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सिलिकॉन वैली के अहंकार को बेनकाब करने वाली पॉलिना बोरसुक कैसे हाशिए पर धकेल दी गईंकल्चर
25 सित॰ 2026, 7:06 pm (33 मिनट पहले)· 0

सिलिकॉन वैली के अहंकार को बेनकाब करने वाली पॉलिना बोरसुक कैसे हाशिए पर धकेल दी गईं

डॉट-कॉम बूम के दौर में टेक जगत के अंध-उत्साह और पुरुषवादी सोच पर सवाल उठाने वाली लेखिका पॉलिना बोरसुक दशकों तक गुमनामी झेलने के बाद अब एक दूरदर्शी आलोचक के रूप में पहचानी जा रही हैं।

कैलिफोर्निया के ओकलैंड के निकट एक बेसमेंट अपार्टमेंट में रहने वाली पॉलिना बोरसुक अपनी इस रिहायश को बर्फ की एक अलग-थलग चौकी मानती हैं, जहां ठंड, रंगहीनता और तन्हाई का डेरा रहता है। कभी प्रमुख पत्रिकाओं में अपनी तीखी कलम से हलचल मचाने वाली बोरसुक ने यह जगह किसी शौक से नहीं चुनी थी। जब स्टोरेज का किराया देने के साधन खत्म हो गए तो उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी और सामान खो दिया। अपनी शारीरिक और स्वास्थ्य संबंधी लाचारियों के अनुकूल जो सबसे किफायती ठिकाना वह जुटा पाईं, वह यही बेसमेंट था। दशकों तक मुफलिसी, बीमारियों और बेघरों जैसी हालत में जीने के बाद हाल ही में उनका जीवन एक अप्रत्याशित मोड़ पर पहुंचा, जब प्रकाशकों के बीच उनकी पुरानी किताब को दोबारा छापने की होड़ मच गई। पच्चीस साल पहले तकनीकी दुनिया के खोखलेपन को उजागर करने वाली यह लेखिका आज भी हैरान हैं कि जिस काम के कारण उनका पूरा करियर तबाह हो गया, वही काम आज उन्हें एक भविष्यवक्ता का दर्जा दिला रहा है।

डॉट-कॉम दौर की चेतावनी और एक किताब की अनसुनी दास्तान

साल 2000 में जब पूरी दुनिया इंटरनेट क्रांति के नशे में डूबी हुई थी, तब पॉलिना बोरसुक ने टेक उद्योग के भीतरी तंत्र पर एक बेबाक किताब पेश की थी जिसका शीर्षक साइबरसेल्फिश था। इस किताब का उपशीर्षक हाई-टेक जगत की बेहद लिबर्टेरियन संस्कृति पर सीधा प्रहार करता था। जिस दौर में तकनीकी दुनिया खुद को मानवता का मसीहा मान बैठी थी, बोरसुक ने उसके भीतर महिलाओं के प्रति दुर्भावना, सामाजिक सरोकारों से कटने की सनक और एक अजीबोगरीब क्रूर आत्ममुग्धता की पहचान कर ली थी। यह किताब ऐसे वक्त में आई जब उद्योग में सवाल पूछने वालों को बेवकूफ समझा जाता था। समीक्षकों ने इसे सराहा भी, हालांकि कुछ लोग इसकी तल्ख सच्चाई को पचा नहीं पाए। हार्डकवर में इसकी करीब 5,000 प्रतियां बिकीं और पेपरबैक में लगभग 2,000 प्रतियां बिकीं, जो उस वक्त के लिहाज से एक सम्मानजनक संख्या थी।

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लेकिन इस किताब के छपते ही बोरसुक की दुनिया अचानक थम गई। संपादकों ने उनके फोन उठाने बंद कर दिए। न तो उन्हें कोई दूसरी फेलोशिप मिली, न किताबों के नए करार और न ही टीवी चैनलों पर टेक विश्लेषक के तौर पर बुलावे। जो लेखिका कल तक चर्चा के केंद्र में थी, उसे काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया। स्वास्थ्य की पुरानी परेशानियों ने और विकराल रूप ले लिया और वह दूसरों के घरों में रहने को मजबूर हो गईं। एक वक्त ऐसा आया जब उनके पास कुछ नहीं बचा, जैसे किसी भयानक आग में सब कुछ जलकर राख हो जाता है। वह दोस्तों की मदद और ऑनलाइन चंदे के सहारे किसी तरह गुजारा करने लगीं। उन्होंने अपनी इस किताब को एक अभिशाप मानना शुरू कर दिया था जिसने उनकी पूरी जिंदगी को पटरी से उतार दिया था।

