गूगल के नए प्लेग्राउंड टूल से बिना कोडिंग मिनटों में गेम तैयार, लेकिन एआई का दोहराव बना सिरदर्ददिल्ली से चेन्नई जा रही इंडिगो की फ्लाइट में गैजेट से उठा धुआं, हैदराबाद में हुई सुरक्षित लैंडिंगचेन्नई में 13 हजार करोड़ की सौगात के बीच सीएम विजय ने पीएम नरेंद्र मोदी के सामने रखीं 6 बड़ी मांगेंशादी की खरीदारी से लेकर स्ट्रीट फूड तक, रांची का यह बहुमंजिला बाजार बना परिवारों की पहली पसंदबस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत: कांटों के झूले पर देवी स्वरूप कन्या से राजपरिवार ने मांगी अनुमतित्योहारी सीजन की शुरुआत में ऑनलाइन शॉपिंग का नया रिकॉर्ड, पहले 48 घंटों में हुई 24,000 करोड़ रुपये की धमाकेदार बिक्रीदुर्गा पूजा में सिल्क साड़ियों की तलाश: भागलपुर के प्रमुख बुनकर बाजारों में 4 हजार रुपये से शुरू हैं बेहतरीन विकल्पराजस्थान के बूंदी जिला अस्पताल में सफाईकर्मियों का कार्य बहिष्कार, बकाया मानदेय को लेकर मुख्य द्वार पर प्रदर्शनपैदल चलकर चर्बी घटाने का सही गणित और रोजाना कदमों का व्यावहारिक लक्ष्यखराब आबोहवा और पाचन तंत्र के ट्यूमर के बीच संबंध की पड़ताल में जुटे ऑन्कोलॉजिस्ट, बच्चों में बढ़ते मामलों ने बढ़ाई चिंता
भीलवाड़ा की आरके कॉलोनी में धार्मिक सौहार्द की अनोखी पहल, अभ्रक और रेशम से तैयार राखियां गांव-गांव पहुंचा रहे हैं चांद मोहम्मदकल्चर
22 अग॰ 2026, 6:47 am (51 दिन पहले)· 1

भीलवाड़ा की आरके कॉलोनी में धार्मिक सौहार्द की अनोखी पहल, अभ्रक और रेशम से तैयार राखियां गांव-गांव पहुंचा रहे हैं चांद मोहम्मद

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की आरके कॉलोनी में रहने वाले चांद मोहम्मद और उनका परिवार पिछले 50 से 60 सालों से अभ्रक और रेशम के धागों से पारंपरिक राखियां बना रहा है। तीन पीढ़ियों से चली आ रही इस कला के जरिए वे एक दर्जन से ज्यादा ग्रामीण इलाकों में हिंदू बहनों तक रक्षाबंधन का संदेश और श्रवण कुमार का चित्र पहुंचाते हैं।

राजस्थान के भीलवाड़ा शहर की आरके कॉलोनी में रक्षाबंधन का त्योहार केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और आपसी सौहार्द की एक नई मिसाल पेश करता है। यहां रहने वाले चांद मोहम्मद और उनका परिवार पिछले 50 से 60 वर्षों से लगातार पारंपरिक अभ्रक की राखियां बनाने के काम में जुटा हुआ है। रक्षाबंधन के पावन अवसर से कई महीने पहले ही इस परिवार में राखी बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। चांद मोहम्मद अपनी पत्नी के साथ मिलकर दिन-रात मेहनत करते हैं और त्योहार के दिन तक राखियों को अंतिम रूप देते रहते हैं। तीन पीढ़ियों से चला आ रहा यह सिलसिला आज भी उसी समर्पण और आत्मीयता के साथ कायम है।

तीन पीढ़ियों से संजोई गई पारंपरिक कला और मेहनत

चांद मोहम्मद के अनुसार, उनके परिवार में भोड़ल यानी अभ्रक की राखियां बनाने का काम लगभग तीन पीढ़ियों से निरंतर चला आ रहा है। यह कला उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिली थी। उनके माता-पिता भी इसी पारंपरिक तरीके से राखियां तैयार किया करते थे, जिसे चांद मोहम्मद और उनकी पत्नी ने बीते पांच से छह दशकों में पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया है। यह केवल एक व्यापार नहीं है, बल्कि दशकों पुरानी हस्तकला की उस विरासत को सहेजने का प्रयास है जो आधुनिकता के दौर में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।

