हैदराबाद में एक ऐसे बुजुर्ग की चर्चा जोरों पर है जो इस पड़ाव पर भी युवाओं को मात दे रहे हैं। आमतौर पर आधुनिक दौर की गलत जीवनशैली और मिलावट के कारण लोग साठ साल की उम्र पार करते ही तमाम बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। इसके विपरीत चौहत्तर वर्ष के भद्रन्ना ने अपनी शारीरिक क्षमता से सबको चौंका दिया है। इस उम्र में लोग घर पर आराम करना पसंद करते हैं, लेकिन वे चिलचिलाती धूप में भी जमीन खोदने जैसे कठिन काम बड़ी फुर्ती के साथ करते हैं।
पारंपरिक खानपान और मेहनत का कमाल
अपनी इस असाधारण फिटनेस के पीछे भद्रन्ना अपने पुराने खानपान और जीवनशैली को मुख्य वजह मानते हैं। उनका कहना है कि आज का खानपान पहले जैसा शुद्ध नहीं रह गया है। अपने शुरुआती जीवन में उन्होंने रागी, ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे पौष्टिक मोटे अनाजों का नियमित सेवन किया है। उनके रोजाना के भोजन में रागी का दलिया और मक्के की रोटियां मुख्य रूप से शामिल हुआ करती थीं। इसके साथ ही प्राकृतिक रूप से मिलने वाले मांसाहारी विकल्प, अंडे और मछलियों ने उनकी हड्डियों और मांसपेशियों को भीतर से मजबूत बनाने का काम किया है।
दो दशकों से जारी है शारीरिक श्रम
भद्रन्ना पिछले बीस साल से ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत लगातार मेहनत मजदूरी कर रहे हैं। भारी पत्थरों को हटाना हो या जमीन की खुदाई करनी हो, वे कभी भी काम से पीछे नहीं हटते हैं। वर्तमान में चल रहे एक कार्य को पूरा होने में लगभग चालीस से पैंतालीस दिन का समय लगना है, जिसमें वे बिना किसी थकावट के लगातार पसीना बहा रहे हैं। उनका यह मानना है कि शरीर से लगातार काम लेते रहने से बीमारियां दूर रहती हैं और इंसान हमेशा चुस्त-दुरुस्त बना रहता है।
युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत
आज की नई पीढ़ी जो लगातार जंक फूड और निष्क्रिय जीवनशैली की आदी होती जा रही है, उसके लिए भद्रन्ना का यह जीवन एक बड़ा सबक है। उनकी यह कहानी साफ तौर पर यह साबित करती है कि यदि खानपान में पारंपरिक और पौष्टिक अनाजों को जगह दी जाए और शरीर को सक्रिय रखा जाए, तो उम्र केवल एक कागजी आंकड़ा बनकर रह जाती है।