गुमनामी से दोबारा चर्चा के केंद्र में वापसी

दिसंबर के महीने में बोरसुक की जिंदगी में एक ऐसा पुनर्जन्म शुरू हुआ जिसकी उन्हें कतई उम्मीद नहीं थी। सोशल मीडिया पर एक नई लहर उठी, जहां टेक समीक्षकों ने उनकी पुरानी किताब को खोज निकाला और इसे इस बात का पुख्ता सबूत माना कि पच्चीस साल पहले भी किसी ने टेक उद्योग के खतरनाक भविष्य को देख लिया था। द नर्ड राइच के गिल डूरान ने एक चर्चित पोस्ट में लिखा कि जो लोग नाव छूट जाने के बाद भी हकीकत को नहीं समझ सके, उन्हें तवज्जो देने के बजाय पॉलिना बोरसुक के काम को सामने लाना चाहिए, जिन्होंने ढाई दशक पहले ही सबको आगाह करने की कोशिश की थी। यह टिप्पणी 2025 में स्टीवन लेवी के एक लेख के संदर्भ में आई थी और देखते ही देखते चर्चा का विषय बन गई।

बोरसुक को अचानक एक ऐसी पैगंबर मान लिया गया जिसकी कद्र उसके अपने समय में नहीं हुई थी। इंटरनेट पर बेलगाम मर्दानगी और पुरुषवादी गुटों के पनपने से बरसों पहले ही उन्होंने जरूरत से ज्यादा फुर्सत वाले आक्रामक युवाओं के मिजाज को दर्ज कर लिया था। उन्होंने उस वक्त लडाइट शब्द की गरिमा को बहाल किया जब टेक बिरादरी में इसका इस्तेमाल गाली की तरह होता था। इसके अलावा उन्होंने सैन हिल रोड के प्रभावशाली निवेशकों के उस खतरनाक नजरिए पर भी उंगली उठाई थी जो नस्ल सुधार जैसे संदेहास्पद विचारों के करीब दिखता था। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी उन पर एक विस्तृत प्रोफाइल प्रकाशित की, जिसमें उन्हें एक ऐसी साहसी लेखिका का खिताब दिया गया जिसने सिलिकॉन वैली की सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई थी।

किताब को दोबारा पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रकाशकों में होड़ मच गई। दिसंबर के उसी एक दिन पांच प्रकाशकों ने बोरसुक के एजेंट के पास अपने प्रस्ताव भेजे। आखिरकार यह करार टिन हाउस के साथ तय हुआ, जिसने सितंबर के मध्य में डूरान की प्रस्तावना के साथ साइबरसेल्फिश का एक नया संस्करण बाजार में उतारा। दशकों के वनवास और अनदेखी के बाद यह उनके लिए एक बड़ा संबल था, लेकिन उनके भीतर बैठा पुराना दर्द इतनी आसानी से मिटने वाला नहीं था।

तकनीक को इंसानी नजरिए से देखने की शुरुआती सीख

बोरसुक का करियर कैसे खत्म हुआ, यह समझने के लिए उनके उस शुरुआती सफर को देखना होगा जहां से उन्होंने मशीनों की दुनिया को समझना शुरू किया था। वियतनाम युद्ध के दौरान एक सैन्य ठेकेदार के लिए काम करने वाले सॉफ्टवेयर डेवलपर डिक पिक और उनके साथी डॉन नेल्सन ने लॉकहीड के शियेन लड़ाकू हेलीकॉप्टर के कलपुर्जों पर नजर रखने के लिए एक डेटाबेस ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किया था। उस प्रणाली को अनौपचारिक रूप से एक भद्दा और मजाकिया संक्षिप्त नाम दिया गया था, जो आगे चलकर पिक ऑपरेटिंग सिस्टम के नाम से जाना गया। रक्षा खर्च से उपजी कई तकनीकों की तरह यह भी वाणिज्यिक उपयोग में आई और अंततः मरीन काउंटी की एक छोटी कंपनी में बोरसुक के कंप्यूटर तक पहुंची।

