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बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत: कांटों के झूले पर देवी स्वरूप कन्या से राजपरिवार ने मांगी अनुमतिछत्तीसगढ़
11 अक्तू॰ 2026, 5:47 pm (21 मिनट पहले)· 0

बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत: कांटों के झूले पर देवी स्वरूप कन्या से राजपरिवार ने मांगी अनुमति

जगदलपुर के भंगाराम चौक पर ऐतिहासिक काछनगादी पूजा की रस्म पूरी हुई, जहां बेल के कांटों पर लेटी कन्या से अनुमति लेकर महापर्व का शुभारंभ हुआ।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐतिहासिक दशहरा महापर्व की विधिवत शुरुआत काछनगादी पूजा विधान के साथ संपन्न हो गई है। सदियों पुरानी इस अनूठी परंपरा के तहत बस्तर राजपरिवार ने बेल के तीखे कांटों से तैयार किए गए झूले पर लेटी एक कुंवारी कन्या से उत्सव के आयोजन की औपचारिक अनुमति प्राप्त की। इस पारंपरिक विधान के पूरा होते ही क्षेत्र में 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक दशहरा पर्व से जुड़े आगे के अनुष्ठानों का रास्ता साफ हो गया है।

भंगाराम चौक पर संपन्न हुआ काछनगादी विधान

यह धार्मिक अनुष्ठान बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर में स्थित भंगाराम चौक पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार आयोजित किया गया। इस वर्ष की रस्म 12 वर्षीय बालिका पीहू दास ने निभाई, जो बेल के नुकीले कांटों से बुने गए विशेष झूले पर लेटीं। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विशेष पूजा के दौरान बालिका पर काछन देवी स्वयं सवार होती हैं और पूरे क्षेत्र को निर्विघ्न पर्व मनाने का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

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पनका समुदाय की पारंपरिक भूमिका

काछनगादी की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में पनका समुदाय का केंद्रीय योगदान रहता है। समुदाय के प्रतिनिधि प्रेम सागर पनका ने स्पष्ट किया कि परंपरा के अनुसार समाज की ही एक कुंवारी बालिका के माध्यम से देवी से संवाद स्थापित किया जाता है। जब देवी का आह्वान स्वीकार हो जाता है और झूले से अनुमति मिल जाती है, तभी इस विशाल लोकपर्व की सभी औपचारिक कड़ियां आगे बढ़ाई जाती हैं।

पितृ पक्ष के अंतिम दिन रेला माता की पूजा

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने इस पूजा के आध्यात्मिक पहलू को रेखांकित करते हुए बताया कि यह दशहरा उत्सव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। पितृ पक्ष के आखिरी दिन यह अर्चना विशेष रूप से रेला माता को पितृ स्वरूप मानकर की जाती है। काछन देवी और रेला माता की दैवीय स्वीकृति मिलने के बाद अब बस्तर राजपरिवार तथा इलाके के सभी पारंपरिक जमींदार मिलकर आगे के सभी धार्मिक कार्यक्रमों को संपन्न कराएंगे।

सवाल-जवाब

काछनगादी की रस्म बस्तर में कहां आयोजित की गई?
यह पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान बस्तर के जगदलपुर स्थित भंगाराम चौक पर संपन्न हुआ।
इस वर्ष काछनगादी रस्म किस कन्या ने निभाई?
इस साल यह रस्म 12 वर्षीय कुंवारी कन्या पीहू दास ने बेल के कांटों से बने झूले पर लेटकर पूरी की।
इस विधान में किस समाज की मुख्य भूमिका रहती है?
काछनगादी विधान में पनका समाज की प्रमुख भूमिका होती है, जिसकी कुंवारी कन्या पर देवी सवार होने की मान्यता है।
काछनगादी के दौरान किस देवी की पूजा की जाती है?
इस दौरान काछन देवी के साथ-साथ पितृ स्वरूप में रेला माता की पूजा-अर्चना की जाती है।
काछनगादी पूजा का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
इसका मुख्य उद्देश्य बस्तर राजपरिवार द्वारा दशहरा महापर्व के सभी आयोजनों को शुरू करने के लिए देवी से अनुमति प्राप्त करना होता है।
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