आधुनिक दौर में बिजली और लाइटर के आ जाने के कारण माचिस का इस्तेमाल काफी कम हो गया है। हालांकि, अगर हम कुछ दशकों पीछे मुड़कर देखें, तो माचिस हर घर की बुनियादी जरूरत होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण वस्तु हुआ करती थी। उस समय लोग एक-दूसरे को उपहार के रूप में माचिस के डिब्बे भेंट किया करते थे और इसे बहुत संभालकर रखा जाता था। दिल्ली के बाली नगर के रहने वाले डॉ. आदित्य विज ने इसी पुराने इतिहास को सहेजने का बीड़ा उठाया है और उनके पास आज लगभग 120 साल पुराना माचिस के डिब्बों का विशाल संग्रह मौजूद है। उनके इस अनूठे कलेक्शन को देखने के लिए पर्यटक और इतिहास प्रेमी उनके घर आते हैं।
बचपन की शुरुआत और पिता की प्रेरणा
डॉ. आदित्य विज ने अपने इस अनूठे संग्रह की शुरुआत बहुत कम उम्र में ही कर दी थी। उन्होंने महज 8 साल की उम्र से माचिस के डिब्बों को इकट्ठा करना शुरू किया था। उनके पिता ने उन्हें इस अनोखे शौक को शुरू करने के लिए प्रेरित किया था। उनके पिता की कही गई बात पर अमल करते हुए उन्होंने एक-एक माचिस के डिब्बे को सहेजना शुरू किया और इसके लिए बकायदा फाइलें तैयार कीं। आज भी वह सभी फाइलें और डिब्बे उनके पास पूरी तरह सुरक्षित हैं। उनके इस जुनून का नतीजा यह है कि उनके पास लगभग 23 हजार माचिस के डिब्बों का भारी-भरकम जखीरा इकट्ठा हो चुका है।
120 साल पुराना इतिहास और बाजार की यादें
डॉक्टर विज के पास मौजूद यह कलेक्शन करीब 120 साल पुराना है, जिसका मतलब है कि पिछले एक सदी से भी अधिक समय में बाजार में जितने भी तरह के माचिस के डिब्बे आए, वे सभी उनके पास मौजूद हैं। उन्होंने उन डिब्बों को भी संभालकर रखा है जो 60 से 70 साल पहले बाजार में तोहफे के तौर पर बिकते थे और जिनकी कीमत उस समय 10 से 20 रुपए के आसपास हुआ करती थी। उनके जानने वाले और रिश्तेदार आज भी इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं। उनके घर आने वाले मेहमान कभी खाली हाथ नहीं आते, बल्कि मिठाई के डिब्बे की जगह उनके लिए माचिस के नए डिब्बे लेकर आते हैं क्योंकि सभी को पता है कि उन्हें यह संग्रह बढ़ाने का कितना शौक है।
बिजली न होने के दिनों की जरूरत
आज से करीब 50 से 70 साल पहले के समय को याद करते हुए डॉक्टर विज बताते हैं कि उस दौर में दिल्ली जैसे महानगर में भी बिजली की भारी किल्लत हुआ करती थी। ऐसे में जब देश की राजधानी का यह हाल था, तो देश के अन्य राज्यों और दूर-दराज के गांवों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यही मुख्य वजह थी कि उस दौर में माचिस इंसान की जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा हुआ करती थी। यात्रा के दौरान सफर तय करना हो, घर का चूल्हा जलाना हो, लालटेन रोशन करनी हो या फिर बच्चों को रात के वक्त लालटेन या मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई करनी हो, हर जगह माचिस की ही सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती थी।
तोहफे के रूप में माचिस देने की पुरानी परंपरा
पुराने जमाने में माचिस केवल आग जलाने का साधन नहीं थी, बल्कि आपसी रिश्तों को जोडने का एक जरिया भी हुआ करती थी। उस वक्त एक बड़े बॉक्स के अंदर करीब 5 या 10 छोटे माचिस के डिब्बे हुआ करते थे। जब लोग एक-दूसरे के घर मिलने जाते थे, तो मिठाई की जगह माचिस का बॉक्स भेंट करना एक आम परंपरा थी। उस दौर में उपहार के रूप में माचिस का डिब्बा पाना लोगों के लिए बहुत बड़ी खुशी की बात होती थी। इसी पुरानी संस्कृति और इतिहास को जिंदा रखने के लिए उन्होंने पिछले 120 साल के इस बेजोड़ सफर को सहेज कर रखा है। उनके घर आने वाले लोग जब इस विशाल संग्रह को देखते हैं, तो वे या तो हैरान रह जाते हैं या फिर अपनी बचपन की सुनहरी यादों में खो जाते हैं।




















