उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में दीपावली का त्योहार समाप्त होने के तुरंत बाद एक बेहद अनोखा और पारंपरिक मेला आयोजित किया जाता है। मंदाकिनी नदी के तट पर लगने वाले इस गधों के मेले को देखने और इसमें हिस्सा लेने के लिए हजारों की संख्या में लोग दूर-दराज के इलाकों से पहुंचते हैं। इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि देश के विभिन्न कोनों से व्यापारी अपने गधों को लेकर यहां आते हैं और बड़े पैमाने पर इनका क्रय-विक्रय किया जाता है। बुंदेलखंड क्षेत्र में लगने वाला यह अपने आप में सबसे विशाल मेला माना जाता है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपरा का एक अनूठा हिस्सा बन चुका है।
औरंगजेब के शासनकाल से जुड़ा है इतिहास
स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक जानकारियों के अनुसार, यह अनूठा मेला लगभग 1670 ईसवी से निरंतर आयोजित होता आ रहा है जब चित्रकूट क्षेत्र में औरंगजेब का शासन था। उस विशिष्ट दौर में एक भयंकर बीमारी फैल गई थी जिसके कारण मुगल शासक औरंगजेब की सेना के घोड़े और खच्चर लगातार मरने लगे थे। अपनी सेना की इस बड़ी कमी को पूरा करने और परिवहन व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए औरंगजेब ने यहां गधों की खरीद-बिक्री शुरू करने का विशेष आदेश दिया था। तभी से यह परंपरा लगातार चली आ रही है और आज भी हर साल दीवाली के ठीक अगले दिन इस मेले का आयोजन पूरी भव्यता के साथ किया जाता है।
फिल्मी सितारों के नाम पर होती है भारी बोलियां
इस मेले का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू गधों के नामकरण और उनकी बिकने वाली कीमतें हैं। मंदाकिनी तट पर सजने वाले इस बाजार में गधों की बोलियां मशहूर फिल्मी सितारों के नामों पर लगाई जाती हैं। व्यापारी अपने इन मूक जानवरों के नाम बॉलीवुड हस्तियों के आधार पर रखते हैं और इनकी कीमत महज हजारों में नहीं बल्कि लाखों रुपये तक पहुंच जाती है। चित्रकूट के वरिष्ठ स्थानीय निवासी सत्य प्रकाश द्विवेदी के अनुसार, यह अनूठा मेला दीपावली के ठीक दूसरे दिन से शुरू होकर मंदाकिनी तट के किनारे लगभग दो से तीन दिनों तक लगातार चलता है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए आसपास के जिलों से भी भारी भीड़ उमड़ती है।
मेले का स्वरूप और लोगों का उत्साह
बुंदेलखंड के इस सबसे बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक आयोजन को देखने के लिए चित्रकूट और उसके आस-पास के ग्रामीण तथा शहरी इलाकों से बड़ी संख्या में दर्शक मेला परिसर में पहुंचते हैं। लोग यहां लाए जाने वाले अलग-अलग नस्लों और प्रकार के गधों को बेहद उत्सुकता के साथ देखते हैं। हालांकि समय बदल चुका है और तकनीक का दौर आ गया है, लेकिन सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ कायम है और हर साल दीवाली के बाद लोगों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी रहती है।



















