हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा काट रहा एक दोषी पैरोल पर बाहर आने के बाद कानून की आंखों में धूल झोंककर पूरे 40 साल तक आजाद घूमता रहा। इतना ही नहीं, वह इस दौरान सरकारी शिक्षक बना, दशकों तक बच्चों को पढ़ाया, सेवानिवृत्त हुआ और उत्कृष्ट कार्य के लिए बेस्ट टीचर का पुरस्कार भी हासिल कर गया। हालांकि, चार दशकों के लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2024 में पुलिस ने उसे खोज निकाला और वापस जेल भेज दिया। इसके बाद 73 वर्षीय वृद्ध कैदी की पत्नी ने उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देकर तेलंगाना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन अदालत ने याचिका को साफ तौर पर खारिज कर दिया।
पैरोल की म्याद खत्म होने के बाद फरार होने की पूरी कहानी
यह पूरा घटनाक्रम दिसंबर 1983 में शुरू हुआ था, जब हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा भुगत रहे कैदी को 30 दिनों की पैरोल मंजूर की गई थी। नियमों के मुताबिक उसे अपनी तय समयावधि पूरी होने पर वापस जेल में रिपोर्ट करना था। बाद में किन्हीं कारणों से उसकी पैरोल की अवधि मार्च 1984 तक बढ़ा दी गई और उसे 18 मार्च 1984 को वापस जेल लौटना था। हालांकि, तय तारीख आने पर कैदी वापस जेल नहीं पहुंचा और रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गया। हैरानी की बात यह रही कि उस समय न तो जेल प्रशासन की ओर से उसकी गंभीरता से तलाश की गई और न ही कोई गहन पूछताछ हुई। वह व्यक्ति शांति से व्यवस्था की नजरों से बचकर गायब हो गया।
40 वर्षों का अज्ञातवास और सरकारी शिक्षक के रूप में पहचान
जेल से गायब होने के बाद उस व्यक्ति ने एक नई पहचान बनाई और अपनी पुरानी जिंदगी को पीछे छोड़ दिया। उसने सरकारी नौकरी हासिल की और एक शिक्षक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। उसने 40 सालों तक स्कूल में बच्चों को पढ़ाया और अपनी सेवा पूरी करने के बाद सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त भी हो गया। समाज में उसकी छवि इतनी अच्छी बन चुकी थी कि वर्ष 2004 में उसे बेस्ट टीचर का अवॉर्ड दिया गया। आसपास के लोगों तो दूर, वह स्वयं भी अपने अतीत के उस खौफनाक अध्याय को लगभग भूल चुका था। उसे यह अंदेशा तक नहीं था कि इतने लंबे समय बाद कानून के हाथ कभी उस तक पहुंच पाएंगे।
वर्ष 2024 में गिरफ्तारी और पत्नी की हाईकोर्ट में याचिका
चार दशक बीत जाने के बाद वर्ष 2024 में पुलिस को आखिरकार उस फरार कैदी की गुप्त सूचना मिली। पुलिस टीम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उसे दबोच लिया। जब उसे पकड़ा गया, तब तक उसकी उम्र 70 वर्ष से अधिक हो चुकी थी और वह 73 साल का बुजुर्ग बन चुका था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर अपनी बाकी बची उम्रकैद की सजा पूरी करने के लिए सेंट्रल जेल भेज दिया। 40 साल तक स्वतंत्रता से जीवन जीने के बाद अचानक बुढ़ापे में जेल जाना उसके और उसके परिवार के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। इसके बाद उसकी बुजुर्ग पत्नी ने हिम्मत जुटाकर तेलंगाना हाईकोर्ट में याचिका दायर की। पत्नी ने तर्क दिया कि उसके पति अब बहुत वृद्ध हो चुके हैं, इसलिए उन पर तीन साल तक पैरोल न मिलने का कठोर नियम लागू नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें रिहा किया जाना चाहिए।
जेल प्रशासन की विफलता पर तेलंगाना हाईकोर्ट का कड़ा रुख
तेलंगाना हाईकोर्ट की जस्टिस टी. माधवी देवी की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए पत्नी की रिहाई याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि एक सजायाफ्ता कैदी को चालीस साल तक ट्रैक न कर पाना जेल अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र की बहुत बड़ी नाकामी को दर्शाता है। अदालत ने कहा कि इतने वर्षों तक वह व्यक्ति बिना किसी बाधा के सरकारी नौकरी करता रहा, वेतन लेता रहा, पुरस्कार हासिल करता रहा और अंत में सेवानिवृत्त भी हो गया। यदि ऐसे मामलों में राहत दी गई तो इससे अन्य कैदियों को भी पैरोल का उल्लंघन करके लंबे समय तक फरार रहने की गलत प्रेरणा मिलेगी। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों की निगरानी के लिए एक मजबूत और प्रभावी ट्रैकिंग सिस्टम बनाया जाना बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी चूक दोबारा न हो।



