उन्नीस सौ अस्सी के दशक की शुरुआत में बोरसुक कंस्ट्रक्शन इंफॉर्मेशन सिस्टम्स नाम की एक कंपनी में टेक्निकल राइटर थीं। वह बड़े आकार वाले पुराने मिनी कंप्यूटरों के सामने बैठकर सॉफ्टवेयर के कामकाज को सरल भाषा में दर्ज करती थीं। उस नौकरी ने उन्हें दो बेहद बुनियादी सबक सिखाए। पहला सबक यह था कि तकनीक कोई जादुई चमत्कार नहीं है बल्कि एक ढांचागत व्यवस्था है। दूसरा सबक यह था कि कंप्यूटर किसी दूसरे इंसान के दिमाग को समझने का एक जरिया है। कोई भी सॉफ्टवेयर असल में इंसान द्वारा गढ़ी गई एक कलाकृति है जिसमें निर्माता की सोच, उसकी प्राथमिकताएं और उसकी कमजोरियां साफ झलकती हैं। तकनीक उतनी ही अजीब और खामियों से भरी होती है जितने उसे बनाने वाले इंसान होते हैं।

यही मानवीय संवेदना आगे चलकर बोरसुक के पत्रकारिता लेखन की रीढ़ बनी। उन्होंने हमेशा मशीन के पीछे बैठे इंसान को देखने पर जोर दिया। वह टेक उद्योग के उस तबके से सख्त खफा थीं जो तकनीक से इंसानियत को पूरी तरह अलग कर देना चाहता था। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि टेक लिबर्टेरियन सोच असल में एक सामाजिक विकार को दर्शन का रूप देने जैसी है, जहां व्यक्ति समाज की जिम्मेदारियों से भागकर खुद को अलग-थलग कर लेना चाहता है।

बचपन का परिवेश और एक जानलेवा हादसा जिसने दिमाग बदल दिया

बोरसुक का पालन-पोषण पासाडेना में अंतरिक्ष अनुसंधान के उभार के दिनों में हुआ था। वहां के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी और कैलटेक में काम करने वाले वैज्ञानिक सरकार द्वारा वित्तपोषित अनुसंधान के माहौल में पले-बढ़े थे। इस वजह से बोरसुक बचपन से ही यह समझती थीं कि तकनीक का विकास किसी एक व्यक्ति का करिश्मा नहीं बल्कि समाज और सरकारी निवेश की सामूहिक देन है। सिलिकॉन वैली की इस भ्रांति से वह शुरू से ही मुक्त थीं कि तकनीक की ताकत खुद-ब-खुद पैदा होती है।

लेकिन उनकी निजी जिंदगी में एक ऐसा भयानक हादसा घटा जिसने उनकी सोचने और समझने की क्षमता को स्थायी रूप से बदल दिया। किशोरावस्था के दौरान उनकी ही एक सहेली ने उनके चेहरे पर गोली मार दी थी। बोरसुक का मानना है कि यह घटना अनजाने में हुई एक सोची-समझी हरकत जैसी थी, जो किशोर उम्र के जटिल भावनात्मक तनाव से उपजी थी। उस खौफनाक पल में भी उन्होंने कोई ड्रामा नहीं किया। वह रसोई में गईं, चेहरे के घाव पर ठंडा पानी डाला और अपनी सहेलियों से कहा कि पुलिस या ऑपरेटर को यह न लगे कि वे खतरनाक लड़कियां हैं बल्कि इसे एक दुर्घटना के रूप में पेश किया जाए। उन्होंने अपनी उस दोस्त के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होने दी और बाद में भी दोनों की दोस्ती बनी रही।

