देश के अत्यधिक प्रदूषित शहरी इलाकों में सांस लेने वाली आबादी के पाचन तंत्र पर पर्यावरण का क्या असर हो रहा है, अब इस पर चिकित्सा जगत की निगाहें टिक गई हैं। ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल खानपान अथवा तंबाकू के सेवन को ही ट्यूमर का मुख्य कारक मानना अब पर्याप्त नहीं है। जहरीले सूक्ष्म कणों पीएम2.5 और सतही ओजोन के लंबे संपर्क तथा आंतरिक अंगों में गंभीर बीमारियों के उभरने के बीच संभावित कड़ियों को सुलझाने के लिए गहन और केंद्रित वैज्ञानिक पड़ताल की तुरंत आवश्यकता है।
किशोरों में पाचन तंत्र की गांठें मिलने से डॉक्टरों में चिंता
अस्पतालों के बाह्य रोगी विभागों में सामने आ रहे मामलों ने ऑन्कोलॉजिस्ट्स को हैरान कर दिया है। सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम अग्रवाल ने रेखांकित किया कि क्लीनिक में महज 15 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चे भी पाचन तंत्र के ट्यूमर की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। लगभग पांच वर्ष पहले इस उम्र के मरीजों में ऐसे गंभीर विकार बेहद दुर्लभ माने जाते थे। उनके अनुसार, यह बदलता ढर्रा इस बात की ताकीद करता है कि अब जांच का दायरा केवल व्यक्तिगत आदतों तक सीमित न रखकर मरीजों के व्यापक परिवेश तक फैलाया जाए।
चिकित्सा विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए अनुसंधान खराब आबोहवा और ट्यूमर के जोखिम के बीच सह-संबंध तो दर्शाते हैं, लेकिन यह ठोस रूप से साबित नहीं करते कि प्रदूषण ही सीधे तौर पर आंतों अथवा पेट के कैंसर की प्राथमिक वजह है। इसी प्रकार, युवाओं अथवा बच्चों में बढ़ रही इस बीमारी के पीछे केवल वातावरण की विषाक्तता को अकेला जिम्मेदार कारक नहीं ठहराया जा सकता।
सतही ओजोन और अनदेखे कणों की भूमिका पर केंद्रित नजर
वायु गुणवत्ता पर विमर्श के दौरान सामान्यतया पीएम2.5 तथा पीएम10 कणों की मात्रा पर ही सारा ध्यान केंद्रित रहता है। डॉ. श्याम अग्रवाल ने धरातल के निकट तैयार होने वाली ओजोन गैस के जैविक प्रभावों पर विशेष रूप से रोशनी डाली। वातावरण के निचले स्तर पर मौजूद ओजोन मानव कोशिकाओं और आंतरिक प्रणाली को किस प्रकार प्रभावित करती है, इसका वैज्ञानिक आकलन अभी काफी सीमित है।
विशेषज्ञों का मत है कि भारतीय परिस्थितियों और अत्यधिक प्रदूषित नगरों में रहने वाले नागरिकों पर इन वायुमंडलीय तत्वों के प्रभाव को जांचने के लिए स्वतंत्र और व्यवस्थित शोध परियोजनाएं शुरू की जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि विभिन्न प्रकार के कार्सिनोजेनिक कण शरीर के भीतरी अंगों में पहुंचकर किस सीमा तक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
द्विवार्षिक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में साझा हुआ वैश्विक अनुभव
इस गंभीर स्वास्थ्य संकट की पड़ताल के उद्देश्य से 10 और 11 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। सर गंगा राम अस्पताल और यूनाइटेड किंगडम के द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सत्र में कोलोरेक्टल और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल विकारों पर विस्तृत मंथन हुआ। संस्थान की ट्रस्ट सोसाइटी के प्रमुख डॉ. डीएस राणा ने रेखांकित किया कि वैश्विक साझेदारी जटिल व्याधियों की रोकथाम के लिए ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत बनाती है।
कार्यक्रम में शामिल सर्जिकल विशेषज्ञों ने कहा कि विभिन्न देशों के चिकित्सकों के अनुभवों से शीघ्र जांच, डायग्नोस्टिक सटीकता और आधुनिक उपचार प्रोटोकॉल तैयार करने में बड़ी मदद मिलती है। संयुक्त प्रयासों के जरिए ट्यूमर के आणविक और पर्यावरणीय कारणों की तह तक पहुंचना आसान हो जाता है।
बीमारी के बहुआयामी कारक और शीघ्र परामर्श का महत्व
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल विकारों के मूल कारणों को समझने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। सर गंगा राम अस्पताल के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सौमित्र रावत ने आगाह किया कि किसी एकल घटक पर दोष मढ़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। ट्यूमर के विकास में वंशानुगत प्रवृत्तियां, जेनेटिक म्यूटेशन, दैनिक आहार, शारीरिक गतिविधियां, क्रोनिक इन्फेक्शन और बाह्य परिवेशीय विषैले तत्व मिलकर भूमिका निभाते हैं।
डॉ. सौमित्र रावत ने जनसामान्य को सचेत किया कि पेट में लंबे समय से चली आ रही गड़बड़ी, पाचन की असामान्यताओं अथवा लगातार दिखने वाले संकेतों को हल्के में न लिया जाए। द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के सलाहकार कोलोरेक्टल एवं लैप्रोस्कोपिक सर्जन सेल्वसेकर चेल्लैया ने भी इस बात का समर्थन किया कि विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करने से उपचार के परिणाम सुधरते हैं और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभावों की वैज्ञानिक समझ गहरी होती है।


















