिर्फ दो मुकाबले खेलने का मौका मिला और दोनों पारियों में वे केवल 10 रन ही बना सके, यानी उन्हें इस प्रारूप में खुद को साबित करने का पर्याप्त अवसर ही नहीं मिला।
वसीम जाफर के असली कौशल की तस्वीर घरेलू क्रिकेट के मैदान पर दिखाई देती है, जहां उन्होंने 260 प्रथम श्रेणी मैचों में 50.67 की औसत से 19,410 रन बनाए। उनके नाम घरेलू क्रिकेट में 57 शतक और 91 अर्धशतक दर्ज हैं, जिसमें उनका सर्वोच्च व्यक्तिगत स्कोर नाबाद 314 रन रहा है। रणजी ट्रॉफी में मुंबई से लेकर विदर्भ तक उनकी बल्लेबाजी की निरंतरता उनकी सबसे बड़ी पहचान रही। घरेलू क्रिकेट में जिस खिलाड़ी की सबसे ज्यादा कद्र होनी चाहिए थी, उसे अंतरराष्ट्रीय बड़े मंच पर उतनी जगह और भरोसा नहीं मिला। यह एक कड़वी सच्चाई है कि टीम संयोजन और उस दौर की कड़ी प्रतिस्पर्धा ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि इतने सारे रन बनाने के बाद भी वसीम जाफर को टीम प्रबंधन का पूरा भरोसा क्यों नहीं मिल पाया।



















