पवन सिंह सावन में चिकन बनाते फंसे विवादों में, तिलक-लॉकेट पर भड़के लोगशाहजहांपुर के किसानों के लिए फूलगोभी की अगेती खेती से बंपर कमाई का मौकालाइव: यूएई का आरोप- ईरान ने तेल टैंकर पर किया हमला, ओमान ने होर्मुज़ वार्ता में प्रगति का दिया संकेतअनुज अग्निहोत्री की यूपीएससी सफलता: 1997 के इस लोकप्रिय गाने ने ऐसे संभाला हौसलाकिसान क्रेडिट कार्ड योजना: डिजिटल अपग्रेड और व्यापक दायरे से किसानों को मिल रहा है सीधा लाभचित्रकूट में देवांगना घाटी के ऊंचे पहाड़ों पर बसा पंपापुर आश्रम, जहां आध्यात्म और प्रकृति का अनोखा मेलसाल 2027 में मेष राशि में शनि का गोचर, जानिए किस पर शुरू होगी साढ़ेसाती और ढैय्याराजनीतिक खींचतान के चलते भारत और बांग्लादेश की आगामी क्रिकेट सीरीज पर लटकी तलवारमूलांक 8 राशिफल 9 अगस्त 2026: कामयाबी के लिए गुस्से की जगह अनुशासन और धैर्य जरूरीसोशल मीडिया पर छाए रवि किशन, 'मनी फॉलोज माई ब्रदर' मीम पर तोड़ी चुप्पी
भीमसागर के किनारे खड़ा महू का मोती महल, जहां पत्थरों में आज भी जिंदा है खींची राजवंश का इतिहासकल्चर
25 जून 2026, 6:45 am (45 दिन पहले)· 3

भीमसागर के किनारे खड़ा महू का मोती महल, जहां पत्थरों में आज भी जिंदा है खींची राजवंश का इतिहास

झालावाड़ के महू नगर में पहाड़ी की गोद में बसा मोती महल आज भी खींची शासकों के वैभव और राजपूत-मुगल स्थापत्य के अनोखे संगम की गवाही देता है। 1478 ईस्वी में धीरजदेव खींची ने इसे अपनी राजधानी बनाया था।

हाड़ौती की धरती पर बिखरी पुरानी इमारतों के बीच महू का मोती महल आज भी अपने रौबदार अतीत की चुपचाप कहानी कहता है। भीमसागर के पूर्वी किनारे पर एक पहाड़ी की गोद में खड़ा यह महल सदियों बाद भी रियासती ठाठ और शाही शानो-शौकत का अहसास कराता है। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि इसे करीब सन् 1478 ईस्वी में गागरोन के पराक्रमी खींची शासक अचलदास जी खींची के बेटे धीरजदेव जी खींची ने बसाया था।

धीरजदेव ने इस नए बसे नगर को अपनी राजधानी का दर्जा दिया और देखते ही देखते यह इलाका राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक हलचल का बड़ा केंद्र बन गया। उस दौर में महू राज्य के अधीन करीब चौदह सौ गाँव आते थे, और यही आंकड़ा इस रियासत की समृद्धि और रसूख की कहानी खुद बयान कर देता है।

ये भी पढ़ें

तीन खंडों में बना भव्य महल

महू की असली पहचान यहीं खड़े भव्य मोती महल से जुड़ी है। तीन खंडों में बना यह महल अपने जमाने की स्थापत्य कला का बेमिसाल नमूना माना जाता है। करीब एक सौ पचहत्तर फीट लंबा और साठ फीट ऊँचा यह महल दूर से ही अपनी बुलंदी और भव्यता का अहसास करा देता है। इसके विशाल प्रवेश द्वार, ऊँची प्राचीरें और मजबूत निर्माण उस दौर के कारीगरों की गजब की कलात्मक सोच की गवाही देते हैं।

शिलालेख की पहेली

महल के एक द्वार पर नागरी लिपि में एक शिलालेख खुदा हुआ मिलता है, जिसमें विक्रम संवत 1768 का जिक्र है। जानकारों का मानना है कि यह लेख शायद महल के किसी पुनर्निर्माण, विस्तार या जीर्णोद्धार से जुड़ा हो सकता है, क्योंकि महू की स्थापना तो इससे कहीं पहले की मानी जाती है। यही वजह है कि यह शिलालेख इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए आज भी खास दिलचस्पी का विषय बना हुआ है।

