केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले के तहत स्थानीय पुलिस को उस अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई शुरू करने की हरी झंडी दे दी है, जिनकी गाड़ी से एक भीषण सड़क हादसा हुआ था। इस दुर्घटना में पचपन वर्षीय एक व्यक्ति की जान चली गई थी, जिसके बाद से लगातार न्याय की मांग उठ रही थी। प्रशासनिक स्तर पर लिए गए इस निर्णय के बाद अब मामले की जांच का दायरा बढ़ गया है और संबंधित न्यायाधीश की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
घटना का विवरण और गिरफ्तारी
यह दर्दनाक हादसा चेन्नाल्लूर इलाके के पास हुआ था, जब पीड़ित जयबालकृष्णन अपनी खानपान की दुकान का काम खत्म करके देर रात अपने घर लौट रहे थे। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, जिस मर्सिडीज-बेंज कार से यह टक्कर हुई, वह उसी अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के नाम पर रजिस्टर्ड थी। उस समय वाहन को उनका सत्रह वर्षीय नाबालिग बेटा चला रहा था, जो कथित तौर पर बेहद तेज गति से गाड़ी भगा रहा था। तेज रफ्तार वाहन ने पीछे से पीड़ित के दोपहिया वाहन को जोरदार टक्कर मार दी, जिससे उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई।
कानूनी कार्रवाई और जमानत पर विवाद
शुरुआती दौर में पुलिस ने इस मामले में नरमी बरतते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 के तहत लापरवाही से मौत का मामला दर्ज किया था। इसके बाद आरोपी किशोर को किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश किया गया, जहां से उसे तुरंत जमानत मिल गई थी और वह पच्चीस अक्टूबर को बाहर आ गया था। हालांकि, इस फैसले के विरोध में मृतक के परिवारजनों और स्थानीय लोगों ने चेरानल्लूर थाने के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। बढ़ते दबाव और परिजनों के गुस्से को देखते हुए पुलिस ने आरोपी नाबालिग को दोबारा हिरासत में ले लिया और उसके खिलाफ धारा 105 यानी गैर-इरादतन हत्या के तहत गंभीर आरोप जोड़े।
परिवार का संघर्ष और उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि रसूखदार पृष्ठभूमि होने के कारण पुलिस ने शुरू में आरोपी के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया और उसे आसानी से जमानत दिला दी। छब्बीस अक्टूबर की सुबह मीडिया से बात करते हुए मृतक की बेटी ने दो टूक कहा कि वह अपने पिता के लिए आखिरी दम तक कानूनी लड़ाई लड़ेंगी और किसी भी सूरत में दोषियों को बचने नहीं देंगी। उन्होंने पुलिस तंत्र पर अविश्वास जताते हुए कहा कि नाबालिग होने की आड़ में गंभीर अपराधों के आरोपियों को आसानी से राहत दे दी जाती है। इसी पृष्ठभूमि में केरल हाईकोर्ट ने छब्बीस अक्टूबर को पुलिस को न्यायाधीश के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति दे दी, जिससे इस सनसनीखेज मामले में नया कानूनी मोड़ आ गया है।

















