उत्तर पूर्वी दिल्ली की तंग गलियों में मेकअप ब्रश थामने वाली एक आम युवती किस तरह संगठित अपराध की खौफनाक दुनिया की शीर्ष रणनीतिकार बन गई, यह कहानी राजधानी के अंडरवर्ल्ड के बदलते तौर तरीकों को उजागर करती है। चौहान बांगर इलाके में एक छोटा सा ब्यूटी पार्लर चलाने वाली खुशनुमा अंसारी उर्फ नेहा अपने पड़ोस में बेहद शांत और सलीकेदार महिला मानी जाती थी। स्थानीय महिलाएं उसे एक आत्मनिर्भर और कर्मठ ब्यूटीशियन के तौर पर देखती थीं, जो शादियों के श्रृंगार, पार्टी ग्रूमिंग और हेयर स्टाइलिंग में व्यस्त रहती थी। बाहर से दिखने वाले इस साधारण और मासूम चेहरे के पीछे अपराध का एक ऐसा खतरनाक ढांचा सक्रिय था, जिसका सीधा ताल्लुक हथियारों की तस्करी, भारी मात्रा में हेरोइन की खरीद-फरोख्त और सुपारी लेकर हत्याएं करने वाले खूंखार गिरोहों से था।
गैंगस्टर बॉबी कबूतर से मुलाकात और अपराध के दलदल में पहला कदम
खुशनुमा की इस सीधी-सादी दिनचर्या में उथल-पुथल करीब सात साल पहले शुरू हुई, जब उसकी मुलाकात महफूज अली उर्फ बॉबी कबूतर से हुई। दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और पंजाब में सक्रिय अंडरवर्ल्ड के भीतर बॉबी कबूतर का नाम बेहद कुख्यात था। वह लॉरेंस बिश्नोई तथा हाशिम बाबा के साझा गठजोड़ के लिए सबसे अहम हथियार सप्लायर और तेज तर्रार शूटर की भूमिका निभा रहा था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के साथ-साथ पंजाब पुलिस की मोस्ट वांटेड सूची में वह पिछले लगभग दस सालों से प्रमुखता से दर्ज था। हत्या, रंगदारी वसूली और अवैध असलहा तस्करी के दर्जनों आपराधिक मामले उस पर दर्ज थे, जिसके चलते वह लगातार पुलिस की पकड़ से बचने के लिए छिपता फिर रहा था।
बॉबी की भारी नकदी से भरी जेबें, दबंग जीवनशैली और कानून से बेपरवाह अंदाज ने खुशनुमा को गहरे तक प्रभावित किया। धीरे-धीरे दोनों का परिचय एक नजदीकी रिश्ते में बदल गया और वे साथ रहने लगे। इस रिश्ते में आने के बाद खुशनुमा ने अपने साथी के आपराधिक रिकॉर्ड की परवाह करना छोड़ दिया। उसने यह जानते हुए भी उसका साथ नहीं छोड़ा कि बॉबी कानून से भाग रहा एक इनामी मुजरिम है, जिस पर पुलिस का शिकंजा कभी भी कस सकता है। इसके विपरीत, उसने खुद को उसी गैरकानूनी तंत्र का अभिन्न हिस्सा बनाने का मन बना लिया।
पर्दे के पीछे से संभाली लॉजिस्टिक्स और संचार की गुप्त कमान
शुरुआती दिनों में खुशनुमा ने किसी वारदात में सीधे उतरने के बजाय गिरोह की सुरक्षा ढाल बनने का फैसला किया। जब स्पेशल सेल और स्थानीय पुलिस की टीमें बॉबी कबूतर की तलाश में संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही थीं, तब जमीनी स्तर पर उसके ठहरने और सुरक्षित रहने की पूरी योजना खुशनुमा ही तैयार करती थी। बॉबी कभी भी एक ठिकाने पर लंबे समय तक नहीं रुकता था। ऐसे हालात में फर्जी पहचान पत्रों और जाली दस्तावेजों के सहारे नए सेफ हाउस किराए पर लेना, उनका किराया समय पर पहुंचाना और रोजमर्रा के राशन की व्यवस्था करना खुशनुमा के जिम्मे आ गया।
इसके साथ ही उसने गिरोह के गोपनीय संचार माध्यमों पर भी महारत हासिल कर ली। जांच एजेंसियों की ट्रैकिंग से बचने के लिए बॉबी को साधारण मोबाइल नेटवर्क या सीधे फोन कॉल करने की सख्त मनाही थी। खुशनुमा ने आधुनिक तकनीकी टूल्स, एनक्रिप्टेड मैसेजिंग एप्लिकेशन्स और विदेशी वर्चुअल नंबरों का सहारा लिया। इन्हीं सुरक्षित माध्यमों से वह लॉरेंस बिश्नोई और हाशिम बाबा गिरोह के प्रमुख सदस्यों से बॉबी की बातचीत करवाती थी। वह पुलिस की स्थानीय गश्त और खुफिया गतिविधियों पर भी बारीक नजर रखती थी ताकि किसी भी छापे से पहले ठिकाना बदला जा सके।