उस गोली के झटके ने बोरसुक के दिमाग पर गहरा असर डाला। उन्हें महसूस हुआ कि उनका दिमाग समय से पहले बूढ़ा हो गया। वह कई बार कैलकुलस में फेल हुईं और किसी भी जटिल या घने पाठ को समझने में उन्हें भारी दिक्कत होने लगी। कानूनी दस्तावेज या भूविज्ञान की किताबें उनके दिमाग से फिसल जाती थीं। इसके साथ ही उन्हें पर्यावरण संबंधी गंभीर संवेदनशीलता की बीमारी हो गई, जिसके चलते वह धातु की घड़ी तक नहीं पहन पाती थीं। उन्होंने यूसी बर्कले से साइकोलिंग्विस्टिक्स की डिग्री ली, लेकिन अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना उनके लिए हमेशा एक चुनौती बना रहा। वह अपनी बात कहने के बाद अक्सर सामने वाले से पूछती थीं कि क्या उनकी बात का कोई मतलब निकल रहा है।

तकनीकी लेखन से पत्रकारिता और पुरुषों के दबदबे का मुकाबला

दिमाग की इस उलझन को सुलझाने में टेक्निकल राइटिंग ने उनकी बड़ी मदद की। बोरसुक के मुताबिक यह किसी कमजोर मांसपेशी को कसरत के जरिए दोबारा मजबूत करने जैसा था। तकनीकी लेखन की सख्त और स्पष्ट भाषा ने उनके दिमाग को संवारा और उन्हें आम पाठकों के लिए लिखना सिखाया। इसके बाद वह डेटा कम्युनिकेशंस पत्रिका में नए उत्पादों की संपादक बनीं, जहां उनकी मुलाकात केटी हाफनर से हुई। हाफनर उनकी तीखी समझ, बेबाकी और ईमानदार नजरिए की कायल हो गईं। बोरसुक किसी भी बनावटी शिष्टाचार में यकीन नहीं रखती थीं और हर मुद्दे पर उनकी अपनी एक मजबूत राय होती थी।

उन्नीस सौ नब्बे के दशक में टेक पत्रकारिता में तेजी से बदलाव आया। तकनीकी क्षेत्र पर पूरी तरह पुरुषों का कब्जा हो चुका था, जबकि शुरुआती दौर में कंप्यूटर संचालन काफी हद तक महिलाओं का क्षेत्र माना जाता था। 1996 में सील प्रेस ने वायर्ड विमेन नाम से एक महत्वपूर्ण संकलन प्रकाशित किया, जिसकी सह-संपादक एलिजाबेथ रेबा वीज थीं। इस संकलन में बोरसुक सहित कई महिला लेखिकाओं ने बताया कि महिलाओं के लिए तकनीक और कंप्यूटर सिर्फ एक औजार हैं, जिनका मकसद संवाद और रिश्तों को जोड़ना है, जबकि पुरुषों के लिए यह पूजा की वस्तु बन चुके थे। बोरसुक ने उस वक्त की प्रमुख टेक पत्रिकाओं का विश्लेषण करके दिखाया कि जून 1995 तक केवल पंद्रह प्रतिशत लेख महिलाओं पर केंद्रित थे और पच्चीस में से सिर्फ एक कवर पर किसी महिला को जगह मिली थी। इतना ही नहीं, लिखने वालों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी महज पंद्रह प्रतिशत थी।

बोरसुक ने खुद उस प्रमुख टेक पत्रिका के लिए शुरुआत से ही लिखना शुरू किया था। उन्होंने लुई रोसेटो को अपनी एक प्रेम कहानी भेजी थी जो ईमेल पर आधारित थी। यह कहानी छपने के बाद उन्हें एस्थर डायसन और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलन जैसी हस्तियों के बड़े प्रोफाइल लिखने का जिम्मा मिला। उन्होंने एलन का हुलिया एक विशाल और सौम्य समुद्री जीव जैसा बताया था, जिस पर एलन नाराज भी हुए थे। लेकिन बोरसुक कभी भी उस पत्रिका के पुरुष-प्रधान तंत्र में खुद को सहज नहीं पाती थीं। उन्होंने पाया कि वहां सिर्फ ताकतवर पुरुषों की जी-हजूरी करने वालों की कद्र थी। संस्थापक कार्यकारी संपादक केविन केली के साथ भी डायसन के प्रोफाइल को लेकर उनका विवाद हुआ था, क्योंकि बोरसुक उस व्यवस्था के भीतर लैंगिक भेदभाव को दर्ज करना चाहती थीं जिसे संपादक गैर-जरूरी मानते थे।

क्या बोरसुक को ब्लैकलिस्ट किया गया था?

