आज के आधुनिक और व्यस्त युग में पर्सनल केयर और सौंदर्य प्रसाधनों की दुनिया में शैंपू हमारे जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुपरमार्केट की सजी हुई अलमारियों में सैकड़ों तरह के अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स को देखकर हम अक्सर यह मान बैठते हैं कि बालों को साफ करने वाला यह उत्पाद किसी पश्चिमी देश या किसी विदेशी वैज्ञानिक की आधुनिक प्रयोगशाला की खोज है। हालांकि, यदि हम इतिहास के सुनहरे पन्नों को पलटें और समय की धारा में थोड़ा पीछे जाएं, तो एक ऐसा विस्मयकारी सच सामने आता है जो हर भारतीय, विशेष रूप से बिहार के निवासियों को असीम गौरव से भर देगा। बालों को धोने, उनकी देखभाल करने और सिर की मालिश करने की इस अद्भुत थेरेपी को पूरी दुनिया के सामने पेश करने वाला कोई पश्चिमी वैज्ञानिक नहीं था, बल्कि बिहार की ऐतिहासिक भूमि पर जनमा एक बेहद प्रतिभाशाली और असाधारण भारतीय था।
पटना में जन्म और औषधियों की पारिवारिक विरासत
इस अद्भुत और प्रेरणादायक गाथा के मुख्य नायक थे शेख दीन मुहम्मद, जिनका जन्म साल 1759 में बिहार के ऐतिहासिक शहर पटना में हुआ था। दीन मुहम्मद का परिवार कोई साधारण परिवार नहीं था, बल्कि उनके पूर्वजों को मुगल काल से ही पारंपरिक औषधियों, दुर्लभ जड़ी-बूटियों, सुगंधित प्राकृतिक तेलों और रासायनिक विधाओं का असाधारण ज्ञान प्राप्त था। वे प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियों और प्राकृतिक उपचारों में पूरी तरह निपुण थे। जब दीन मुहम्मद महज 10 या 11 वर्ष के थे, तभी उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। इस कठिन समय में जीवन को एक नई दिशा देने के लिए उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में नौकरी कर ली।
सेना की इस नौकरी ने उनके जीवन को एक बड़ा मोड़ दिया। इस सेवा के दौरान उन्होंने न केवल अंग्रेजी भाषा पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई, बल्कि भारत के विभिन्न कोनों और क्षेत्रों की यात्रा करने का अवसर भी प्राप्त किया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की पारंपरिक चिकित्सा शैलियों, जड़ी-बूटियों के प्रयोग और स्थानीय मालिश तकनीकों को बहुत करीब से देखा और सीखा। साल 1782 में, उनके जीवन में एक और बड़ा बदलाव आया जब वे अपने एक बेहद करीबी अंग्रेज मित्र कैप्टन गॉडफ्रे इवान बेकर के साथ भारत को छोड़कर हमेशा के लिए इंग्लैंड चले गए। यही वह ऐतिहासिक यात्रा थी जिसने आगे चलकर दुनिया में हेयर केयर के इतिहास की रूपरेखा को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
इंग्लैंड में पर्सनल हाइजीन की खराब स्थिति और चंपी का प्रवेश
जब शेख दीन मुहम्मद इंग्लैंड पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि वहां की जीवनशैली और स्वच्छता की स्थिति भारत से बिल्कुल अलग थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों और उस दौर के सामाजिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, 19वीं सदी की शुरुआत में इंग्लैंड के लोग शारीरिक स्वच्छता और स्नान को लेकर बहुत अधिक जागरूक नहीं थे। लोग हफ्तों और कभी-कभी महीनों तक ठीक से स्नान नहीं करते थे। बालों की देखभाल और व्यक्तिगत स्वच्छता की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। दीन मुहम्मद ने इस बड़ी कमी और सामाजिक आवश्यकता को तुरंत पहचान लिया। उन्होंने महसूस किया कि भारत की सदियों पुरानी स्नान, स्वच्छता और मालिश की समृद्ध परंपरा को पश्चिमी दुनिया के सामने पेश करने का यह सबसे सही समय है।