ब्यूटी पार्लर बना आपराधिक गतिविधियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना
चौहान बांगर में स्थित उसका ब्यूटी पार्लर इस दोहरे खेल के लिए सबसे मुफीद आड़ साबित हुआ। दिन के उजाले में जहां महिलाएं वहां चेहरे की साज-सज्जा और बालों की ग्रूमिंग के लिए जुटती थीं, वहीं शाम होते ही उस पार्लर के दरवाजे के पीछे से संगठित गिरोहों के वित्तीय लेन-देन, हथियारों की सप्लाई और गुप्त ठिकानों के कोडवर्ड तय होने लगते थे। आम लोगों और पड़ोसियों को कभी शक नहीं हुआ कि जिस दुकान में मेकअप का सामान रखा है, वहीं से भारी मात्रा में कारतूसों और बंदूकों का लेखा-जोखा संचालित हो रहा था। इस तरह खुशनुमा धीरे-धीरे पूरे आपराधिक नेटवर्क की सबसे मजबूत रीढ़ बन गई।
जोया खान की गिरफ्तारी और नेटवर्क की फ्रंट कमान संभालना
अपराध जगत में खुशनुमा का रुतबा तब तेजी से बढ़ा जब सिंडिकेट के भीतर एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया। हाशिम बाबा की पत्नी जोया खान को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने रंगे हाथों दबोच लिया। उस कार्रवाई के दौरान जोया के पास से करीब एक करोड़ रुपये मूल्य की भारी खेप में हेरोइन बरामद की गई थी। जोया खान के तिहाड़ जेल भेजे जाने के बाद दोनों गिरोहों की ड्रग्स सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई, जिससे सिंडिकेट की आर्थिक रीढ़ टूटती नजर आने लगी।
गिरोह के बड़े संचालकों को एक ऐसे निष्कलंक चेहरे की तलाश थी जिसका पुलिस फाइलों में कोई पुराना आपराधिक इतिहास न हो और जो पूरे नेटवर्क को बिना किसी जांच एजेंसी के शक के दोबारा खड़ा कर सके। खुशनुमा अंसारी ने इसी मौके पर पर्दे के पीछे से निकलकर सीधे मुख्य भूमिका संभाल ली। उसने जोया खान के खाली हुए पूरे ड्रग्स साम्राज्य पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में नशीले पदार्थों की आवक, स्थानीय पैडलर्स के जरिए खुदरा बाजार में वितरण और उससे आने वाले लाखों-करोड़ों रुपये की वसूली का सारा हिसाब खुशनुमा के हाथों से गुजरने लगा।
व्यापारियों से अवैध वसूली और 'मैडम जहर' नाम मिलने की वजह
मादक पदार्थों के धंधे पर पूरी पकड़ बनाने के अलावा खुशनुमा ने कारोबारियों और चिन्हित किए गए लोगों से की जाने वाली जबरन वसूली के पैसों का प्रबंधन भी अपने जिम्मे ले लिया। उसकी सटीक योजनाएं, विपरीत परिस्थितियों में बिना घबराए काम करने की क्षमता और आपराधिक दुनिया के भीतर उसकी बेबाक मौजूदगी को देखते हुए सिंडिकेट के गुर्गों ने उसे एक नया उपनाम दिया, जो अंडरवर्ल्ड में 'मैडम जहर' के नाम से चर्चित हुआ।
एक तरफ जब खुशनुमा पीछे रहकर पूरी वित्तीय व्यवस्था, सेफ हाउस का बंदोबस्त और नशीले पदार्थों के कारोबार को चला रही थी, वहीं दूसरी तरफ महफूज अली उर्फ बॉबी कबूतर बिना किसी हिचक के गंभीर खूनी वारदातों को अंजाम देने में लगा हुआ था। इसी मजबूत भूमिगत सहारे के दम पर सिंडिकेट ने कई सनसनीखेज घटनाओं को अंजाम दिया, जिसने दिल्ली और पंजाब के सुरक्षा महकमों में हड़कंप मचा दिया था। आखिरकार पुलिस की लगातार निगरानी और तकनीकी सुरागों की मदद से इस पूरे आपराधिक नेटवर्क की परतें खुलीं और ब्यूटीशियन से लेडी डॉन बनी खुशनुमा अंसारी का सच दुनिया के सामने आ गया।



















