उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद अंतर्गत मधुबन क्षेत्र के शिवपाती ग्राम सभा में स्थित एक शिव धाम श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस पवित्र स्थान का इतिहास करीब दो दशक पुराना है, जिसकी शुरुआत साल 2001 में छठ पर्व के अवसर पर हुए एक असाधारण बालक के जन्म से जुड़ी हुई है। स्थानीय स्तर पर इस स्थल को भगवान शिव की अलौकिक उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है और यहां दूर-दराज से भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं।
जन्म के समय घर में दिखे थे असाधारण लक्षण
मंदिर के पुजारी अरविंद पांडेय के अनुसार, साल 2001 में छठ के पावन दिन गांव के निवासी निरहू ठठेरा के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था। स्थानीय लोकमान्यता बताती है कि शिशु के जन्म लेते ही पूरे घर के भीतर एक चमत्कारी प्रकाश फैल गया था। नवजात के चेहरे पर अत्यंत तीव्र आभा थी और उसके माथे पर भगवान शिव की तीसरी आंख से मिलता-जुलता एक स्पष्ट निशान बना हुआ था। इसके अलावा उसके सिर पर जन्मजात बड़ी-बड़ी जटाएं मौजूद थीं। चेहरे के तेज का प्रभाव ऐसा बताया जाता था कि कोई भी व्यक्ति उसकी ओर लगातार ज्यादा देर तक आंखें टिकाकर देख पाने में असमर्थ था। इन्हीं विशिष्ट शारीरिक लक्षणों को देखकर परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों के मन में यह विश्वास गहरा गया कि बालक साक्षात भगवान शंकर का ही कोई स्वरूप है।
बगीचे में 35 दिनों का ठहराव और समाधि निर्माण
पुजारी अरविंद पांडेय बताते हैं कि नवजात की इन हैरान करने वाली विशेषताओं को देखकर परिवार के सदस्य अत्यधिक भयभीत हो गए थे और वे घबराहट में अपने घर को छोड़कर बाहर निकल आए। इसके पश्चात गांव के कुछ साहसी लोगों ने उस नवजात को संभाला और उसे पास के एक बगीचे में सुरक्षित पहुंचा दिया। जनश्रुति और स्थानीय मान्यता के अनुसार, वह बालक बगीचे में पूरे 35 दिनों तक बिना किसी हलचल के एक जैसी स्थिर अवस्था में मौजूद रहा। इसके बाद उसी बगीचे के स्थान पर उस बालक की समाधि निर्मित कर दी गई, जिसके प्रति ग्रामीणों की श्रद्धा उमड़ पड़ी और लोग वहां नियमित पूजा-अर्चना करने लगे।
साल 2002 में पूर्ण हुआ था मंदिर निर्माण
बालक के समाधि स्थल पर ही कालांतर में एक भव्य मंदिर की आधारशिला रखी गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस स्थल पर मंदिर की स्थापना की प्रक्रिया साल 2001 में ही आरंभ हो गई थी। इसके उपरांत समाधि स्थल के ठीक पास एक पवित्र शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई और संपूर्ण मंदिर निर्माण कार्य साल 2002 में पूर्ण हो गया। वर्तमान समय में इस पावन परिसर में आने वाले श्रद्धालु बालक के समाधि स्थल को नमन करने के साथ-साथ भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग का जलाभिषेक और पूजन करते हैं।
दूर-दराज से उमड़ते हैं श्रद्धालु, महाशिवरात्रि पर लगता है मेला
स्थानीय निवासी पवन पांडेय और मंदिर के पुजारी का कहना है कि यह धार्मिक स्थल भक्तों के बीच अत्यधिक चमत्कारी माना जाता है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि यहां सच्ची प्रार्थना से विभिन्न प्रकार की व्याधियां और संकट कट जाते हैं। लोकचर्चा में ऐसी घटनाएं शामिल हैं जहां लोगों की आंखों की खोई रोशनी वापस आ गई अथवा सांप के डसने के बाद मंदिर लाए गए व्यक्ति की पूजा के प्रभाव से स्थिति में सुधार हुआ। इसी आस्था के चलते मऊ के स्थानीय भक्तों के अतिरिक्त राजस्थान, दिल्ली तथा मुंबई जैसे महानगरों से भी बड़ी तादाद में लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर्व पर यहां विशाल जनसैलाब उमड़ता है और मंदिर प्रांगण में हर वर्ष एक मेले का आयोजन होता है, जिसमें आसपास के कई जिलों के लोग सहभागिता करते हैं।



