जब साल 2000 में साइबरसेल्फिश किताब आई, तो सिलिकॉन वैली के कई दिग्गजों को यह नागवार गुजरी। फ्रेड टर्नर जैसे विचारकों ने इसे वामपंथी नजरिए से तकनीक की दुनिया की पहली गंभीर और मुकम्मल आलोचना माना, जिसने कंपनियों के मुनाफाखोरी और बाजार पर कब्जा जमाने के खेल को बेनकाब किया था। लेकिन पत्रिका से जुड़े जॉन बटेल जैसे लोगों को लगा कि यह आलोचना सतही थी, वहीं कई साथी पत्रकारों ने इसमें खोजी रिपोर्टिंग की कमी की शिकायत की। सच यह था कि बोरसुक ने संस्कृति और सोच पर चोट की थी, जिसे उस दौर के मदहोश माहौल में खारिज करना आसान समझा गया।

किताब के बाद बोरसुक का काम पूरी तरह छिन गया। क्या उन्हें वास्तव में किसी गुप्त ब्लैकलिस्ट का शिकार बनाया गया था? बटेल का मानना है कि उस दौर की टेक पत्रिकाएं एक अर्ध-धार्मिक समुदाय की तरह थीं, जहां बुनियादी मान्यताओं पर तीखा हमला करने वालों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था। गिल डूरान का कहना है कि यह पूरी तरह मुमकिन है, लेकिन पत्रकारिता में किसी को किनारे करने के लिए किसी औपचारिक साजिश की जरूरत नहीं होती; बस संपादकों की दिलचस्पी खत्म हो जाना ही काफी होता है। उस वक्त सिलिकॉन वैली की आलोचना को सुनने की कोई भूख नहीं थी।

स्टीवन लेवी और जॉन मार्कॉफ का भी मानना है कि ब्लैकलिस्ट जैसा भारी-भरकम शब्द शायद सही न हो, बल्कि असलियत यह थी कि जो कहानियां बोरसुक लिखना चाहती थीं, उस दौर में उनका कोई खरीदार या बाजार नहीं था। वहीं केटी हाफनर का कहना है कि बोरसुक किसी की चापलूसी करने के लिए तैयार नहीं थीं और अपने तीखे मिजाज के कारण वह व्यवस्था में फिट नहीं बैठ सकीं। खुद बोरसुक भी मानती हैं कि उनकी किताब इतनी ताकतवर नहीं थी कि उसके लिए कोई बाकायदा ब्लैकलिस्ट बनाई जाती। मीडिया और समाज का ढांचा ही ऐसा बदल चुका था जहां तकनीकी अंध-भक्ति के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को अप्रासंगिक बना दिया गया। पच्चीस साल बाद जब वही दुनिया उनकी चिंताओं को सही ठहरा रही है, तो यह उनकी व्यक्तिगत जीत से ज्यादा उस दौर के अंधाधुंध उत्साह की नैतिक हार का दस्तावेज बन चुकी है।

सवाल-जवाब

पॉलिना बोरसुक कौन हैं?
पॉलिना बोरसुक एक प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका और तकनीकी पत्रकार हैं जिन्होंने सिलिकॉन वैली की लिबर्टेरियन संस्कृति की शुरुआती आलोचना की थी।
उनकी चर्चित किताब साइबरसेल्फिश किस विषय पर थी?
यह किताब साल 2000 में प्रकाशित हुई थी जिसमें डॉट-कॉम बूम के दौरान टेक उद्योग के पुरुषवादी रवैये और सामाजिक सरोकारों से कटने की सोच को उजागर किया गया था।
किताब के प्रकाशन के बाद उनके करियर पर क्या असर पड़ा?
किताब आने के बाद पत्रिकाओं ने उन्हें काम देना बंद कर दिया, जिसके चलते वह लंबे समय तक गुमनामी, बीमारी और आर्थिक तंगी में रहीं।
हाल ही में उनकी किताब दोबारा चर्चा में क्यों आई?
टेक आलोचकों ने सोशल मीडिया पर उनकी पच्चीस साल पुरानी चेतावनियों को आज की तकनीकी हकीकत के लिए बेहद सटीक पाया, जिसके बाद प्रकाशक टिन हाउस ने इसका नया संस्करण छापा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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