वक्त की मार ने भले ही इस राजमहल को कुछ हद तक खंडहर में बदल दिया हो, लेकिन इसके बचे हुए हिस्से आज भी उस दौर की रौनक का अहसास कराते हैं। परिसर में विशाल प्रवेश द्वार, देवालय, दरीखाना, कचहरी और राजमहल के अवशेष साफ नजर आते हैं। महल के भीतर स्थापित राता देवी की प्रतिमा यहाँ की स्थानीय आस्था और धार्मिक परंपराओं का अनूठा प्रतीक बनी हुई है।

राजपूत और मुगल शैली का अनोखा संगम

महल के पिछले हिस्से के कक्षों पर बनी पालकीनुमा छतें, सजे हुए स्तंभ और नफीस झरोखे उस दौर के स्थापत्य कौशल की बेहतरीन मिसाल पेश करते हैं। इनकी बनावट में राजपूत और मुगल शैली का अनोखा मेल दिखता है, जहाँ एक तरफ राजपूती भव्यता है तो दूसरी ओर मुगल वास्तुकला की नजाकत और सलीका भी साफ झलकता है।

आज भी मोती महल सिर्फ पत्थरों और दीवारों का ढेर नहीं है, बल्कि यह हाड़ौती की सांस्कृतिक विरासत, खींची राजवंश की गौरवगाथा और राजस्थान के सुनहरे इतिहास का जीता-जागता दस्तावेज है। इसकी खामोश दीवारें मानो बीते युग की उन कहानियों को अपने भीतर समेटे बैठी हैं, जिनमें वीरता, वैभव और सभ्यता की अमिट छाप दर्ज है।

इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं

महू का मोती महल यह खूबसूरत संदेश देता है कि इतिहास केवल ग्रंथों और अभिलेखों में ही जिंदा नहीं रहता, बल्कि वह ऐसी पुरानी इमारतों की साँसों में भी बसता है, जो सदियाँ गुजर जाने के बाद भी अपने गौरवमयी अतीत की अनकही दास्तान बड़ी खामोशी से सुनाती रहती हैं। बीते जमाने की शान को समेटे यह महल झालावाड़ की सबसे अहम ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है, जिसके एक द्वार पर खुदा विक्रम संवत 1768 का लेख आज भी खींची राजवंश की शान और रियासती वैभव की कहानी सुनाता है।

सवाल-जवाब

मोती महल कहाँ स्थित है?
यह महल हाड़ौती क्षेत्र के महू नगर में भीमसागर के पूर्वी किनारे पर एक पहाड़ी की गोद में स्थित है, जो झालावाड़ की ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है।
मोती महल की स्थापना किसने और कब की थी?
इसे करीब सन् 1478 ईस्वी में गागरोन के खींची शासक अचलदास जी खींची के बेटे धीरजदेव जी खींची ने बसाया था।
महू राज्य के अधीन कितने गाँव आते थे?
उस दौर में महू राज्य के अधीन करीब चौदह सौ (1400) गाँव आते थे।
मोती महल की लंबाई और ऊँचाई कितनी है?
तीन खंडों में बना यह महल करीब 175 फीट लंबा और 60 फीट ऊँचा है।
महल के द्वार पर खुदे शिलालेख में क्या लिखा है?
एक द्वार पर नागरी लिपि में विक्रम संवत 1768 का जिक्र मिलता है, जिसे जानकार महल के पुनर्निर्माण या जीर्णोद्धार से जुड़ा मानते हैं।
मोती महल की वास्तुकला में क्या खास है?
इसकी पालकीनुमा छतों, सजे स्तंभों और झरोखों में राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली का अनोखा संगम दिखाई देता है।
महल के भीतर कौन-सी प्रतिमा स्थापित है?
महल के भीतर राता देवी की प्रतिमा स्थापित है, जो यहाँ की स्थानीय आस्था और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR