गहने तैयार करने के काम में जहां आज आधुनिक तकनीक और 3D प्रिंटिंग का दखल तेजी से बढ़ा है, वहीं तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में सदियों पुरानी पारंपरिक दस्तकारी अपनी खास जगह बनाए हुए है। चारमीनार, लाड बाजार, गुलजार हौज़ और सिकंदराबाद के पॉट मार्केट जैसे ऐतिहासिक व्यापारिक इलाकों में आज भी पीढ़ियों पुराना हाथ की नक्काशी और मीनाकारी का हुनर पूरी चमक के साथ जीवित है। मशीनी आभूषणों के इस दौर में भी कारीगरों की छेनी और कलम से निकलने वाली कला खरीदारों को आकर्षित कर रही है।
निज़ाम कालीन दस्तकारी और बारीक नक्काशी का केंद्र
हैदराबाद का इतिहास गवाह है कि निज़ामों के जमाने से ही यह शहर मोतियों, जड़ाऊ जेवरों और बारीक धातु शिल्प का एक बड़ा केंद्र रहा है। यहां के पुराने और अनुभवी कारीगर सोने-चांदी के मंगलसूत्र, लॉकेट, अंगूठियों के अलावा चांदी के पारंपरिक बर्तनों पर भी ग्राहकों की पसंद के मुताबिक हाथ से नाम और बेहद बारीक आकृतियां उकेरते हैं। यह काम सिर्फ धातु को काटना या तराशना नहीं है, बल्कि इसमें बेहद एकाग्रता और धैर्य की जरूरत होती है। कारीगर लोहे की बारीक छेनी और कलम की मदद से धातु की सतह पर हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और तेलुगू जैसी भाषाओं में नाम लिखते हैं। इसके साथ ही मोर, फूल-पत्तियों और अन्य पारंपरिक आकृतियों को खूबसूरती से आकार दिया जाता है।
भट्टी की आंच में पकने वाले मीनाकारी के चटक रंग
धातु पर नक्काशी के बाद जेवरों में रंगों की चमक भरने के लिए मीनाकारी कला का सहारा लिया जाता है। मुग़ल काल से चली आ रही इस जटिल तकनीक में धातु के अंदर बनाए गए खांचों में खास तरह के प्राकृतिक अथवा खनिज रंग भरे जाते हैं। इसके बाद आभूषण को विशेष भट्टी में तपाया जाता है, जिससे वे रंग हमेशा के लिए पक्के और चमकदार हो जाते हैं। आमतौर पर जयपुर और वाराणसी को मीनाकारी के प्रमुख केंद्रों के तौर पर जाना जाता है, लेकिन हैदराबाद में स्थानीय संस्कृति और दक्कनी डिज़ाइनों के अनोखे मेल ने यहां की मीनाकारी को अपनी एक अलग पहचान दी है।
मशीनी दौर में हाथ की कारीगरी की आत्मीयता
स्थानीय सर्राफा व्यापारियों का मानना है कि यद्यपि मशीनों की मदद से आभूषणों का निर्माण बहुत तेजी से हो जाता है, लेकिन हाथ की कारीगरी से मिलने वाली फिनिशिंग, गहराई और अपनापन मशीनों में हासिल नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि शादी-ब्याह और अन्य मांगलिक अवसरों पर लोग आज भी अपने खास गहनों पर कारीगरों के हाथों से नाम, संदेश और शुभ प्रतीक बनवाना अधिक पसंद करते हैं। वर्तमान समय में कई युवा कारीगर भी इस पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ाने के लिए आगे आए हैं और वे पारंपरिक शिल्प को आधुनिक डिज़ाइनों के साथ मिलाकर नया रूप दे रहे हैं।



