इसी विचार के साथ, साल 1814 में वे इंग्लैंड के एक बेहद मशहूर तटीय शहर ब्राइटन पहुंचे। यहां उन्होंने ब्रिटेन का सबसे पहला व्यावसायिक मसाज बाथ खोला, जिसे उन्होंने महामेद्स इंडियन वेपर बाथ का नाम दिया। उस दौर के ऐतिहासिक विज्ञापनों और ब्रोशरों के अनुसार, दीन मुहम्मद इस बाथ हाउस में विशेष औषधीय जड़ी-बूटियों की भाप और अत्यंत सुगंधित तेलों की मदद से लोगों के सिर की मालिश करते थे। भारत में प्राचीन काल से सिर की इस आरामदायक मालिश की प्रक्रिया को चंपी कहा जाता था। अंग्रेजों के लिए गर्म भाप और तेल की मालिश का यह अनुभव बिल्कुल नया, अनोखा और बेहद तनावमुक्त करने वाला था। यह चंपी शब्द ही अंग्रेजों की जुबान पर चढ़कर धीरे-धीरे शैंपूइंग बन गया और समय के साथ इसका रूप छोटा होकर आज का आधुनिक शब्द शैंपू बन गया।
शाही दरबार तक पहुंची धूम और राजा के पर्सनल शैंपू सर्जन बने
दीन मुहम्मद की इस अनोखी प्राकृतिक थेरेपी और हर्बल उपचार की लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी कि इसकी चर्चा साधारण गलियों से निकलकर सीधे ब्रिटेन के राजघराने तक पहुंच गई। ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि इंग्लैंड के तत्कालीन राजा जॉर्ज चतुर्थ और उनके बाद गद्दी पर बैठे विलियम चतुर्थ इस भारतीय चंपी थेरेपी के इस कदर दीवाने हो गए कि उन्होंने शेख दीन मुहम्मद को शाही घराने का आधिकारिक और व्यक्तिगत शैंपू सर्जन नियुक्त कर दिया। उस दौर के प्रमुख ब्रिटिश समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में दीन मुहम्मद के इस लाजवाब ट्रीटमेंट और उनकी थेरेपी से गंभीर बीमारियों व तनाव से राहत पाने वाले मरीजों के प्रशंसापत्र प्रमुखता से छापे जाते थे। उनका यह औषधीय स्नान केंद्र उस समय के ब्रिटिश कुलीन वर्ग के लिए सबसे पसंदीदा स्थान बन चुका था।
साहित्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान
शेख दीन मुहम्मद केवल एक उत्कृष्ट थेरेपिस्ट, उद्यमी या आविष्कारक ही नहीं थे, बल्कि वे एक बहुत ही कुशाग्र लेखक और बुद्धिजीवी भी थे। साल 1794 में उन्होंने अपनी खुद की आत्मकथा लिखी और उसे प्रकाशित करवाया, जिसका शीर्षक था द ट्रेवल्स ऑफ डीन महोमेट। वैश्विक इतिहास में इस पुस्तक का एक बहुत ही विशेष और गौरवशाली स्थान है क्योंकि यह किसी भी भारतीय लेखक द्वारा अंग्रेजी भाषा में लिखी और प्रकाशित की गई सबसे पहली पुस्तक मानी जाती है। अपनी इस ऐतिहासिक किताब में उन्होंने बिहार में बिताए अपने बचपन के दिनों, भारत के समृद्ध सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, विविध सामाजिक ताने-बाने और इंग्लैंड में अपने शुरुआती संघर्षों व अनुभवों को अत्यंत जीवंत और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है।
गूगल और भारत सरकार द्वारा वैश्विक सम्मान
इतने युगांतरकारी आविष्कार और बहुमूल्य ऐतिहासिक योगदान के बावजूद, मुख्यधारा की इतिहास की किताबों में लंबे समय तक शेख दीन मुहम्मद को वह स्थान और श्रेय नहीं मिल सका, जो थॉमस एडिसन या अन्य पश्चिमी वैज्ञानिकों को आसानी से मिल गया। लेकिन हाल के वर्षों में दुनिया भर में उनके इस असाधारण और अनसुने योगदान को सामने लाने के लिए कई बड़े और सराहनीय प्रयास किए गए हैं।
इसी क्रम में, 15 जनवरी 2019 को दुनिया की सबसे बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनी गूगल ने शेख दीन मुहम्मद के सम्मान में एक विशेष गूगल डूडल समर्पित किया था। इस डूडल के माध्यम से वैश्विक स्तर पर लोगों को यह जानकारी दी गई कि आज पूरी दुनिया में जिस शैंपू का दैनिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है, उसकी वास्तविक नींव और संकल्पना बिहार के इसी महान सपूत ने रखी थी। इसके अलावा, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने भी देश के गुमनाम नायकों की सूची में शेख दीन मुहम्मद के अद्वितीय योगदान को बहुत ही प्रमुखता के साथ शामिल किया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की युवा पीढ़ी को अपने समृद्ध और गौरवशाली अतीत तथा प्राचीन विधाओं से परिचित कराना है ताकि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व महसूस कर सकें।