ये भी पढ़ें

इस विशेष प्रकार की राखी को तैयार करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और मेहनत भरी होती है। सबसे पहले कच्चे अभ्रक और रेशम के धागे की व्यवस्था की जाती है। इसके बाद अभ्रक के टुकड़ों को बारीक तोड़कर लगातार पीटा जाता है। इसे तब तक पीटा जाता है जब तक कि यह कागज से भी पतला और कांच की तरह पारदर्शी न दिखने लगे। जब अभ्रक पूरी तरह से कांच जैसा चमकने लगता है, तब उसे सावधानीपूर्वक तराशकर सुंदर राखी का आकार दिया जाता है। अंत में इसे रंग-बिरंगे रेशम के धागों में पिरोकर तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अत्यधिक धैर्य और बारीक कारीगरी की आवश्यकता होती है।

एक दर्जन से अधिक गांवों में घर-घर बांटते हैं खुशियां

राखियां तैयार होने के बाद चांद मोहम्मद इन्हें बेचने के लिए बाजार में दुकान नहीं लगाते, बल्कि खुद भीलवाड़ा जिले के एक दर्जन से भी अधिक ग्रामीण इलाकों में घर-घर जाते हैं। वे दूर-दराज के गांवों में पहुंचकर हिंदू परिवारों की बहनों को खुद अपने हाथों से यह राखी भेंट करते हैं। राखी के साथ-साथ वे प्रत्येक परिवार को श्रवण कुमार का एक चित्र भी प्रदान करते हैं। यह परंपरा वे पिछले कई दशकों से बिना किसी बाधा के निभाते आ रहे हैं।

इस पूरी पहल का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि चांद मोहम्मद का यह काम केवल आर्थिक लाभ कमाने का साधन नहीं है। वे इस सेवा को लोगों के साथ जुड़े पुराने आत्मीय रिश्तों का एक अहम हिस्सा मानते हैं। जब वे ग्रामीण घरों में राखी पहुंचाने जाते हैं, तो जो परिवार अपनी इच्छा से पैसे देता है, उसे वे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। वहीं दूसरी ओर, जिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पास पैसे देने की क्षमता नहीं होती, उनसे वे पैसों के बदले गेहूं या अन्य अनाज स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार बिना किसी आर्थिक या सामाजिक भेदभाव के हर घर तक राखी पहुंचाने की यह अनूठी परंपरा वर्षों से निरंतर चल रही है।

मजहब से परे रिश्तों और प्रेम का अटूट संदेश

चांद मोहम्मद का मानना है कि राखी महज एक रेशमी धागा या सजावटी वस्तु नहीं है, बल्कि यह इंसानी रिश्तों, प्रेम और भावनाओं को आपस में जोड़ने का एक पवित्र माध्यम है। वे कहते हैं कि राखियों का निर्माण करते समय उनके मन में केवल प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का विचार रहता है। इसी भावना के कारण वे वर्षों से बिना किसी संकोच के हिंदू परिवारों के बीच जाते हैं और त्योहार की खुशियां बांटते हैं।

धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देने वाली चांद मोहम्मद के परिवार की यह कहानी भीलवाड़ा में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का एक जीवंत प्रतीक बन चुकी है। तीन पीढ़ियों से चली आ रही इस कला और परंपरा ने यह साबित कर दिया है कि जब रिश्तों में मिठास और नियत में सच्चाई हो, तो धार्मिक भिन्नताएं कभी आड़े नहीं आतीं।

सवाल-जवाब

भीलवाड़ा में चांद मोहम्मद का परिवार कितने सालों से राखियां बना रहा है?
चांद मोहम्मद और उनकी पत्नी पिछले 50 से 60 वर्षों से अभ्रक की राखियां बना रहे हैं, और यह परंपरा उनके परिवार में तीन पीढ़ियों से चली आ रही है।
अभ्रक की राखी बनाने के लिए किन चीजों का इस्तेमाल होता है?
इस राखी को बनाने के लिए मुख्य रूप से अभ्रक (भोड़ल) और रेशम के धागे का उपयोग किया जाता है। अभ्रक को पीटकर कांच जैसा पतला और पारदर्शी बनाया जाता है।
चांद मोहम्मद ग्रामीण इलाकों में राखी के साथ कौन सा चित्र देते हैं?
वे भीलवाड़ा जिले के एक दर्जन से अधिक गांवों में जाकर राखी के साथ श्रवण कुमार का चित्र भी हिंदू परिवारों को देते हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से चांद मोहम्मद क्या स्वीकार करते हैं?
जिन परिवारों के पास पैसे देना संभव नहीं होता, चांद मोहम्मद उनसे पैसों के स्थान पर गेहूं या अन्य अनाज स्वीकार कर लेते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp