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गोलकोंडा किले में ऊंटों के अस्तबल से मिला 16वीं सदी का दुर्लभ द्वैभाषिक स्तंभकल्चर
19 अग॰ 2026, 12:18 pm (72 दिन पहले)· 2

गोलकोंडा किले में ऊंटों के अस्तबल से मिला 16वीं सदी का दुर्लभ द्वैभाषिक स्तंभ

हैदराबाद के गोलकोंडा किले में पत्थरों के ढेर से कुतुब शाही शासनकाल का लगभग दो फीट ऊंचा एक दुर्लभ द्विभाषी शिलालेख मिला है, जिस पर फारसी और तेलुगु में इबारत खुदी है।

हैदराबाद स्थित प्रसिद्ध गोलकोंडा किले में पुरातत्वविदों को एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर मिली है। किले के पुराने अस्तबल क्षेत्र में पत्थरों के एक मलबे के बीच से लगभग दो फीट ऊंचा एक दुर्लभ शिलालेख बरामद किया गया है। 16वीं शताब्दी के कुतुब शाही राजवंश के शासनकाल से जुड़े इस पत्थर के स्तंभ पर फारसी और तेलुगु दोनों भाषाओं में इबारत उकेरी गई है। यह ऐतिहासिक खोज दक्कन क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक परंपरा और उस दौर के भाषाई तालमेल पर नया प्रकाश डालती है।

ऊंटों के पुराने अस्तबल क्षेत्र से हुई खोज

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम किले के उन हिस्सों की जांच और रखरखाव कर रही थी जहां प्राचीन समय में ऊंटों का अस्तबल हुआ करता था। इसी दौरान पत्थरों के बिखरे हुए ढेर में यह छोटा स्तंभ दबा हुआ मिला। लगभग दो फीट की ऊंचाई वाले इस नक्काशीदार पत्थर के ऊपरी हिस्से पर सूर्य और चंद्रमा के पारंपरिक धार्मिक व सांस्कृतिक चिह्न स्पष्ट रूप से बने हुए हैं। पुरातत्वविदों का कहना है कि नक्काशी की यह खास शैली विजयनगर साम्राज्य की शिलालेख परंपरा और पारंपरिक तेलुगु कलात्मक बनावट से काफी मेल खाती है।

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इब्राहिम कुली कुतुब शाह के दौर का प्रशासनिक आदेश

ऐतिहासिक साक्ष्यों और भाषाई अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञ अकमल ने इस शिलालेख की पहचान कुतुब शाही वंश के चौथे शासक इब्राहिम कुली कुतुब शाह के शासनकाल के रूप में की है। उनका शासनकाल वर्ष 1550 से 1580 तक रहा था। इतिहासकारों के अनुसार यह शिलालेख किसी युद्ध विजय का स्मारक नहीं, बल्कि सामान्य नागरिक प्रशासन और जनकल्याण से जुड़ा एक आधिकारिक फरमान है। उस युग में शाही आदेशों को आम लोगों तक आसानी से पहुंचाने के लिए बहुभाषी स्तंभ स्थापित किए जाते थे, ताकि स्थानीय आबादी अपनी मातृभाषा में प्रशासनिक फैसलों को समझ सके।

तेलुगु साहित्य को शाही संरक्षण और इभराम का संबोधन

इब्राहिम कुली कुतुब शाह केवल एक कुशल प्रशासक ही नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय भाषा, कला और साहित्य के प्रति विशेष अनुराग रखते थे। उनके शासन के दौरान तेलुगु भाषा को राजकाज में सम्मानजनक स्थान मिला और दरबार में तेलुगु कवियों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया। तत्कालीन तेलुगु कवि शासक के इस उदार रवैये और साहित्यिक प्रेम से प्रभावित होकर उन्हें आदरपूर्वक इभराम नाम से पुकारते थे। उस समय की कई समकालीन तेलुगु कविताओं और साहित्यिक कृतियों में राजा के लिए इस प्रिय संबोधन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

गंगा जमुनी तहज़ीब का प्रमाण और एएसआई परिसर में सुरक्षा

वर्तमान में इस बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहर को गोलकोंडा किले के भीतर स्थित एएसआई कार्यालय परिसर में सुरक्षित रूप से स्थापित कर दिया गया है, जहां आने वाले पर्यटक और इतिहास प्रेमी इसे देख सकते हैं। पुरातत्वविदों और इतिहासकारों का मानना है कि एक ही शिलाखंड पर दो अलग अलग लिपियों और भाषाओं की इतनी बारीक नक्काशी मिलना आज के दौर में अत्यंत दुर्लभ है। यह स्तंभ केवल एक प्राचीन पत्थर नहीं है, बल्कि हैदराबाद की ऐतिहासिक गंगा जमुनी तहज़ीब, सामाजिक सह अस्तित्व और दक्कन की समृद्ध साहित्यिक विरासत का सजीव प्रतीक है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अनमोल धरोहर का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी है।

सवाल-जवाब

गोलकोंडा किले में किस दौर का शिलालेख मिला है?
यह शिलालेख 16वीं सदी के कुतुब शाही वंश के चौथे शासक इब्राहिम कुली कुतुब शाह के शासनकाल (1550–1580) का है।
यह शिलालेख किले के किस स्थान पर पाया गया था?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को यह शिलालेख गोलकोंडा किले के उस हिस्से में पत्थरों के ढेर से मिला, जहां पहले ऊंटों का अस्तबल हुआ करता था।
इस ऐतिहासिक स्तंभ की क्या विशेषताएं हैं?
लगभग दो फीट ऊंचे इस स्तंभ पर फारसी और तेलुगु में इबारत खुदी है, और इसके ऊपरी हिस्से पर सूर्य और चंद्रमा के पारंपरिक प्रतीक बने हैं।
कुतुब शाही शासक इब्राहिम कुली कुतुब शाह को तेलुगु कवि किस नाम से बुलाते थे?
तेलुगु साहित्य और कवियों को संरक्षण देने के कारण स्थानीय तेलुगु कवि उन्हें प्रेम और आदर से 'इभराम' कहकर पुकारते थे।
वर्तमान में इस शिलालेख को कहां स्थापित किया गया है?
इस दुर्लभ शिलालेख को गोलकोंडा किले के भीतर स्थित एएसआई कार्यालय परिसर में जनता के देखने के लिए सुरक्षित रूप से प्रदर्शित किया गया है।
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